श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७७ ) अमरता आदि की प्राप्ति के उपाय और उपास्य भाव से प्राप्त इन्द्र और प्राण आदि भी परब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन करते है। प्राणस्तथानुगमात् ।१।१।२८॥ कौषीतकी ब्राह्मणे प्रतर्दनविद्यायां “प्रतर्दनो ह वै दैवोदासि रिन्द्रस्य प्रियंधामोपजगाम युद्धेन च पौरुषेण च” इत्यारभ्य “वरंवृणीष्व” इति वक्तारमिन्द्रं प्रति “त्वमेव मे वरंवृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमंमन्यसे” इति प्रतर्दनेनोक्ते “स होवाच प्राणोऽ- स्मिन् प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व” इति श्रूयते। तत्र संशयः, किमयं हिततमोपासनकर्मतयेन्द्रप्राणशब्दनिर्दिष्टो जीव एव, उत तदतिरिक्तः परमात्मा इति । किं युक्तम् ? कौषीतकि ब्राह्मण की प्रतर्दन विद्या में— 'दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन, युद्ध और पौरुष के बल से इन्द्र के प्रिय भवन मे पहुँच गया” ऐसा प्रारंभ करके— “तुम वर की प्रार्थना करो” ऐसा उपदेष्टा इन्द्र से “तुम ही मेरे वर हो, मुझे वह उपदेश देकर स्वीकारो जिसे कि मनुष्यों के लिए हितकर समझते हो ‘ऐसा प्रतर्दन के कहने पर’ उस इन्द्र ने कहा—मै ही प्रज्ञात्मक प्राण हूँ तुम मुझे अमृत और आयु समझ कर मेरी उपासना करो” ऐसा वर्णन किया गया है। संशय होता है कि-जो हिततम उपास्य इन्द्र हैं वो प्राण शब्द निर्दिष्ट जीव है अथवा परमात्मा ? जीव एवेति, कुत ? इन्द्रशब्दस्य जीवविशेष एव प्रसिद्धेः तत्समानाधिकरणस्य प्राणशब्दस्यापि तत्रैव वृत्तेः । अयमिन्द्राभि- धानो जीवः प्रतर्दनेन “त्वमेव मे वरंवृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं- मन्यसे” इत्युक्तः “मामुपास्व” इति स्वात्मोपासनं हिततममुपदिदेश । हिततमश्चामृतत्व प्राप्त्युपाय एव । जगत्कारणोपासनस्यैवामृतत्व प्राप्ति हेतुता— “तस्य तावदेवचिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ संपत्स्ये” इत्यवगता । अतः प्रसिद्ध जीवभाव इन्द्र एव कारणं ब्रह्म । ankurnagpal108@gmail.com