भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३५७ ) पदिश्यते । अपहतपाप्मत्वम् हि अपहतकर्मत्वं, कर्मवश्यतागंधरहित- त्वमित्यर्थः । कर्माधीनसुखदुःख भागत्वेन कर्मवश्याः हि जीवाः । अतो अपहतपाप्मत्वं जीवादन्यस्य परमात्मन एव धर्मः । उक्त संशय के निराकरणार्थ ही सूत्रकार ने सिद्धांत निर्णय करते हुए “अन्तस्तद्धर्मोपदेशात” सूत्र कहा है, जिसका तात्पर्य है कि—सूर्यं मंडल और नेत्र में जो पुरुष दीखता है वह जीवात्मा से भिन्न परमात्मा ही है । उसी की विशेषताओं का उपदेश वेद में किया गया है । जो जीवों में कभी संभव नहीं हैं उन्हीं निष्पापता आदि विशेषताओं का परमात्मा के लिए “स एष सर्वेभ्य” इत्यादि वाक्यों में किया गया है अपहतपापता का तात्पर्य है, निष्कर्मता, कर्मबन्धन शून्यता । कर्माधीन सुख दुःखानुसार कर्म के वशीभूत जीव ही है । निष्पापता आदि तो जीव से विलक्षण परमात्मा के ही धर्म हैं । यत्पूर्वकं स्वरूपोपाधिकं लोककामेशत्वम्, सत्यसंकल्पत्वादिकं सर्वभूतान्तरात्मत्वंच तस्यैवधर्मः । यथााह—‘‘एष आत्माऽपहतपाप्मा विजरोविमृत्युर्विशोकोविजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः’’ इति तथा ‘एष सर्वभूतान्तरात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेवएको नारायणः’’ इति । ‘‘सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेयेति’’ इत्यादि सत्यसंकल्पत्वपूर्वकसमस्तचिदचिद्वस्तुसृष्टियोगो निरूपाधिक भया- भय हेतुत्वं, वाङ्मनसपरिमितकृतपरिच्छेदराहितानवधिकाति- शयानन्दयोग इत्यादयोऽकर्मसंपाद्यास्वाभाविकाधर्मा जीवस्य न संभवंति । उसी प्रकार लोकेशता, कामेश्वरता, सत्य संकल्पता, सर्वभूतान्त रात्मकता, आदि स्वाभाविक धर्म भी परमात्मा के ही हैं। ऐसा ही— “यह सर्वान्तर्यामी, निष्पाप, जरामृत्यु शोक भूख प्यास रहित, सत्यकाम और सत्य संकल्प है” इस वाक्य से ज्ञात होता है । तथा “ऐसे सर्वान्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव स्वरूप एकमात्र नारायण ही हैं” उन्होंने संकल्प किया कि एक से अनेक हो जाऊँ “इत्यादि में वर्णित सत्य ankurnagpal108@gmail.com