श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५८ ) संकल्प पूर्विका समस्त जड चेतनात्मक सृष्टि योग्यता, स्वाभाविक भय अभय देने की क्षमता, वाङ्मनसगोचरता, अतिशय आनंदमयता इत्यादि अकर्म संपाद्य स्वाभाविक धर्म जीव के नही हो सकते । यत्तुशरीरसंबंधान्न जीवातिरिक्त इत्युक्तम्, तदसत्, न हि सशरीरत्वं कर्मवश्यता साधयति, सत्यसंकल्पस्येच्छयाऽपि शरीर संबंधसंभवात्। अथोच्येत-शरीरं नाम त्रिगुणात्मक प्रकृति परिणाम- रूपभूत संघातः, तत्संबंधश्चापहतपाप्मनस्सत्यसंकल्पस्यपुरुषस्ये- च्छया न संभवति, अपुरुषार्थत्वात् । कर्मवश्यस्य तु स्वस्वरूपान- भिज्ञस्य कर्मानुगुणफलोपभोगायानिच्छतोऽपि तत्संबंधोऽवर्जनीयः, इति। स्यादेतदेवम्, यदि गुणत्रयमयः प्राकृतोऽस्यदेहस्स्यात्, स तु स्वाभिमतस्वानुरूपोऽप्राकृत एवेति सर्वमुपपन्नम् । जो यह कहते हो कि-शरीर संबंध होने से वह जीवात्मा के अतिरिक्त कोई दूसरा नहीं हो सकता, यह कथन भी असत् है, कर्मवश ही शरीर संबंध होता हो यह कोई आवश्यक नहीं है, सत्य संकल्पात्मिका इच्छा से भी आत्मा का शरीर संबंध होता है। यदि यह कहो कि- त्रिगुणात्मक प्रकृति भोग के परिणाम स्वरूप जो पंचमहाभूतों का संयोग होता है, उसे ही शरीर कहते हैं, ऐसे भौतिक शरीर का संबंध, निष्पाप सत्यसंकल्प पुरुष की इच्छामात्र से नहीं हो सकता, क्योंकि वह कभी धर्म अर्थ काम मोक्ष आदि पुरुषार्थों का पालन नहीं करता । (अर्थात् पुरुषार्थ संबंधी भोगों में नहीं फँसता) अपने स्वरूप से अनभिज्ञ कर्मा- धीन जीव के न चाहते हुए भी, कर्मानुरूप फलभोग के लिए, देह संबंध अनिवार्य रूप से हो जाता है। हो सकता है आपका ही कथन ठीक हो आपके अनुसार जगत्सृष्टा का शरीर त्रिगुणमय प्राकृत हो सकता है पर हमारी दृष्टि में तो वह स्वेच्छा से अपने अनुरूप अप्राकृत देह धारण करके ही सृष्टि का कार्य संचालन करता है, ऐसा मानकर ही हम उक्त समस्या का समाधान कर पाते हैं। एतदुक्तं भवति-परस्यैव ब्रह्मणो निखिलहेयप्रत्यनीकानन्त ज्ञानानन्दैकस्वरूपतया सकलेतरविलक्षणस्य स्वाभाविकानवधिकाति-