भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३५६ ) शयासंख्येयकल्याणगुणगणाश्च संति। तद्वदेव स्वाभिमतानुरूपैक- रूपाचिन्त्यदिव्याद्भुत नित्यनिरवद्यनिरतिशयौज्वल्यसौन्दर्यसौगन्ध्यसौ- कुमार्यलावण्ययौवनाद्यनंतगुणगणनिधिदिव्यरूपमपि स्वाभाविक नास्ति। तदेवोपासकानुग्रहेण तत्तत्प्रतिपत्त्यनुरूप संस्थानं करोत्यपार- कारुण्यसौशील्यौदार्यजलनिधिः निरस्तनिखिलहेयगंधोऽपहतपाप्मा परंब्रह्म पुरुषोत्तमो नारायणः-इति । कथन यह है कि—हीनता रहित, अनंतज्ञान और आनंद स्वरूप होने से, समस्त पदार्थों से विलक्षण पर ब्रह्म ही, निरवधि, निरतिशय, असंख्य स्वाभाविक कल्याणमय गुणों की राशि हैं। तदनुरूप ही उनका स्वभावसिद्ध दिव्य रूप भी है। उसके अनुसार ही अचिन्त्य अलौकिक, अद्भुत, नित्य, निर्दोष, और सबका अतिक्रमण करने वाली औज्वल्य, सौन्दर्य, सौगन्ध्य ( सुयश ) सौकुमार्य लावण्य, यौवनादि अनंत गुण निधियां उनके दिव्य देह में स्वाभाविक रूप से रहती हैं। वे ही उपासकों की भावना के अनुरूप अनुग्रह करके अपने ऐसे दिव्य स्वरूप का चाक्षुष प्रत्यक्ष कराते हैं। अपार कारुण्य, सौशील्य, वात्सल्य, औदार्य आदि गुणों के सागर, हीन दोषों से सर्वथा शून्य, निष्पाप, परब्रह्म पुरुषोत्तम नारायण ही जगत् सृष्टा हो सकते हैं। “यतो वा इमानि भूतानि जायन्ते—सदेव सोम्येदमग्र आसीत्— आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्—एको ह वै नारायण आसीन्न ब्रह्मा नेशानः” इत्यादिषु निखिल जगदेक कारणतयाऽवगतस्यपरस्य ब्रह्मणः “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म—विज्ञानमानंदं ब्रह्म” इत्यादिष्वेवंभूतं स्वरूपमित्यवगम्यते । “निर्गुणं” निरंजनं—“अपहतपाप्माविजरो विमृत्युर्विशोको विजिघत्सोऽपिपासस्सत्यकामस्सत्यसंकल्पः–न तस्य कार्यकरणं च विद्यते न तत्समश्चाभ्यधिकश्च दृश्यते—परास्य शक्तिर्विविधैव श्रूयते स्वाभाविकी ज्ञान बलक्रिया च–तमीश्वराणां परमं महेश्वरं तं दैवतानां परमं च दैवतम्—स कारणंकरणाधि ankurnagpal108@gmail.com