श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३५५ ) पुंडरीक के समान रमणीक नेत्रों वाला है उसका नाम “ओत” है, वह संपूर्ण पापों से मुक्त है, उस निष्पाप को जो जानता है वह भी पापों से मुक्त हो जाता है। ऋक् और साम में उसी का गान किया गया है वही अधिदेव है।” इसके बाद इसी का अध्यात्म रूप भी जैसे—“जो यह आँखों में पुरुष दीखता है; ऋक्-साम-उक्थ (सामवेदीय स्तोत्र विशेष) यजु और ब्राह्मण ग्रन्थों में वर्णित पूर्व पुरुष का जैसा रूप है, यह वैसे ही रूपवाला है, उसका जैसा गान करते हैं, इसका भी वैसा ही गान करते हैं, उसका जो नाम है, इसका भी वही नाम है।” उक्त विषय में संशय होता है कि—उक्त आदित्य और नेत्र स्थित पुरुष, क्या अधिक पुण्यशाली ऐश्वर्यवान् सूर्यमंडल को प्राप्त करने वाला जीवात्मा ही है ? अथवा उससे भिन्न परमात्मा है ? किसको मानना उचित होगा ? उपचितपुण्यो जीव एवेति । कुतः ? स शरीरत्वश्रवणात् शरीरसंबंधो हि जीवानामेव संभवति । कर्मानुगु णप्रिययोगाय हि शरीर संबंधः । अतएव हि कर्मसंबंधरहितस्यमोक्षस्य प्राप्यत्वम शरीरत्वेनोच्यते “न ह वै सशरीरस्य सतः प्रियाप्रिययोरपहतिरस्ति, अशरीरं वा व सन्तं न प्रियाप्रिये स्पृशतः” इति । संभवति च पुण्यातिशयात् ज्ञानाधिक्यम्, शक्त्याधिक्यंच । अतएवं लोककामेश- त्त्वादि तस्यैवोपपद्यते । ततएव चोपास्यत्वम्, फलदायित्वम्, पाप- क्षपणकत्वेन मोक्षोपयोगित्वं च । मनुष्येष्वप्युपचितपुण्याः केचित् ज्ञानशक्त्यादिभिरधिकतरा दृश्यन्ते, ततश्च सिद्धगंधर्वादयः ततश्च देवाः ततश्चेंद्रादयः । अतो ब्रह्मादिष्वन्यतमएवैकैकस्मिन्कल्पे पुण्यविशेषेणैवम्भूतमैश्वर्यम्प्राप्तो जगत्सृष्ट्याद्यपि करोतीति जगत्का- रणत्वजगदन्तरात्मत्वादिवाक्यमस्मिन्नेवौपचितपुण्यविशेषे सर्वज्ञे सर्वशक्तौ वर्त्तते । अतो न जीवादतिरिक्तः परमात्मा नाम कश्चि- ankurnagpal108@gmail.com