भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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भावेन निष्प्रमाणकं ब्रह्मेत्युच्यत इति भ्रान्तजल्पितम् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इति यच्छब्दनिर्दिष्टमर्थम् “आनन्दं ब्रह्मणो विद्वान्” इत्यानन्दशब्देन प्रतिनिर्दिश्य तस्य ब्रह्म संबन्धित्वं ब्रह्मण इति व्यति- रेकनिर्देशेन प्रतिपाद्य तदेव वाङ्मनसगोचर “विद्वान्” इति तद्वेद- नमभिदधद्वाक्यं जरद्गवादिवाक्यवदनर्थकं वाच्यानंतर्गतं च स्यात् । “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इस वाक्य को यदि, वाणी और मन से निवृत्ति प्रतिपादक मान लें तो भी निर्विशेष वस्तु की प्रतीति उक्त वाक्य से नहीं होगी। अपितु वाणी और मन से उसकी अप्रामाणिकता ज्ञात होती है, यदि वाणी और मन से उसे अज्ञात मानकर निर्विशेष बतलाने की चेष्टा करेंगे तो ब्रह्म में तुच्छता आ जायगी । “ब्रह्मविदाप्नोति परं” वाक्य से प्रारंभ करके ब्रह्म की विपश्चित्त्व, जगत्कारणता, आनंदैकान्ता आनंददातृता, संकल्प मात्र से जड चेतन संपूर्ण जगत सृष्टि की शक्तिमत्ता, सृष्टि जगत में अनुस्यूत होकर तदात्मकता, भय अभय की कारणता, वायु आदि की शासकता, निरतिशय आनंदमयता आदि अनेक शतगुणितोत्तर क्रम से वर्णित गुणों का प्रति- पादन करके अन्त में यह कह दिया जाय कि उक्त वाक्य ब्रह्म की निर्वि- शेषता का प्रतिपादक है, तो ऐसा कथन नितान्त भ्रामक है । “यतो वाचो” वाक्य मे “यत्” पद जिस तत्त्व का निर्देश करता है “आनंद ब्रह्मणो” वाक्य “आनंद” पद से उसी तत्त्व का प्रतिनिर्देश करके ‘ब्रह्मणः’ पद से उसका संबंध बतलाता है, यदि उसी वाङ्मनसातीत को “विद्वान्” पद वाच्य ज्ञाता कहा जाय तो उक्त वाक्य ‘जरद्गव” इत्यादि वाक्य की तरह निरर्थक हो जायगा (अर्थात् ज्ञाता और ज्ञेय का स्पष्ट भेदोल्लेख होते हुए भी उसे अभिन्न बतलाना क्लिष्ट कल्पना मात्र है । अतः शतगुणितोत्तरक्रमेण ब्रह्मानन्दस्यातिशयेयत्तांवक्तुमुद्यम्य तद्ध्येयत्ता या अभावादेव वाङ्मनसयोस्ततो निवृत्तिः “यतो वाचो निवर्त्तन्ते” इत्युच्यते । एवमियत्ता रहितं “ब्रह्मण आनन्दं विद्वान्