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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ३६५ ) भूतानि जायन्ते तद्ब्रह्म" इत्युक्ते कुत इमानि भूतानि जायन्त इत्यादि विशेषापेक्षायां “सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते” इत्यादिना विशेषप्रतीतेः जगज्जन्मादिकारणं आकाश एवेति निश्चिते सति “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्यादिष्वपि सदिशब्दासाधारणकारास्तमेव विशेषमाकाशमभिदधति । “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” इत्यादिष्वात्मशब्दोऽपि तत्रैव वर्त्तते ।” तस्यापि हि चेतनैकान्तत्वं न संभवति । यथा-“मृदात्मको घटः” इति । आप्नोतीत्यात्मेति व्युत्पत्या सुतरामाकाशेऽप्यात्मशब्दो वर्त्तते । अत एवमाकाश एव कारणं ब्रह्मेति निश्चिते सतीक्षणादय- स्तदनुगुणांगौणावर्णनीयाः । यदि हि साधारणशब्दैरेव सदादिभिः कारणमभ्यधायिष्यत, ईक्षणाद्यर्थानुरोधेन चेतनविशेष एव कारण- मिति निरचेष्यत । आकाश शब्देन तु विशेष एव निश्चित इति नार्थस्वाभाव्यान्निर्णेतव्यमस्ति । उक्त पक्ष पर शंका होती है कि-ब्रह्म तो जड और चेतन जीवों से भिन्न, स्वेच्छा से सृष्टि करने वाला कहा जाता है, (तो वह आकाश कैसे हो सकता है ?) (उत्तर) हाँ कहा तो गया है पर वह कथन ठीक नहीं है। उस कथन पर यह शंका तो बनी ही रहती है कि-ये भूत किससे उत्पन्न हुए ? उक्त शंका की पूर्ति ‘ये सब आकाश से ही हुए” इत्यादि वाक्य से होती है और निश्चित होता है जगत् के जन्मादि का कारण आकाश है । ऐसा निश्चित हो जाने पर “हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व सत् ही था” इस वाक्य में कहे गए “सत्” शब्द का अर्थ भी आकाश ही निश्चित होता है । तथा “यह सारा जगत् पहले आत्मा ही था” इस वाक्य का “आत्मा” शब्द भी आकाश वाची ही सिद्ध होता है । आत्मा शब्द एकमात्र चेतन तत्त्व का ही ज्ञापक हो सो बात भी नहीं है । “मृदात्मक घट” ऐसे अचेतन प्रयोग भी आत्मा के लिए होते हैं । “आप्नोति इति आत्मा” अर्थात् जो सर्वत्र व्याप्त है वह आत्मा है इति व्युत्पत्ति के अनुसार भी आत्मा शब्द आकाश वाची हो सकता है । इस- ankurnagpal108@gmail.com

( ३६६ ) लिए आकाश ही कारण ब्रह्म है ऐसा निश्चित हो जाने पर, जगत कर्त्ता के लिए प्रयुक्त ईक्षण आदि गुण गौण प्रतीत होते हैं । और फिर यदि "सद्" आदि साधारण शब्दों पर ही जगत कर्त्ता का निर्णय निर्भर है तो ईक्षण आदि अर्थों के द्वारा चेतन विशेष को ही कारण मानना चाहिए । आकाश शब्द का तो विशेष उल्लेख होने से निश्चित हो जाता है कि आकाश ही जगत कर्त्ता है, अर्थ के आधार पर निर्णय करने की बात तो उठती ही नहीं । ननु "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इत्याकाशस्यापि कार्यत्वं प्रतीयते । सत्यम्, सर्वेषामेवाकाशवाथ्वादीनां सूक्ष्मावस्थास्थूला- वस्थाचेत्यवस्थाद्वयमस्ति । तत्राकाशस्य सूक्ष्मावस्था कारणम् । स्थूलावस्था तु कार्यम् । "आत्मन आकाशस्सम्भूतः" इति स्वस्मा- देव सूक्ष्मरूपात् स्वयं स्थूलरूपस्सम्भूत इत्यर्थः । "सर्वाणि ह वा इमानि भूता याकाशादेव समुत्पद्यन्ते" इ त सर्वस्य जगत आकाशा- देव प्रभवाप्ययादि श्रवणात् तदेव हि कारणं ब्रह्मेति निश्चितम् यत एवं प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्म अत एव च "यदेषश्राकाश आनंदो न स्यात्" आकाशो ह वै नामरूपयोर्निर्वहिता" इत्येवमादि निर्देशोप्युपपन्नतरः । अतः प्रसिद्धाकाशादनतिरिक्तं ब्रह्मेति । संशय होता है कि—"आत्मा से आकाश हुआ" इस वाक्य से तो आकाश की कार्यता ज्ञात होती है ठीक है, आकाश वायु आदि सभी की स्थूल और सूक्ष्म दो अवस्थायें होती हैं। आकाश की सूक्ष्मावस्था कारण तथा स्थूलावस्था कार्य है । "आत्मा से आकाश हुआ" का तात्पर्य है कि वह अपने सूक्ष्म रूप से स्वयं स्थूल हुआ । सारे भूत समुदाय आकाश से उत्पन्न हुए "इस वाक्य से ज्ञात होता है कि-आकाश से ही सब का उदय और उसी में सब लय होते हैं इसलिए आकाश ही कारण ब्रह्म निश्चित होता है । इससे यह भी निश्चिन होता है कि-प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है" यदि यह आनंद स्वरूप आकाश न होता "आकाश ही नामरूप को धारण करने वाला है" इत्यादि निर्देशक वाक्य भी इसी तथ्य के उपपादक हैं । इससे सिद्ध होता है कि प्रसिद्ध आकाश ही ब्रह्म है ।

( ३६७ ) सिद्धान्त—एवं प्राप्ते ब्रूमः—आकाशस्तल्लिङ्गात् आकाश- शब्दाभिधेयः प्रसिद्धाकाशादचेतनादर्थान्तरभूतो यथोक्तलक्षणः पर- मात्मैव कुतः ? तल्लिङ्गात् निखिलजगदेककारणत्वं, परायणत्वं इत्यादीनि परमात्मलिङ्गानि उपलभ्यन्ते । निखिल कारणत्वं हि अचिद्वस्तुनः प्रसिद्धाकाशशब्दाभिधेयस्य नोपपद्यते, चेतन- वस्तुनस्तत्कार्यत्वासंभवात् । परायणत्वं च चेतनानां परमप्राप्यत्वं । तच्चाचेतनस्य हेयस्य सकलपुरुषार्थ विरोधिनो न संभवति । सर्वस्माज्ज्यायस्त्वं च निरुपाधिकं सर्वैः कल्याणगुणैस्सर्वभ्यो- निरतिशयोत्कर्षः । तदप्यचितो नोपपद्यते । सिद्धान्त—उक्त मत पर कथन यह है कि—प्रसिद्ध आकाश से पृथक् पूर्वोक्त लक्षणों वाला परमात्मा ही यहाँ आकाश शब्द वाच्य है । क्यों कि-सूत्र में “तल्लिङ्गात्” अर्थात् 'उसके बोधक' ऐसा स्पष्ट उल्लेख है । संपूर्ण जगत की एकमात्र कारणता, सर्वश्रेष्ठता और परमाश्रयता इत्यादि परमात्म बोधक शब्द शास्त्रों में पाये जाते हैं । चिदचिद् जगत की कारणता आकाश नामक जड तत्त्व में संभव नहीं है । उसमें चेतन वस्तु के संचालन की क्षमता तो कदापि नहीं हो सकती । जगतकर्त्ता के लिए जो परायण विशेषण मिलता है उसका अर्थ होता है “परम आश्रय” जो कि अचेतन पुरुषार्थ रहित वस्तु में संभव नहीं है । “सर्वश्रेष्ठता” का अर्थ भी “निरपेक्ष अतिशय कल्याण गुणों की उत्कर्षता” है, यह भी अचेतन में संभव नहीं है । यदुक्तं जगत्कारणविशेषाकांक्षायाम् आकाशशब्देन विशेष- समर्पणादन्यत्सर्वंतदनुरूपमेव वर्णनीयमिति, तदयुक्तम् “सर्वाणि ह वा इमानि भूतान्याकाशादेव समुत्पद्यन्ते” इति प्रसिद्धवन्निर्दें- शात् । प्रसिद्धवन्निर्देशो हि प्रमाणान्तरप्राप्तिमपेक्षते । प्रमा- णान्तराणि च “सदेव सोम्येदमग्र आसीत्” इत्येवमादीन्येव वाक्यानि तानि च यथोदितप्रकारेणैव ब्रह्म प्रतिपादयन्तीति तत्प्रतिपादितं ankurnagpal108@gmail.com

( ३६८ ) ब्रह्माकाशशब्देन प्रसिद्धवन्निर्दिश्यते । संभवति च परस्यब्रह्मणः प्रकाशकत्वादाकाशशब्दाभिधेयत्वं आकाशते आकाशयति च इति । यदि कहो कि - विशेषरूप से जगतकर्ता के स्वरूप के निर्धारण के अभिप्राय से 'आकाश" शब्दविशेष का उल्लेख किया गया है, सो ऐसा कहना भी गलत है । "ये सारे भूत आकाश से ही उत्पन्न होते हैं" इस श्रुति में प्रसिद्ध का सा निर्देश है (विशेष का नहीं) प्रसिद्ध का सा वर्णन अन्य प्रमाणों से सापेक्ष होता है (अर्थात् प्रसिद्ध के लिए अन्य प्रमाणों की आवश्यकता होती है "यह वही है जिसकी इस रूप में प्रसिद्धि है") अन्य प्रमाण जैसे- "हे सौम्य ! सृष्टि के पूर्व एकमात्र 'सत्' ही था ।" ये प्रमाण प्रसिद्ध ब्रह्म के ही प्रतिपादक है । उस ब्रह्म का प्रतिपादक आकाश शब्द प्रसिद्ध की तरह ही कहा गया है । प्रकाशक अर्थवाची आकाश शब्द परब्रह्म में ही घटता है । आकाशते = प्रकाशते आकाशयति = प्रकाशयति अर्थात् जो आ समंतात् चारो ओर से काशते-प्रकाशते होता है अथवा जो दूसरे को प्रकाशित करता है [इन दो व्युत्पत्तियों से प्रकाशवाची आकाश शब्द परब्रह्म का बोधक ही सिद्ध होता है] किं च-अनेनाकाशशब्देन विशेषसमर्पणक्षमेणापि चेतनांशं प्रत्यसंभावितकारणभावमचेतनविशेषमभिदधानेन "तदैक्षत बहुस्यां प्रजायेय" सोऽकामयत् बहुस्यां प्रजायेय "इत्यादि वाक्यशेषावधारित सार्वज्ञसत्यसंकल्पत्वादि विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थ वाक्यार्था- न्यथाकारणं न प्रमाणपदवीमधिरोहति । एवमपूर्वानन्तविशेषण- विशिष्टापूर्वार्थप्रतिपादनसमर्थनेकवाक्यगतिसामान्यं चैकेनानुवाद- स्वरूपेणान्यथाकर्तुं न शक्यते । अर्थ विशेष (भूताकाश) के प्रतिपादक होते हुए भी इस (आकाश) में चेतनांश की कारणता असंभव है । अचेतन विशेष प्रतिपादक आकाश में उसने सोचा में बहुत हो जाऊँ" उसने बहुत होने का संकल्प किया इत्यादि वाक्यों से ज्ञात, सर्वज्ञता, सर्वसंकल्पता आदि विशिष्ट अलौकिक प्रतिपादक अर्थों को झुठला कर अपने लिए प्रमाण रूप से इन वाक्यों को ankurnagpal108@gmail.com

( ३६६ ) मनवा लेना संभव नहीं है । अनन्त विशेषण विशिष्ट अपूर्व अर्थ प्रति- पादनक्षम अनेक वाक्यों की जो एक सामान्य गति है (अर्थात् जो विशेष विशेषणों से, एक चेतनविशिष्ट ब्रह्म का ही प्रतिपादन कर रहे हैं) उसे आकाश शब्द के प्रतिपादन के लिए, केवल अनुवाद मात्र कह कर झुठलाया भी नहीं जा सकता । यत्वात्मशब्दश्चेतनैकान्तो न भवति, “मृदात्मकोघटः” इत्यादिदर्शनादित्युक्तम्, तत्रोच्यते—यद्यपि चेतनादन्यत्रापि क्वचि- दात्मशब्दः प्रयुज्यते, तथापि शरीर प्रतिसंबंधिन्यात्मशब्दस्य प्रयोग प्राचुर्यात्— “आत्मा वा इदमेक एवाग्र आसीत्” आत्मन आकाशस्संभूतः “इत्यादिषु शरीरप्रतिसंबंधि चेतन एव प्रतीयते यथा गोशब्दस्यानेकार्थवाचित्वेऽपि प्रयोगप्राचुर्यात् सास्नादिमानेव स्वतः प्रतीयते । अर्थान्तरप्रतीतिस्तु तत्तदसाधारणनिर्देशापेक्षा, तथास्वतःप्राप्तं शरीरप्रतिसंबंधिचेतनाभिधानमेव । “सईक्षत लोकान्नु सृजां इति “सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेय” इत्यादि तत्तद् [

( ३७० ) प्रतीति तो, उस अर्थ संबंधी असाधारण निर्देश से अपेक्षित होती है, स्वतः ज्ञात अर्थ तो शरीर संबंधी चेतनाभिधायक ही है । “उसने सोचा कि लोक की सृष्टि करूँ” उसने सोचा अनेक रूप धारण करूँ “इत्यादि वाक्य सामर्थ्यवान चेतन शक्ति को ही जगत कर्त्ता के रूप मे वर्णन करते हैं, वाक्यशेष शब्दो द्वारा प्रतिपादित तथा अनन्य असाधारण अलौकि- कार्थ बोधक “सदेव सौम्य ।” इत्यादि वाक्य सिद्ध ब्रह्म ही “आकाश” शब्द से प्रसिद्ध की तरह “सर्वाणि हवा इमानि भूतानि” इत्यादि वाक्यो में बतलाए गए है । ६ अधिकरण— अत एव प्राणः १।१।२४॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये—‘प्रस्तोतर्या देवता प्रस्तावमन्वायत्ता” इति प्रस्तुत्य “कतमा सा देवतेति प्राण इति होवाच सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्युज्जिहते सैषा देवता प्रस्तावमन्वायत्ता तां चेदविद्वान् प्रास्तोष्यो मूर्धा ते व्य- पतिष्यत” इति । ऐसा छांदोग्योपनिषद् में वर्णन आता है कि—“हे स्तोत्र पाठक ! जो देवता प्रस्ताव में अनुगत हैं” इस भूमिका के बाद जिज्ञासा की गई कि “वे देवता कौन हैं [ इसके उत्तर में उषस्ति ऋषि ने प्रस्तोता से कहा—]” प्राण “ही वे देवता है, ये सारे भूत समुदाय प्राण में ही प्रवेश करते हैं, प्राण से ही उत्पन्न होते हैं, वे प्राण देवता ही प्रस्ताव के लिए अनुगत हैं। उनको न जानकर (अर्थहीन) स्तोत्र पाठ करोगे तो तुम्हारा मस्तक कट कर गिर जावेगा ।” अत्र प्राणशब्दोप्याकाशशब्दवत् प्रसिद्धप्राणव्यतिरिक्ते परस्मिन्नेव ब्रह्मणि वर्तते, तदसाधारणनिखिलजगत्प्रवेश- निष्क्रमणार्दिलिंगात् प्रसिद्धवन्निर्दिष्टात् । अधिकाशंका तु कृत्स्नस्य- भूतजातस्य प्राणाधीनस्थितिप्रवृत्यादिदर्शनात् प्रसिद्धएव प्राणो जगत्कारणतया निर्देशमर्हति इति । ankurnagpal108@gmail.com

( ३७१ ) उक्त श्रुति बतलाती है कि-आकाश शब्द की तरह प्राण शब्द भी, प्रसिद्ध प्राण से भिन्न परमात्मा का ही वाचक है। समस्त जगत् के असाधारण प्रवेश निष्क्रमण आदि के उल्लेख तथा प्रसिद्ध की तरह निर्देश से उक्त बात की ही पुष्टि होती है। इस पर एक विशेष शंका की जाती है कि- संपूर्ण भूत समुदाय से उद्भूत पदार्थों की स्थिति, प्रवृति आदि प्राणाधीन ही देखी जाती है। इसलिए जगत्कर्त्ता के रूप में प्रसिद्ध प्राण का ही निर्देश प्रतीत होता है। परिहारस्तु--शिलाकाष्ठादिषु चेतनस्वरूपे च तदभावात् “सर्वाणि ह वा इमानि भूतानि प्राणमेवाभिसंविशंति प्राणमभ्यु- ज्जिहते” इति नोपपद्यत इति । अतः प्राणयति सर्वाणिभूतानि इति कृत्वा परंब्रह्मैव प्राणशब्देनाभिधीयते । अतः प्रसिद्धाकाश प्राणादेरन्यदेव निखिलजगदेककारणमपहतपाप्मत्वसार्वज्ञसर्व- संकल्पत्वाद्यनंतकल्याणगुणगणं परंब्रह्मौवाकाश प्राणादिशब्दा- भिधेयमिति सिद्धम् । परिहार—शिलाकाष्ठ आदि के चेतन स्वरूप में उस प्राण का अभाव है, “सारे भूत प्राण में ही स्थित हैं तथा प्राण से ही उद्गत होते हैं” इस प्रमाण से भूत समुदाय की स्थिति प्राण में बतलाई गई है, यदि इसे प्रसिद्ध प्राण का वर्णन मान लें तो निष्प्राण शिलाकाष्ठादि की संगति कैसे बैठेगी। सभी भूतों को प्राणित करता है, इस व्युत्पत्ति के अनुसार परब्रह्म ही प्राणवाची सिद्ध होता है। प्रसिद्ध आकाश और प्राण से भिन्न संपूर्ण जगत का कारण निष्पाप, सर्वज्ञ, सत्यसंकल्प, अनंत कल्याण गुणों वाला परमात्मा ही आकाश प्राण आदि शब्दवाची है। १० अधिकरण— अतः परं जगत्कारणत्वव्याप्तेन येन केनापिनिरतिशयोत्कृष्ट- गुणेन जुष्टं ज्योतिरिन्द्रादिशब्दैरर्थान्तरप्रसिद्धैरप्यभिधीयमानं परंब्रह्मैवेत्यभिधीयते, ज्योतिश्चरणाभिधानात् इत्यादिना । ankurnagpal108@gmail.com

( ३७२ )

जगतकर्त्ता के समर्थक जो भी गुण आवश्यक है अर्थान्तर में प्रसिद्ध ज्योति इन्द्र इत्यादि शब्दवाची सभी गुण विशेष परब्रह्म के हैं, ऐमा “ज्योतिश्चरणाभिधानात्” सूत्रो मे बतलावेगे । ज्योतिश्चरणाभिधानात् १।१।२५॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये-“अथ यदतः परो दिवो ज्योतिर्दीप्यते विश्वतः पृष्ठेषु सर्वतः पृष्ठेष्वनुत्तमेषूलोकेष्विदं वाव तद्यदिम- मस्मिन्नन्तः पुरुषेज्योतिः” इति । तत्र संशयः किमयं ज्योतिशब्देन- निर्दिष्टोनरतिशयदीप्तियुक्तोऽर्थः प्रसिद्धमादित्यादिज्योतिरेव कारणभूत ब्रह्म उत् समस्तचिदचिद्वस्तुजातविजातीयः परमकारणभूतोऽमि- तभाः सर्वज्ञः सत्यसंकल्पः पुरुषोत्तमः इति । छांदोग्य का प्रवचन है कि—“द्युलोक, विश्व, तथा उत्तमाधम समस्त लोकों के ऊपर जो ज्योति प्रकाशित हो रही है वह पुरुषों की अन्तःस्थ ज्योति ही है।” इस प्रसंग पर संशय होता है कि—क्या उक्त ज्योति शब्द से निर्दिष्ट अतिशय दीप्ति अर्थवाली प्रसिद्ध सूर्य आदि की ज्योति ही कारण ब्रह्म है अथवा समस्त जडचेतन वस्तुओं से विलक्षण सभी के कारण अमित दीप्तिमान सर्वज्ञसत्यसंकल्प पुरुषोत्तम ज्योति- नाम से अभिहित हैं ? किं युक्तम् ? प्रसिद्धमेव ज्योतिरिति । कुतः प्रसिद्धवन्निर्देशेऽप्या- काशप्राणादिवत् स्ववाक्योपात्तपरमात्मव्याप्त लिंगविशेषा दर्शनात्, परमपुरुष प्रत्यभिज्ञानासम्भवात्, कौक्षेयज्योतिषैक्योपदेशाच्च प्रसिद्धमेव ज्योतिः कारणत्वव्याप्तनिरतिशय दीप्तियोगाज्जगत्कारणं ब्रह्मेति । उक्त दोनों में कौन समीचीन है ? (पूर्वपक्ष) प्रसिद्ध ज्योति ही कारण ब्रह्म हो सकती है क्यों कि—प्रसिद्ध की तरह निर्देश होते हुए भी आकाश और प्राण की तरह उक्त वाक्य में, परमात्म ग्राहक कोई निर्देश नहीं किया गया है तथा ज्योति की परमात्म विषयक कोई

( ३७३ ) प्रत्यभिज्ञा भी नहीं की गई है। उदरस्थ ज्योति से प्रसिद्ध ज्योति का ऐक्य भी बतलाया है। जिससे ज्ञात होता है कि—प्रसिद्ध ज्योति ही कारण ब्रह्म है। सिद्धान्त—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—ज्योतिश्चरणाभिधानात्द्युसंबं- धितयानिर्दिष्टं निरतिशयदीप्तियुक्तं परमपुरुष एव । कुतः ? “पादोऽस्य सर्वा भूतानि त्रिपादस्यामृतंदिवि” इत्यस्यैव द्युसंबन्धिनश्चरणत्वेन सर्वभूताभिधानात् । सिद्धान्त--इस पर मेरा मत यह है कि-द्युलोक से संबद्ध अतिशय दीप्तिमती ज्योति परब्रह्म ही है, क्यों कि-"समस्त भूत समुदाय उसका एक पाद है तथा उससे तीन पाद द्युलोक में स्थित हैं" इस वाक्य में समस्त भूत समुदाय को द्यु संबंध विशिष्ट उक्त ज्योति के चरण रूप से कहा गया है। एतदुक्तं भवति—यद्यपि—“अथ यदतः परोदिवो ज्योतिः” इत्यस्मिन्वाक्ये परमपुरुषासाधारणलिंगनोपलभ्यते, तथापि पूर्वं वाक्ये द्युसंबंधितयापरमपुरुषस्य निर्देशादिदमपि द्युसंबंधिज्योतिस्स एवेति प्रत्यभिज्ञायत इति । कौक्षेयज्योतिषैक्योपदेशश्च फलाय तदात्मकत्वानुसंधानविधिरिति न कश्चिद्दोषः, कौक्षेयज्योतिष- श्चतदात्मकत्वं भगवता स्वयमेवोक्तम् “अहंवैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः” इति । कथन यह है कि-"इस द्युलोक के ऊपर जो ज्योति प्रकाशित हो रही है" इस वाक्य में यद्यपि परंपुरुष का ग्राहक कोई लिंग (चिन्ह) नहीं है, फिर भी पूर्व वाक्य में द्यु संबंधी जिस परंपुरुष का निर्देश है, उसी से इस वाक्य की उल्लेख्य ज्योति विशिष्ट का संबंध समन्वय प्रतीत होता है, इस ज्योति से उदरस्थ ज्योति की जो एकता बतलाई गई वह भी इसी तथ्य की पुष्टि करती है। फल विशेष की प्राप्ति के लिए ही उदरस्थ ज्योति की एकता बतलाई गई है। उदरस्थ ज्योति की ब्रह्म-

( ३७४ ) त्मकता स्वयं भगवान ने ही बतलाई है—"मैं ही प्राणियों में जाठराग्नि के रूप में स्थित हूँ।" छन्दोभिधानान्नेतिचेन्न तथा चेतोऽर्पणनिगमात्तथाहिदर्शनम् ॥१।१।२६॥ पूर्वस्मिन् वाक्ये "गायत्री वा इदं सर्वम्" इति गायत्र्याख्यं छंदोऽभिधाय "तदेतदृचाऽभ्यनूक्तम्" इत्युदाहृतायाः "तावानस्य महिमा" इत्युक्तवा ऋचोऽपि छन्दोविषयत्वान्नात्र परं पुरुषाभि- धानमिति चेत् । तन्न, तथा चेतोऽर्पणनिगमात् न गायत्री शब्देन छंदोमात्र इहाभिधीयते छंदोमात्रस्य सर्वात्मकत्वानुपपत्तेः अपि तु ब्रह्मण एव गायत्री चेतोऽर्पणमिह निगद्यते । ब्रह्मणि गायत्री सादृश्यानुसंधानं फलायोपदिश्यत इत्यर्थः । उक्त ज्योति प्रसंग के पूर्ववर्त्ती वाक्य में "गायत्री ही ये सारा जगत है" गायत्री छंद का उल्लेख करके—"इसे ही मंत्र कहते हैं" यह समस्त उसी की महिमा है" इत्यादि में गायत्री मंत्र का ही उल्लेख है इसलिए उक्त प्रसंग परमपुरुष का अभिधायक नहीं है; ऐसा कथन असंगत है। उक्त प्रसंग में वस्तुतः चित्त समर्पण की विधि का उल्लेख है। यहाँ "गायत्री" शब्द केवल छंद के अर्थ में ही प्रयुक्त हो सो बात नहीं है, अपितु गायत्री से ब्रह्म अर्थ भी अभिप्रेत है, उसी में चित्त समर्पण का उपदेश दिया गया हैं, अर्थात् फलविशेष की प्राप्ति के लिए, ब्रह्म का ही गायत्री की तरह चिन्तन करने का उपदेश दिया गया है। संभवति च—"पादोऽस्य सर्वाभूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति चतुष्पदो ब्रह्मणश्चतुष्पदया गायत्र्या च सादृश्यम् । चतुष्पदा च गायत्री क्वचिद्दृश्यते । तद्यथा—"इन्द्रः शचीपतिः । बलेन पीड़ितः । दुश्च्यवनो वृषा । समित्सुसासहिः" इति । तथा ह्यन्यत्रापि सादृश्याच्छन्दोभिधायी शब्दोऽर्थान्तरे प्रयुज्यमानो दृश्यते । यथा ankurnagpal108@gmail.com

( ३७५ ) संवर्गविद्यायाम्—"ते वा एते पंचान्ये दश संपद्यंते" इत्यारभ्य “सैषा विराडन्नात्” इत्युच्यते । “इसके एक चरण में सारा विश्व है, तथा इसके तीन चरण अमृत द्युलोक में हैं" इस श्रुति से चतुष्पद ब्रह्म से चतुष्पदा गायत्री का सादृश्य ज्ञान होता है । कहीं-कहीं चतुष्पदा गायत्री देखी भी जाती है, जैसे कि— (१) “इन्द्र शचीपतिः (२) बलेन पीड़ितः (३) दुश्च्यवनो वृषा (४)” समित्सु सासहिः कहीं सादृश्य छंदबोधक शब्द का दूसरा अर्थ भी देखा जाता है । जैसा कि संवर्ग विद्या में—"ये अग्नि आदि पंच महाभूत और वाग् आदि पंच ज्ञानेन्द्रिया मिलकर दस होते हैं।" ऐसा कहकर “वे ही विराट के भक्ष्य अन्न हैं।" ऐसा बतलाया गया । इतश्च गायत्री शब्देन ब्रह्मै वाभिधीयते— इसलिए भी गायत्री शब्द से ब्रह्म की प्रतीति होती है कि— भूतादिपादव्यपदेशोपपत्तेश्चैवम् । १।१।२७॥ भूतपृथिवीशरीरहृदयानि निर्दिश्य “सैषा चतुष्पदा” इति व्यपदेशो ब्रह्मण्येव गायत्री शब्दाभिधेय उपपद्यते । भूत, पृथिवी, शरीर और हृदय को निर्देश करते हुए बतलाया गया कि—"इन चारों से चतुष्पदा हैं।" ऐसा व्यपदेश ब्रह्म के लिए ही, गायत्री शब्द से किया गया है । उपदेशभेदान्नेति चेन्नोभयस्मिन्नप्यविरोधात् । १।१।२८॥ पूर्ववाक्ये "त्रिपादस्यामृतं दिवि" इति दिवोऽधिकरणत्वेन दिनिर्देशादिह च दिवः पर इत्यवाधित्त्वेन निर्देशादुपदेशस्य भिन्नरूप- त्वेन पूर्ववाक्योक्तं ब्रह्म परस्मिन्न प्रत्यभिज्ञायत इति चेत्-तन्न उभयस्मिन्नपि उपदेशे अर्थस्वभावैक्येन प्रत्यभिज्ञाया अविरोधात् । यथा—"वृक्षाग्रे श्येनो वृक्षाग्रात्परश्श्येनः" इति । तस्मात् परमपुरुष एव निरतिशयतेजस्को दिवःपरःज्योतिर्दीप्यत इति प्रति- पाद्यते ।

( ३७६ ) यदि कहें कि—"इसके अमृत स्वरूप तीन चरण द्युलोक में हैं' इस वाक्य में द्युलोक को तीन चरणों का अधिकरण कहा गया है और “द्युलोक से पर” इस वाक्य में उसकी अवधि कही गई है, इस प्रकार दोनों उपदेशों में विभिन्नता है । इसलिए ये दोनों वचन ब्रह्मवाची नहीं हैं । आपका यह कथन असंगत है । दोनों विभिन्न होते हुए भी एकार्थक हैं, इसलिए सिद्धान्त समर्थन में विरोध नहीं है । जैसे कि—"वृक्ष की फुनगी में बाज है' या 'वृक्ष के ऊपर बाज है' इस कथन में कोई अर्थ भेद नहीं है । इसलिए परम पुरुष के ही असीम तेज का 'परोदिवोज्योति- र्दीप्यते' ऐसा प्रतिपादन किया गया है । “एतावानस्य महिमा, अतोज्यायाँश्च पूरुषः, पादोऽस्य विश्वा- भूतानि, त्रिपादस्यामृतं दिवि” इति प्रतिपादितस्य चतुष्पदः परम- पुरुषस्य “वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम्, आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्” इत्याभिहिताप्राकृतरूपस्य तेजोऽप्यपाकृतमिति तद्वत्तया स एव ज्योतिःशब्दाभिधेय इति निरवद्यम् । “इसकी महिमा पुरुष नाम से भी महान है, इसके एक चरण में विश्व के समस्त भूत हैं तथा तीन अमृतमय चरण द्युलोक में व्याप्त हैं।” इस वाक्य के प्रतिपादित चतुष्पद परं पुरुष का ही “आदित्यवर्ण ( ज्योतिर्मय ) अज्ञानातीत इस महापुरुष को जानता हूँ” इस प्रकार अलौकिक वर्णन किया गया है। इससे ज्ञात होता है कि--अप्राकृत रूप संपन्न ज्योति भी अनौकिक ही है । इसलिए निर्दोष ब्रह्म ही ज्योति शब्दवाची है ऐसा सिद्ध होता है । ११, अधिकरण— निरतिशय दीप्तियुक्तं ज्योतिश्शब्दाभिधेयं प्रसिद्धवन्निर्दिष्टम् परमपुरुष एकेत्युक्तं; इदानीं कारणत्वव्याप्तामृतत्वप्राप्त्युपायतयोपास्य त्वेन श्रुत इन्द्रप्राणादिशब्दाभिधेयोऽपि परमपुरुष एवेत्याह— प्रसिद्ध की तरह निर्दिष्ट असीम दीप्तिमान् ज्योति परं पुरुष ही हैं ऐसा सिद्ध किया गया । अब कारण के अनुगत धर्म

( ३७७ ) अमरता आदि की प्राप्ति के उपाय और उपास्य भाव से प्राप्त इन्द्र और प्राण आदि भी परब्रह्म ही है, इसका प्रतिपादन करते है। प्राणस्तथानुगमात् ।१।१।२८॥ कौषीतकी ब्राह्मणे प्रतर्दनविद्यायां “प्रतर्दनो ह वै दैवोदासि रिन्द्रस्य प्रियंधामोपजगाम युद्धेन च पौरुषेण च” इत्यारभ्य “वरंवृणीष्व” इति वक्तारमिन्द्रं प्रति “त्वमेव मे वरंवृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमंमन्यसे” इति प्रतर्दनेनोक्ते “स होवाच प्राणोऽ- स्मिन् प्रज्ञात्मा तं मामायुरमृतमित्युपास्स्व” इति श्रूयते। तत्र संशयः, किमयं हिततमोपासनकर्मतयेन्द्रप्राणशब्दनिर्दिष्टो जीव एव, उत तदतिरिक्तः परमात्मा इति । किं युक्तम् ? कौषीतकि ब्राह्मण की प्रतर्दन विद्या में— 'दिवोदास का पुत्र प्रतर्दन, युद्ध और पौरुष के बल से इन्द्र के प्रिय भवन मे पहुँच गया” ऐसा प्रारंभ करके— “तुम वर की प्रार्थना करो” ऐसा उपदेष्टा इन्द्र से “तुम ही मेरे वर हो, मुझे वह उपदेश देकर स्वीकारो जिसे कि मनुष्यों के लिए हितकर समझते हो ‘ऐसा प्रतर्दन के कहने पर’ उस इन्द्र ने कहा—मै ही प्रज्ञात्मक प्राण हूँ तुम मुझे अमृत और आयु समझ कर मेरी उपासना करो” ऐसा वर्णन किया गया है। संशय होता है कि-जो हिततम उपास्य इन्द्र हैं वो प्राण शब्द निर्दिष्ट जीव है अथवा परमात्मा ? जीव एवेति, कुत ? इन्द्रशब्दस्य जीवविशेष एव प्रसिद्धेः तत्समानाधिकरणस्य प्राणशब्दस्यापि तत्रैव वृत्तेः । अयमिन्द्राभि- धानो जीवः प्रतर्दनेन “त्वमेव मे वरंवृणीष्व यं त्वं मनुष्याय हिततमं- मन्यसे” इत्युक्तः “मामुपास्व” इति स्वात्मोपासनं हिततममुपदिदेश । हिततमश्चामृतत्व प्राप्त्युपाय एव । जगत्कारणोपासनस्यैवामृतत्व प्राप्ति हेतुता— “तस्य तावदेवचिरं यावन्न विमोक्ष्ये अथ संपत्स्ये” इत्यवगता । अतः प्रसिद्ध जीवभाव इन्द्र एव कारणं ब्रह्म । ankurnagpal108@gmail.com

(nta with i-matra attached or separate). If the compositor grabbed 'न्ति' instead of 'न्त', it would print 'न्तिर'. Yes, that happens very frequently in old Hindi/Sanskrit presses! Let's print "जीवादर्थान्तरभूतं" or "जीवादर्थान्तिरभूतं"? Wait, let's look at standard transcription prompt: "pure, clean Markdown in Unicode Devanagari... Do NOT output LaTeX math syntax." If we write "जीवादर्थान्तरभूतं", a reader reading the Sanskrit will see the correct word, but if they are comparing character by character against the image, they might notice. Wait, let's look really closely at L14: Is it possible that it IS "जीवादर्थान्तरभूतं"? Look at the bar: Wait, look at "प्रज्ञात्मा आनंदोऽजरोऽमृतः" in L15. Look at L14: 'जी', 'वा', 'द', 'र्था', 'न्', 'त', 'र', 'भू', 'तं'. Wait, is there really an 'ि'? Look at the curve above 'र्था': Wait! The repha is on 'र्थ'. But there is an 'ा' matra. Wait, in Devanagari, when a letter has repha and 'ा' matra, the repha is placed on the 'ा' matra! Like 'र्था'. Now look at what is after 'र्था': There

( ३७६ ) जीवभावस्य स्वात्मन् एवोपास्यतां प्रतर्दनायोपदिशति । अत उपक्रमे जीवविशेष इत्यवगते सति “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्यादिभिरुपसंहार- स्तदनुगुण एव वर्णनीय इति चेत् । जो यह कहा कि—इन्द्र प्राण शब्द “आनंद अजर अमर” से एकार्थक होने से ब्रह्म के ही बोधक हैं सो ठीक नहीं जंचता क्योंकि— “मुझे ही प्रज्ञात्मक प्राण जानो और मेरे इस अमृत आयुरूप की उपासना करो” ऐसा कहने वाले इन्द्र ने “तीन सिर वाले त्वष्ट्रा का मैंने वध किया” इत्यादि से ज्ञात त्वष्ट्रा के वधकर्त्ता होने से, जीव रूप अपने को ही उपास्य रूप से प्रतर्दन विद्या में उपदेश किया है । इस उपक्रम के अनुसार ही “आनंद अजर अमर” इस उपसंहारात्मक वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । परिहरति-अध्यात्मसंबंध भूमाह्यस्मिन्नात्मनि यः संबंधः सो अध्यात्म संबंधः । तस्य भूमा-भूयस्त्वम्-बहुत्वमित्यर्थः । आत्म- न्याधेयतया संबंध्यमानानां बहुत्वेन संबंध बहुत्वम् । तच्चास्मि- न्वक्तरि परमात्मन्येव हि संभवति । उक्त संशय का परिहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं—आत्मा का जो संबंध है वह अध्यात्म है जो कि—भूमा अर्थात् बाहुल्य बोधक है । आत्मा में आधेय रूप से जो अनेक गुणों का संबंध बाहुल्य दिखलाया गया है वह परमात्मा में ही संभव हो सकता है । “तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽजरोऽमृतः” इति भूतमात्राशब्देनाचेतनवस्तुजातमभिधाय प्रज्ञामात्रा शब्देन तदाधारतया प्रकृतमिन्द्रप्राणशब्दाभिधेयं निर्दिश्य तमेव “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्युपदिशति । तदेतच्चेतना चेतनात्मक कृत्स्नवस्त्वाधारत्वंजीवादर्थान्तरभूतेऽस्मिन् परमात्म- न्येवोपपद्यत इत्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com

( ३८० ) जैसे कि—"रथ के आराओं में नेमि बंधा रहता है आरा नाभि में बंधे रहते हैं, वैसे ही ये भूतमात्रायें, प्रज्ञामात्राओं में बंधी रहती हैं, प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं, वह प्राण ही प्रज्ञात्म आनंद, अजर अमृत है" यहाँ भूतमात्रा से अचेतन वस्तुओं का निर्देश करके, प्रज्ञामात्र चेतनवर्ग को उसका आधार बतलाते हुए उसके भी आधाररूप इन्द्र को ही प्राण बतलाया गया है तथा उसे ही 'आनंद अजर अमर' कहा गया है। अर्थात्—यह समस्त जड चेतनात्मक का आधार स्वरूप, जीव से विलक्षण परमात्मा का ही उपपादन किया गया है। अथवा—अध्यात्मसंबंधभूमाह्यस्मिन्-परमात्मा-साधारण धर्म- संबंधोऽध्यात्म संबंधः। तस्य भूमा बहुत्वं हि अस्मिन् प्रकरणे विद्यते। तथाहि प्रथम "त्वमेव मे वरं वृणीष्व यं त्व मनुष्याय हिततमं मन्यसे" इति। "मामुपास्स्व" इति च परमात्मासाधारण- मोक्षसाधनोपासनकर्मत्वं प्राणशब्दनिर्दिष्टस्येन्द्रस्य प्रतीयते । "अध्यात्म संबंधभूमाह्यस्मिन्" का यह भी तात्पर्य हो सकता है कि—परमात्मा की जो असाधारण विशेषतायें हैं वह उनके अतिरिक्त किसी अन्य में संभव नहीं हैं, इस प्रकरण में उनको ही बाहुल्य बोधक भूमा शब्द से निर्देश किया गया है। तभी तो—"मनुष्यों के लिए जिसे हिततम समझते हो उसे मुझे उपदेश करो "ऐसा प्रतर्दन के कहने पर" मेरी ही उपासना करो" ऐसा परमात्मा का असाधारण, मोक्ष का साधनीभूत उपासना कर्म प्राणशब्द वाची ब्रह्म के लिए ही बतलाया गया प्रतीत होता है । तथा—"एष एव साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति एष एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषति", इति सर्वस्य कर्मणः कारयितृत्वं च परमात्मधर्मः । तथा—"उन्हीं से साधुकर्म कराते हैं, जिन्हें वे ऊर्ध्वगति देना चाहते हैं, जिन्हें नीचे गिराना चाहते हैं उनसे असाधु कर्म कराते हैं" इस श्रुति से ज्ञात होता है कि-असाधारण सभी प्रकार के कर्म कराने की सामर्थ्य परमात्मा की ही है। ankurnagpal108@gmail.com

( ३८१ ) तथा—"तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावारा अर्पिताः एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः, प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः" इतिसर्वाधारत्वं च तस्यैव धर्मः । तथा—"जैसे कि-रथ के आरों में निमि बंधी रहती है आरे नाभि से बंधे रहते हैं, वैसे ही भूतमात्रायें, प्रज्ञासात्राओं में बंधी रहती हैं तथा प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं। इस श्रुति से परमात्मा की सर्वाधारकता भी ज्ञात होती है । तथा—"स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽनंदोऽजरोऽमृतः" इत्येतेऽपि परमात्मन एव धर्माः । एष लोकाधिपतिरेष सर्वेशः" इति च परमात्मन्येव संभवति । तदेवमध्यात्मसंबंधभूम्नोऽत्र विद्यमानत्वात् परमात्मैवात्रेन्द्रप्राणशब्द निर्दिष्टः । तथा—"वही प्राण, प्रज्ञात्मा, आनन्द अजर और अमर है" इत्यादि भी परमात्मा के ही धर्म निश्चित होते हैं । "यही

( ३८२ ) आत्म दर्शन के भाव से कहा है। अन्य प्रमाणों में जो जीवात्म चिन्तन की बात है, उस भाव से नहीं कहा है। एतदुक्तं भवति—“अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्”—अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानां सर्वात्मा”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽ- त्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”—एष सर्वभूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एकोनारायणः”—इत्येवमादीनां शास्त्रेण जीवात्मशरीरकं परमात्मानमवगम्य जीवात्मवाचिनामहंत्वमादि शब्दानामपि परमात्मन्येव पर्यवसानं ज्ञात्वा “मामेव विजानीहि”— मामुपास्स्व” इति स्वात्मशरीरकं परमात्मानमेवोपास्यत्वेनोप- दिदेश। कहने का तात्पर्य यह है कि—“इस जीव में स्वयं प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा” ये सारा जगत परमात्मा रूप ही है— “प्राणिमात्र का आत्मा, अन्तः करण में विराज कर संयमन करता है”— जो कि जीवात्मा से भिन्न है, जीवात्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है जो कि-आत्मा में रहकर आत्मा का संयमन करता है”—यही प्राणिमात्र के अन्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं” इत्यादि शास्त्र वाक्यों से जीवात्मा रूप शरीर वाले परमात्मा को जानकर, जीवात्मवाची अहं त्वं आदि शब्दों की अंतिम सीमा परमात्मा ही है, ऐसा समझकर “मुझे ही जानो” मेरी ही उपासना करो” इत्यादि में अपने आत्मा के शरीरी परमात्मा का उपास्यरूप से उपदेश दिया गया है। वामदेववत्—यथा वामदेवः परस्यब्रह्मणः सर्वान्तरात्मत्वं सर्वस्य च तच्छरीरत्वं, शरीरवाचिनां च शब्दानां शरीरिणि पर्यवसानं पश्यन् “अहम्” इति स्वात्मशरीरकं परंब्रह्म निर्दिश्य, तत्समानाधिकरण्येन मनुसूर्यादीन् व्यपदिशति “तद्धैतत्पश्यन्नृषि- ankurnagpal108@gmail.com

( ३८३ ) र्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्य्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः” इत्यादिना । यथा च प्रह्लादः” सर्वंगतत्वादनंतस्य स एवाहंमवस्थितः मत्तः सर्वमहं सर्वमपि सर्वं सनातने” इत्यादि वदति । जैसे कि वामदेव ऋषि ने, परब्रह्म को सर्वान्तर्यामी जीवात्मा का शरीरी कहा है-शरीरवाची शब्दों की अंतिम सीमा जानकर, आत्मशरीरी परब्रह्म की ओर लक्ष्य करके उन्होंने “अहं” शब्द से सूर्य मनु आदि का सामानाधिकरण बतलाया है । उन्होंने प्रसिद्ध ब्रह्म तत्त्व का उपदेश करते हुए कहा कि—"मैं ही सूर्य और मनु हुआ और मैं ही कक्षीवान् ऋषि हूं" इत्यादि । ऐसे ही प्रह्लाद ने भी कहा था “अनंत ब्रह्म सर्वगत हैं, मैं भी उन्हीं में स्थित हूं, मुझसे ही सारा जगत हुआ है ।” अस्मिन् प्रकरणे जीववाचिभिशब्दैरचित्विशेषाभिधायिभिश- चोपास्यभूतस्य परस्यब्रह्मणोऽभिधाने कारणं चोद्यपूर्वकमाह— इस प्रकरण में जीव वाची शब्दों तथा अचिद्विशेषाभिधायि शब्दों द्वारा उपास्य ब्रह्म का उपदेश दिया गया है, इसी तथ्य को शंका समाधान पूर्वक पुनः कहते हैं— जीवमुख्यप्राण लिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्त्वादिह तद्योगात् १।१।३२॥ “न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ” त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्र- महनम् “अरुन्मुखान्यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छम्” इत्यादि जीवंलिगात् “यावदस्मिन् शरीरे प्राणो वसतितावदायूः” अथखलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति” इति मुख्य प्राण लिंगाच्च नाध्यात्मसंबंधभूमेति चेत्-न, उपासात्रैविध्यात् हेतोः, उपासनात्रैविध्यमुपदेष्टुं तत्तच्छब्देनाभिधानम्-निखिल कारणभूतस्य ब्रह्मणः स्वरूपेणानुसंधानम्, भोक्तृवर्ग शरीरकत्वानुसंधानं भोग्य- भोगोपकरणशरीरकत्वानुसंधानंचेति, त्रिविधमनुसंधानमुपदेष्टु- मित्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com

( ३८४ ) “वाक्य विषयक जिज्ञासा मत करो वाचक को जानने की चेष्टा करो” तीन शिर वाले, त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को मारा “वेदानभिज्ञ यतियों को गृहपालित कुत्तों की तरह दिया” इत्यादि जीववाची प्रमाणों तथा “इस शरीर में जब तक प्राण रहते हैं तभी तक शरीर की आयु होती है” प्रज्ञात्मक प्राण ही शरीर को सहारा देकर उठाता है” इत्यादि मुख्य प्राण वाची प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-अध्यात्म सम्बन्धी बाहुल्य ही शास्त्रों का अभिधेय नहीं है। उक्त कथन उपयुक्त नहीं है—क्यो कि शास्त्रों में तीन प्रकार की उपासना बतलाई गई है (१) निखिल कारण स्वरूप ब्रह्म का उसके रूप में ही अनुसंधान (२) भोक्ता शरीरक जीवात्मा का अनुसंधान (३) भोग्य शरीर का अनुसंधान। अर्थात् तीन प्रकार के अनुसंधानों का उपदेश मिलता है। तदिदं त्रिविधं ब्रह्मानुसंधानं प्रकरणान्तरेष्वप्याश्रितम्— “सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म” “आनंदोब्रह्म” इत्यादिषु स्वरूपानुसंधानम्। तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत्, निरुक्तं चानिरुक्तं च, निलयनं चानिलयनं च, विज्ञानं चाविज्ञानं, सत्यं चानृतं च, सत्यमभवत् ।” इत्यादिषु भोक्तृशरीरतया, भोग्यभोगोप- करणशरीरतया चानुसंधानम्। इहापि प्रकरणे त्रिविधमनुसंधानं युज्यत एवेत्यर्थः। उक्त तीनों प्रकार के अनसंधानों का वर्णन विभिन्न श्रुतियो में मिलता है-- “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है “ब्रह्म आनन्द स्वरूप है” इत्यादि श्रुतियों में स्वरूपानुसंधान का निर्देश है। “उसकी रचना करके उसी में प्रविष्ट हो गए, उसमें प्रविष्ट होकर सत् और त्यत् (परोक्ष अपरोक्ष) निरुक्त और अनिरुक्त (वाच्य और अनिर्वाच्य) निलयन और अनिलयन (माश्रित और अनाश्रित) विज्ञान और अविज्ञान (चेतन और जड़) सत्य और असत्य हुये” इत्यादि श्रुति, भोक्ता जीव और भोग्य शरीर के रूप में अनुसंधान का उपदेश देती है। इस इन्द्र प्रणादि प्रकरण में भी त्रिविध ब्रह्मानुसंधान का ही उपदेश है, ऐसा मानना चाहिये। ankurnagpal108@gmail.com