भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 442, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 442

( ३८२ ) आत्म दर्शन के भाव से कहा है। अन्य प्रमाणों में जो जीवात्म चिन्तन की बात है, उस भाव से नहीं कहा है। एतदुक्तं भवति—“अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्”—अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानां सर्वात्मा”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽ- त्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”—एष सर्वभूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एकोनारायणः”—इत्येवमादीनां शास्त्रेण जीवात्मशरीरकं परमात्मानमवगम्य जीवात्मवाचिनामहंत्वमादि शब्दानामपि परमात्मन्येव पर्यवसानं ज्ञात्वा “मामेव विजानीहि”— मामुपास्स्व” इति स्वात्मशरीरकं परमात्मानमेवोपास्यत्वेनोप- दिदेश। कहने का तात्पर्य यह है कि—“इस जीव में स्वयं प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा” ये सारा जगत परमात्मा रूप ही है— “प्राणिमात्र का आत्मा, अन्तः करण में विराज कर संयमन करता है”— जो कि जीवात्मा से भिन्न है, जीवात्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है जो कि-आत्मा में रहकर आत्मा का संयमन करता है”—यही प्राणिमात्र के अन्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं” इत्यादि शास्त्र वाक्यों से जीवात्मा रूप शरीर वाले परमात्मा को जानकर, जीवात्मवाची अहं त्वं आदि शब्दों की अंतिम सीमा परमात्मा ही है, ऐसा समझकर “मुझे ही जानो” मेरी ही उपासना करो” इत्यादि में अपने आत्मा के शरीरी परमात्मा का उपास्यरूप से उपदेश दिया गया है। वामदेववत्—यथा वामदेवः परस्यब्रह्मणः सर्वान्तरात्मत्वं सर्वस्य च तच्छरीरत्वं, शरीरवाचिनां च शब्दानां शरीरिणि पर्यवसानं पश्यन् “अहम्” इति स्वात्मशरीरकं परंब्रह्म निर्दिश्य, तत्समानाधिकरण्येन मनुसूर्यादीन् व्यपदिशति “तद्धैतत्पश्यन्नृषि- ankurnagpal108@gmail.com