श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 441, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ३८१ ) तथा—"तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावारा अर्पिताः एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः, प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः" इतिसर्वाधारत्वं च तस्यैव धर्मः । तथा—"जैसे कि-रथ के आरों में निमि बंधी रहती है आरे नाभि से बंधे रहते हैं, वैसे ही भूतमात्रायें, प्रज्ञासात्राओं में बंधी रहती हैं तथा प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं। इस श्रुति से परमात्मा की सर्वाधारकता भी ज्ञात होती है । तथा—"स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽनंदोऽजरोऽमृतः" इत्येतेऽपि परमात्मन एव धर्माः । एष लोकाधिपतिरेष सर्वेशः" इति च परमात्मन्येव संभवति । तदेवमध्यात्मसंबंधभूम्नोऽत्र विद्यमानत्वात् परमात्मैवात्रेन्द्रप्राणशब्द निर्दिष्टः । तथा—"वही प्राण, प्रज्ञात्मा, आनन्द अजर और अमर है" इत्यादि भी परमात्मा के ही धर्म निश्चित होते हैं । "यही