श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८० ) जैसे कि—"रथ के आराओं में नेमि बंधा रहता है आरा नाभि में बंधे रहते हैं, वैसे ही ये भूतमात्रायें, प्रज्ञामात्राओं में बंधी रहती हैं, प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं, वह प्राण ही प्रज्ञात्म आनंद, अजर अमृत है" यहाँ भूतमात्रा से अचेतन वस्तुओं का निर्देश करके, प्रज्ञामात्र चेतनवर्ग को उसका आधार बतलाते हुए उसके भी आधाररूप इन्द्र को ही प्राण बतलाया गया है तथा उसे ही 'आनंद अजर अमर' कहा गया है। अर्थात्—यह समस्त जड चेतनात्मक का आधार स्वरूप, जीव से विलक्षण परमात्मा का ही उपपादन किया गया है। अथवा—अध्यात्मसंबंधभूमाह्यस्मिन्-परमात्मा-साधारण धर्म- संबंधोऽध्यात्म संबंधः। तस्य भूमा बहुत्वं हि अस्मिन् प्रकरणे विद्यते। तथाहि प्रथम "त्वमेव मे वरं वृणीष्व यं त्व मनुष्याय हिततमं मन्यसे" इति। "मामुपास्स्व" इति च परमात्मासाधारण- मोक्षसाधनोपासनकर्मत्वं प्राणशब्दनिर्दिष्टस्येन्द्रस्य प्रतीयते । "अध्यात्म संबंधभूमाह्यस्मिन्" का यह भी तात्पर्य हो सकता है कि—परमात्मा की जो असाधारण विशेषतायें हैं वह उनके अतिरिक्त किसी अन्य में संभव नहीं हैं, इस प्रकरण में उनको ही बाहुल्य बोधक भूमा शब्द से निर्देश किया गया है। तभी तो—"मनुष्यों के लिए जिसे हिततम समझते हो उसे मुझे उपदेश करो "ऐसा प्रतर्दन के कहने पर" मेरी ही उपासना करो" ऐसा परमात्मा का असाधारण, मोक्ष का साधनीभूत उपासना कर्म प्राणशब्द वाची ब्रह्म के लिए ही बतलाया गया प्रतीत होता है । तथा—"एष एव साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति एष एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषति", इति सर्वस्य कर्मणः कारयितृत्वं च परमात्मधर्मः । तथा—"उन्हीं से साधुकर्म कराते हैं, जिन्हें वे ऊर्ध्वगति देना चाहते हैं, जिन्हें नीचे गिराना चाहते हैं उनसे असाधु कर्म कराते हैं" इस श्रुति से ज्ञात होता है कि-असाधारण सभी प्रकार के कर्म कराने की सामर्थ्य परमात्मा की ही है। ankurnagpal108@gmail.com