श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३७६ ) जीवभावस्य स्वात्मन् एवोपास्यतां प्रतर्दनायोपदिशति । अत उपक्रमे जीवविशेष इत्यवगते सति “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्यादिभिरुपसंहार- स्तदनुगुण एव वर्णनीय इति चेत् । जो यह कहा कि—इन्द्र प्राण शब्द “आनंद अजर अमर” से एकार्थक होने से ब्रह्म के ही बोधक हैं सो ठीक नहीं जंचता क्योंकि— “मुझे ही प्रज्ञात्मक प्राण जानो और मेरे इस अमृत आयुरूप की उपासना करो” ऐसा कहने वाले इन्द्र ने “तीन सिर वाले त्वष्ट्रा का मैंने वध किया” इत्यादि से ज्ञात त्वष्ट्रा के वधकर्त्ता होने से, जीव रूप अपने को ही उपास्य रूप से प्रतर्दन विद्या में उपदेश किया है । इस उपक्रम के अनुसार ही “आनंद अजर अमर” इस उपसंहारात्मक वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । परिहरति-अध्यात्मसंबंध भूमाह्यस्मिन्नात्मनि यः संबंधः सो अध्यात्म संबंधः । तस्य भूमा-भूयस्त्वम्-बहुत्वमित्यर्थः । आत्म- न्याधेयतया संबंध्यमानानां बहुत्वेन संबंध बहुत्वम् । तच्चास्मि- न्वक्तरि परमात्मन्येव हि संभवति । उक्त संशय का परिहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं—आत्मा का जो संबंध है वह अध्यात्म है जो कि—भूमा अर्थात् बाहुल्य बोधक है । आत्मा में आधेय रूप से जो अनेक गुणों का संबंध बाहुल्य दिखलाया गया है वह परमात्मा में ही संभव हो सकता है । “तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽजरोऽमृतः” इति भूतमात्राशब्देनाचेतनवस्तुजातमभिधाय प्रज्ञामात्रा शब्देन तदाधारतया प्रकृतमिन्द्रप्राणशब्दाभिधेयं निर्दिश्य तमेव “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्युपदिशति । तदेतच्चेतना चेतनात्मक कृत्स्नवस्त्वाधारत्वंजीवादर्थान्तरभूतेऽस्मिन् परमात्म- न्येवोपपद्यत इत्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com