श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
( ३७६ ) जीवभावस्य स्वात्मन् एवोपास्यतां प्रतर्दनायोपदिशति । अत उपक्रमे जीवविशेष इत्यवगते सति “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्यादिभिरुपसंहार- स्तदनुगुण एव वर्णनीय इति चेत् । जो यह कहा कि—इन्द्र प्राण शब्द “आनंद अजर अमर” से एकार्थक होने से ब्रह्म के ही बोधक हैं सो ठीक नहीं जंचता क्योंकि— “मुझे ही प्रज्ञात्मक प्राण जानो और मेरे इस अमृत आयुरूप की उपासना करो” ऐसा कहने वाले इन्द्र ने “तीन सिर वाले त्वष्ट्रा का मैंने वध किया” इत्यादि से ज्ञात त्वष्ट्रा के वधकर्त्ता होने से, जीव रूप अपने को ही उपास्य रूप से प्रतर्दन विद्या में उपदेश किया है । इस उपक्रम के अनुसार ही “आनंद अजर अमर” इस उपसंहारात्मक वाक्य की भी व्याख्या करनी चाहिए । परिहरति-अध्यात्मसंबंध भूमाह्यस्मिन्नात्मनि यः संबंधः सो अध्यात्म संबंधः । तस्य भूमा-भूयस्त्वम्-बहुत्वमित्यर्थः । आत्म- न्याधेयतया संबंध्यमानानां बहुत्वेन संबंध बहुत्वम् । तच्चास्मि- न्वक्तरि परमात्मन्येव हि संभवति । उक्त संशय का परिहार करते हुए सूत्रकार कहते हैं—आत्मा का जो संबंध है वह अध्यात्म है जो कि—भूमा अर्थात् बाहुल्य बोधक है । आत्मा में आधेय रूप से जो अनेक गुणों का संबंध बाहुल्य दिखलाया गया है वह परमात्मा में ही संभव हो सकता है । “तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावरा अर्पिता एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽजरोऽमृतः” इति भूतमात्राशब्देनाचेतनवस्तुजातमभिधाय प्रज्ञामात्रा शब्देन तदाधारतया प्रकृतमिन्द्रप्राणशब्दाभिधेयं निर्दिश्य तमेव “आनंदोऽजरोऽमृतः” इत्युपदिशति । तदेतच्चेतना चेतनात्मक कृत्स्नवस्त्वाधारत्वंजीवादर्थान्तरभूतेऽस्मिन् परमात्म- न्येवोपपद्यत इत्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com
( ३८० ) जैसे कि—"रथ के आराओं में नेमि बंधा रहता है आरा नाभि में बंधे रहते हैं, वैसे ही ये भूतमात्रायें, प्रज्ञामात्राओं में बंधी रहती हैं, प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं, वह प्राण ही प्रज्ञात्म आनंद, अजर अमृत है" यहाँ भूतमात्रा से अचेतन वस्तुओं का निर्देश करके, प्रज्ञामात्र चेतनवर्ग को उसका आधार बतलाते हुए उसके भी आधाररूप इन्द्र को ही प्राण बतलाया गया है तथा उसे ही 'आनंद अजर अमर' कहा गया है। अर्थात्—यह समस्त जड चेतनात्मक का आधार स्वरूप, जीव से विलक्षण परमात्मा का ही उपपादन किया गया है। अथवा—अध्यात्मसंबंधभूमाह्यस्मिन्-परमात्मा-साधारण धर्म- संबंधोऽध्यात्म संबंधः। तस्य भूमा बहुत्वं हि अस्मिन् प्रकरणे विद्यते। तथाहि प्रथम "त्वमेव मे वरं वृणीष्व यं त्व मनुष्याय हिततमं मन्यसे" इति। "मामुपास्स्व" इति च परमात्मासाधारण- मोक्षसाधनोपासनकर्मत्वं प्राणशब्दनिर्दिष्टस्येन्द्रस्य प्रतीयते । "अध्यात्म संबंधभूमाह्यस्मिन्" का यह भी तात्पर्य हो सकता है कि—परमात्मा की जो असाधारण विशेषतायें हैं वह उनके अतिरिक्त किसी अन्य में संभव नहीं हैं, इस प्रकरण में उनको ही बाहुल्य बोधक भूमा शब्द से निर्देश किया गया है। तभी तो—"मनुष्यों के लिए जिसे हिततम समझते हो उसे मुझे उपदेश करो "ऐसा प्रतर्दन के कहने पर" मेरी ही उपासना करो" ऐसा परमात्मा का असाधारण, मोक्ष का साधनीभूत उपासना कर्म प्राणशब्द वाची ब्रह्म के लिए ही बतलाया गया प्रतीत होता है । तथा—"एष एव साधुकर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषति एष एवासाधुकर्म कारयति तं यमधो निनीषति", इति सर्वस्य कर्मणः कारयितृत्वं च परमात्मधर्मः । तथा—"उन्हीं से साधुकर्म कराते हैं, जिन्हें वे ऊर्ध्वगति देना चाहते हैं, जिन्हें नीचे गिराना चाहते हैं उनसे असाधु कर्म कराते हैं" इस श्रुति से ज्ञात होता है कि-असाधारण सभी प्रकार के कर्म कराने की सामर्थ्य परमात्मा की ही है। ankurnagpal108@gmail.com
( ३८१ ) तथा—"तद्यथा रथस्यारेषु नेमिरर्पिता नाभावारा अर्पिताः एवमेवैता भूतमात्राः प्रज्ञामात्रास्वर्पिताः, प्रज्ञामात्राः प्राणेऽर्पिताः" इतिसर्वाधारत्वं च तस्यैव धर्मः । तथा—"जैसे कि-रथ के आरों में निमि बंधी रहती है आरे नाभि से बंधे रहते हैं, वैसे ही भूतमात्रायें, प्रज्ञासात्राओं में बंधी रहती हैं तथा प्रज्ञामात्रायें प्राण में बंधी रहती हैं। इस श्रुति से परमात्मा की सर्वाधारकता भी ज्ञात होती है । तथा—"स एष प्राण एव प्रज्ञात्माऽनंदोऽजरोऽमृतः" इत्येतेऽपि परमात्मन एव धर्माः । एष लोकाधिपतिरेष सर्वेशः" इति च परमात्मन्येव संभवति । तदेवमध्यात्मसंबंधभूम्नोऽत्र विद्यमानत्वात् परमात्मैवात्रेन्द्रप्राणशब्द निर्दिष्टः । तथा—"वही प्राण, प्रज्ञात्मा, आनन्द अजर और अमर है" इत्यादि भी परमात्मा के ही धर्म निश्चित होते हैं । "यही
( ३८२ ) आत्म दर्शन के भाव से कहा है। अन्य प्रमाणों में जो जीवात्म चिन्तन की बात है, उस भाव से नहीं कहा है। एतदुक्तं भवति—“अनेन जीवेनाऽत्मनाऽनुप्रविश्य नामरूपे व्याकरवाणि”—ऐतदात्म्यमिदं सर्वम्”—अन्तः प्रविष्टश्शास्ता जनानां सर्वात्मा”—य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरो यमात्मा न वेद यस्याऽ- त्मा शरीरं य आत्मानमंतरो यमयति”—एष सर्वभूतान्तरात्मा अपहतपाप्मा दिव्यो देव एकोनारायणः”—इत्येवमादीनां शास्त्रेण जीवात्मशरीरकं परमात्मानमवगम्य जीवात्मवाचिनामहंत्वमादि शब्दानामपि परमात्मन्येव पर्यवसानं ज्ञात्वा “मामेव विजानीहि”— मामुपास्स्व” इति स्वात्मशरीरकं परमात्मानमेवोपास्यत्वेनोप- दिदेश। कहने का तात्पर्य यह है कि—“इस जीव में स्वयं प्रविष्ट होकर नामरूप का विस्तार करूँगा” ये सारा जगत परमात्मा रूप ही है— “प्राणिमात्र का आत्मा, अन्तः करण में विराज कर संयमन करता है”— जो कि जीवात्मा से भिन्न है, जीवात्मा जिसे नहीं जानता, आत्मा उसका शरीर है जो कि-आत्मा में रहकर आत्मा का संयमन करता है”—यही प्राणिमात्र के अन्तर्यामी निष्पाप दिव्य देव एक नारायण हैं” इत्यादि शास्त्र वाक्यों से जीवात्मा रूप शरीर वाले परमात्मा को जानकर, जीवात्मवाची अहं त्वं आदि शब्दों की अंतिम सीमा परमात्मा ही है, ऐसा समझकर “मुझे ही जानो” मेरी ही उपासना करो” इत्यादि में अपने आत्मा के शरीरी परमात्मा का उपास्यरूप से उपदेश दिया गया है। वामदेववत्—यथा वामदेवः परस्यब्रह्मणः सर्वान्तरात्मत्वं सर्वस्य च तच्छरीरत्वं, शरीरवाचिनां च शब्दानां शरीरिणि पर्यवसानं पश्यन् “अहम्” इति स्वात्मशरीरकं परंब्रह्म निर्दिश्य, तत्समानाधिकरण्येन मनुसूर्यादीन् व्यपदिशति “तद्धैतत्पश्यन्नृषि- ankurnagpal108@gmail.com
( ३८३ ) र्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्य्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः” इत्यादिना । यथा च प्रह्लादः” सर्वंगतत्वादनंतस्य स एवाहंमवस्थितः मत्तः सर्वमहं सर्वमपि सर्वं सनातने” इत्यादि वदति । जैसे कि वामदेव ऋषि ने, परब्रह्म को सर्वान्तर्यामी जीवात्मा का शरीरी कहा है-शरीरवाची शब्दों की अंतिम सीमा जानकर, आत्मशरीरी परब्रह्म की ओर लक्ष्य करके उन्होंने “अहं” शब्द से सूर्य मनु आदि का सामानाधिकरण बतलाया है । उन्होंने प्रसिद्ध ब्रह्म तत्त्व का उपदेश करते हुए कहा कि—"मैं ही सूर्य और मनु हुआ और मैं ही कक्षीवान् ऋषि हूं" इत्यादि । ऐसे ही प्रह्लाद ने भी कहा था “अनंत ब्रह्म सर्वगत हैं, मैं भी उन्हीं में स्थित हूं, मुझसे ही सारा जगत हुआ है ।” अस्मिन् प्रकरणे जीववाचिभिशब्दैरचित्विशेषाभिधायिभिश- चोपास्यभूतस्य परस्यब्रह्मणोऽभिधाने कारणं चोद्यपूर्वकमाह— इस प्रकरण में जीव वाची शब्दों तथा अचिद्विशेषाभिधायि शब्दों द्वारा उपास्य ब्रह्म का उपदेश दिया गया है, इसी तथ्य को शंका समाधान पूर्वक पुनः कहते हैं— जीवमुख्यप्राण लिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्त्वादिह तद्योगात् १।१।३२॥ “न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ” त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्र- महनम् “अरुन्मुखान्यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छम्” इत्यादि जीवंलिगात् “यावदस्मिन् शरीरे प्राणो वसतितावदायूः” अथखलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति” इति मुख्य प्राण लिंगाच्च नाध्यात्मसंबंधभूमेति चेत्-न, उपासात्रैविध्यात् हेतोः, उपासनात्रैविध्यमुपदेष्टुं तत्तच्छब्देनाभिधानम्-निखिल कारणभूतस्य ब्रह्मणः स्वरूपेणानुसंधानम्, भोक्तृवर्ग शरीरकत्वानुसंधानं भोग्य- भोगोपकरणशरीरकत्वानुसंधानंचेति, त्रिविधमनुसंधानमुपदेष्टु- मित्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com
( ३८४ ) “वाक्य विषयक जिज्ञासा मत करो वाचक को जानने की चेष्टा करो” तीन शिर वाले, त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को मारा “वेदानभिज्ञ यतियों को गृहपालित कुत्तों की तरह दिया” इत्यादि जीववाची प्रमाणों तथा “इस शरीर में जब तक प्राण रहते हैं तभी तक शरीर की आयु होती है” प्रज्ञात्मक प्राण ही शरीर को सहारा देकर उठाता है” इत्यादि मुख्य प्राण वाची प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-अध्यात्म सम्बन्धी बाहुल्य ही शास्त्रों का अभिधेय नहीं है। उक्त कथन उपयुक्त नहीं है—क्यो कि शास्त्रों में तीन प्रकार की उपासना बतलाई गई है (१) निखिल कारण स्वरूप ब्रह्म का उसके रूप में ही अनुसंधान (२) भोक्ता शरीरक जीवात्मा का अनुसंधान (३) भोग्य शरीर का अनुसंधान। अर्थात् तीन प्रकार के अनुसंधानों का उपदेश मिलता है। तदिदं त्रिविधं ब्रह्मानुसंधानं प्रकरणान्तरेष्वप्याश्रितम्— “सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म” “आनंदोब्रह्म” इत्यादिषु स्वरूपानुसंधानम्। तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत्, निरुक्तं चानिरुक्तं च, निलयनं चानिलयनं च, विज्ञानं चाविज्ञानं, सत्यं चानृतं च, सत्यमभवत् ।” इत्यादिषु भोक्तृशरीरतया, भोग्यभोगोप- करणशरीरतया चानुसंधानम्। इहापि प्रकरणे त्रिविधमनुसंधानं युज्यत एवेत्यर्थः। उक्त तीनों प्रकार के अनसंधानों का वर्णन विभिन्न श्रुतियो में मिलता है-- “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है “ब्रह्म आनन्द स्वरूप है” इत्यादि श्रुतियों में स्वरूपानुसंधान का निर्देश है। “उसकी रचना करके उसी में प्रविष्ट हो गए, उसमें प्रविष्ट होकर सत् और त्यत् (परोक्ष अपरोक्ष) निरुक्त और अनिरुक्त (वाच्य और अनिर्वाच्य) निलयन और अनिलयन (माश्रित और अनाश्रित) विज्ञान और अविज्ञान (चेतन और जड़) सत्य और असत्य हुये” इत्यादि श्रुति, भोक्ता जीव और भोग्य शरीर के रूप में अनुसंधान का उपदेश देती है। इस इन्द्र प्रणादि प्रकरण में भी त्रिविध ब्रह्मानुसंधान का ही उपदेश है, ऐसा मानना चाहिये। ankurnagpal108@gmail.com
( ३८५ ) एतदुक्तं भवति-यत्र हिरण्यगर्भादिजीवविशेषाणां प्रकृत्याद्य- चेतनविशेषाणां च परमात्मासाधारणधर्मयोगतदभिधायिनां शब्दानांपरमात्मवाचिशब्दैः सामानाधिकरण्यं वा दृश्यते । तत्र परमात्मानः तत्तच्चिदाचिद्विशेषान्तरात्मत्वानुसंधानं प्रतिपिपा- दयिषितम्-इति । अतोऽत्रे'न्द्रप्राणशब्दनिर्दिष्टोजीवादर्थान्तरभूतः परमात्मैवेति सिद्धम् । कहने का तात्पर्य यह है कि—जहाँ परमात्मा की असाधारण विशेषताओं के साथ हिरण्यगर्भ आदि विशिष्ट जीवों का अथवा प्रकृति आदि विशिष्ट अचेतनों का योग दिखलाई देता है अथवा हिरण्यगर्भ आदि विशिष्ट जीवों के वाचक या प्रकृति आदि शरीर वाचक शब्दों का, परमात्म सम्बन्धी शब्दों के साथ सामानाधिकरण्य दिखलाया गया है, उससे समझना चाहिए कि परमात्मा के इन दोनों जड़ और चेतन रूपों के अन्तरात्मानुसंधान का प्रतिपादन किया गया है । इससे निश्चित होता है कि-उक्त प्रकरण में भी, जीव से विलक्षण परमात्मा का ही, इन्द्र प्राण आदि शब्दों से प्रतिपादन किया गया है । प्रथम पाद समाप्त
[ प्रथम अध्याय ] [ द्वितीय पाद ] प्रथमपादे अधीतवेदः पुरुषः कर्ममीमांसाश्रवणाधि- गतकर्म याथात्म्यविज्ञानः केवल कर्मणामल्पास्थिरफलत्वमवगम्य वेदांतवाक्येषुचापातप्रतीतानंतस्थिरफल ब्रह्मस्वरूप तदुपासनसमुप- जातपरमपुरुषार्थलक्षणमोक्षापेक्षोऽवधारित परिनिष्पन्न वस्तुबोधन- शब्दशक्तिः वेदांतवाक्यानां परस्मिन्ब्रह्मणि निश्चितप्रमाणाभावस्त- दितिकर्त्तव्यतारूपशारीरकमीमांसा श्रवणमारेभेतेत्युक्तं शास्त्रारंभ सिद्धये । प्रथमपाद मे कहा गया कि-वेदाध्ययन के उपरान्त कर्ममीमांसा के श्रवण करने पर कर्म सम्बन्धी ज्ञान होता है और धारणा बनती है कि- उपासना हीन कर्म का फल अल्प और अस्थिर है तथा वेदांत वाक्यो का मनन करने पर धारणा बनती है कि-ब्रह्म स्वरूप की अवगति ही अनन्त और स्थिर फल दायक है, तभी परमपुरुषार्थ मोक्ष की प्राप्ति की अभिलाषा से ब्रह्मतत्व के जानने की आकांक्षा होती है। स्वतः सिद्ध परब्रह्म को प्रमाणित करने में एकमात्र शास्त्र ही सक्षम हैं। परब्रह्म प्रतिपादक शास्त्रवाक्यों से ब्रह्म स्वरूप का यथार्थ निर्णय करने वाले शारीरक ब्रह्मसूत्रों के अध्ययन की ओर स्वाभाविक रुचि होती है, ऐसा शारीरक मीमांसा की भूमिका में ही बतलाया गया । अनंत विचित्रस्थिरत्रसरूप भक्तभोग्यभोगोपकरण भोगस्थान- लक्षणनिखिलजगदुदयविभवलयमहानंदैक्कारणं परंब्रह्म “यतो वा इमानि” इत्यादि वाक्यं बोधयतीति च प्रत्यपादि । ankurnagpal108@gmail.com
पदम्). Forms of साधति (भ्वादिगण): लट्: साधति साधतः साधन्ति... लङ्: असाधत् असाधताम् असाधन् / असाधः असाधतम् असाधत / असाधम् असाधाव असाधाम ! YES! असाधाम IS THE FIRST PERSON PLURAL LAKARA OF 'साधँ संसिद्धौ' (भ्वादिगण)! असाधाम = "हमने सिद्ध किया" (we established / we proved)! Just like: अब्रूम = "हमने कहा" (from ब्रू) असाधाम = "हमने सिद्ध किया" (from साध्)! That's why Ramanuja wrote: "शास्त्रैकप्रमाणकमित्यसाधाम ।" (इति + असाधाम) "वेदांतवाक्यानां समन्वयान्निरुह्यत इत्यब्रूम ।" (इति + अब्रूम) "आनुमानिकप्रधानादर्थान्तरभूतश्चेतनविशेष एवेत्युपपादितम् ।" "इति च समर्थयिष्यामहे ।" (or समर्थिष्यामहे) Brilliant! It is 100% "इत्यसाधाम ।"! Everything makes complete grammatical sense now!
Now let's verify: Is it "इत्यसाधाम ।"? Yes: इ (i) त्य (tya) सा (sā) धा (dhā) म् (m) Wait, इति + असाधाम = इत्य
( ३८८ ) और वही स्वाभाविक, निस्सीम, आनन्दमय विपश्चित् संपूर्ण जीवों को भय और अभय देने वाले, सत्य संकल्प, समस्त जड़ चेतनात्मक जगत के अन्तर्यामी परब्रह्म; बद्ध और मुक्त अवस्था वाले जीवात्मा से विलक्षण हैं— इसका भी समाधान किया गया— स चाप्राकृताकर्मनिमित्तस्वासाधारणदिव्यरूप इत्युदैरिरम् । वह अप्राकृत और शुभाशुभ कर्मों के अधीन नहीं हैं, वह तो असाधारण सर्वतंत्र स्वतंत्र हैं, इसका भी उल्लेख किया गया । आकाशप्राणाद्यचेतनविशेषाभिधायिभिर्जगतकारणतया प्रसिद्ध वन्निर्दिश्यमानःसकलेतरचेतनाचेतनविलक्षणस्स एवेति समग्रि- ष्महि । अचेतन वाचक आकाश-प्राण आदि शब्द, जगत कारण रूप से प्रसिद्ध की तरह निर्दिष्ट हैं जो कि जड़-चेतन से विलक्षण परमात्मा के ही द्योतक हैं, यह भी कहा गया । परतत्त्वासाधारणनिरतिशयदीप्तियुक्तज्योतिश्शब्दाभिधेयो द्युसंबंधितया प्रत्यभिज्ञानात स एवेत्यातिष्ठामहि । वह परब्रह्म ही असाधारण अतिशय ज्योति स्वरूप हैं, ऐसा ज्योति वाचक वेदांत वाक्यों के लिए निर्णय किया गया । परमकारणासाधारणामृतत्वप्राप्ति हेतुभूतः परमपुरुष एव शास्त्रदृष्ट्येन्द्रादिशब्दैरभिधीयत इत्यब्रूमहि । परम कारण परब्रह्म की जो असाधारण विशेषता, अमरता है, उसकी प्राप्ति का हेतु भी परब्रह्म ही है, जो कि शास्त्रों में इन्द्र इत्यादि नामों से उपास्य है, यह बतलाया गया । तदेवमत्तिपतितसकलेतरप्रमाणसंभावनाभूमिसार्वज्ञसत्यसंकल्प त्वाद्यपरिमितोदारगुणसागरत्वादीस्वेतरसकलवस्तुविलक्षणः परंब्रह्म- पुरुषोत्तमो नारायण एव वेदांतवेद्य इत्युक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com
( ३८६ ) प्रमाण सम्बन्धी समस्त संभावनाओं से अतीत, सर्वज्ञ, सत्य संकल्प, अपरिमित उदारगुणों के सागर समस्त पदार्थों से विलक्षण परब्रह्म पुरुषोत्तम नारायण ही वेदांत वेद्य हैं, ऐसा कहा गया । अतः परं द्वितीय-तृतीयचतुर्थेषुपादेषु यद्यपि वेदांतवेद्यं ब्रह्मैव, तथापि कानिचिद् वेदांतवाक्यानि प्रधानक्षेत्रज्ञान्तर्भूत वस्तुविशेषस्वरूपप्रतिपादनपराण्येवेत्याशंक्य तन्निरसनमुखेन तत्तद्- वाक्योदितकल्याणगुणाकरत्वं ब्रह्मणः प्रतिपाद्यते । इसके बाद अग्रिम दूसरे तीसरे और चौथे पाद में यद्यपि वेदांत- वेद्य ब्रह्म का प्रतिपादन किया जावेगा, तथापि कुछ वेदांत वाक्य, प्रकृति और क्षेत्रज्ञ (जीव) का प्रतिपादन करते हुए से दीखते हैं, इस संशय का निराकरण करके, कल्याणमय गुणों के धाम ब्रह्म ही उन वाक्यों के प्रति- पाद्य हैं, ऐसा दिखलाया जावेगा । तत्रास्पष्टजीवादिलिंगकानिवाक्यानि द्वितीयेपादे विचार्यन्ते, स्पष्टलिंगकानितृतीये, तत्तत्प्रतिपादनच्छायानुसारिणि चतुर्थे । अस्पष्ट जीवादि लिंगक वाक्यों का द्वितीय पाद में, स्पष्ट जीवादि लिंगक वाक्यों का तृतीयपाद में तथा जीवादि प्रतिपादक वाक्यों के से आभास युक्त वाक्यों का चतुर्थपाद में विचार किया गया है । १ अधिकरण— सर्वत्रप्रसिद्धोपदेशात् । १।२।१॥ इदमाम्नायते छांदोग्ये “अथखलुक्रतुमयः पुरुषो यथाक्रतुर- स्मिँल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति स क्रतुं कुर्वीत मनो- मयः प्राणशरीरः भारूपः” इत्यादि । अत्र “स क्रतुंकुर्वीत” इति प्रति- पादितस्योपासनस्योपास्यः “मनोमयः प्राणशरीरः” इति निर्दिश्यत इति प्रतीयते । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि—“पुरुष निश्चय ही क्रतुमय ( संकल्प प्रधान ) होता है इस लोक में बह जैसा संकल्प करता है,
( ३६० ) मरणोत्तर उसकी तदनुसार ही गति होती है, वह पूर्वजन्मानुसार ही आगे भी संकल्प करता है, उसका मनोमय प्राण शरीर ज्योति रूप है ।'' इत्यादि वाक्य के “वह संकल्प करता है” इस वाक्यांश में प्रतिपादित उपासना के उपास्य को “मनोमय प्राण शरीर” रूप से बतलाया गया है । तत्र संशयः-किं मनोमयत्वादिगुणकक्षेत्रज्ञः उत् परमात्मा इति ? इस पर संशय होता है कि-मनोमय आदि गुणों वाला जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? किं युक्तम् ? क्षेत्रज्ञ इति । कुत ? मनःप्राणयोः क्षेत्रज्ञोपकर- णत्वात्, परमात्मनस्तु “अप्राणो ह्यमनाः” इति तत्प्रतिषेधाच्च न च “सर्वं खल्विदं ब्रह्म” इति पूर्वनिर्दिष्टं ब्रह्मात्रोपास्यतया संबद्धुं शक्यते । “शान्त उपासीत” इत्युपासनोपकरण शान्तिनिवृ- त्त्युपायभूतब्रह्मात्मकत्वोपदेशायोपात्तत्वात् । क्षेत्रज्ञ ही हो सकता है, क्यों कि मन और प्राण जीवात्मा के ही उपकरण हैं । परमात्मा को तो “अप्राण अमन” इत्यादि वाक्यों में प्राण मन रहित बतलाया गया है । 'यह सारा जगत ब्रह्म है” इस पूर्व वाक्य निर्दिष्ट ब्रह्म ही यहाँ उपास्य रूप से बतलाए गए हों, ऐसा भी नहीं है”; शांत भाव से उपासना करो “इस वाक्य में उपासना की सहायिका शांति बतलाई गई है तथा ब्रह्मात्मैकत्व प्राप्ति के उपाय के रूप से शांति संपादन का उपदेश दिया गया है [ अर्थात् मन में शान्ति का आश्रय है इसलिए आश्रय रूप मन ही उपासना का उपकरण सिद्ध होता है यदि मन को परमात्मा मानलेंगे तो साध्य साधन की एकता सिद्ध होगी, जो कि अनियमित बात है ] न च “सक्रतुं कुर्वीत” इत्युपासनस्योपास्यसाकांक्षत्वाद् वाक्यां- तरस्थमपिब्रह्म संबद्ध्यत इति युक्तं वक्तुं, स्ववाक्योपात्तेन मनो- मयत्वादिगुणेन निराकांक्षत्वात् । “मनोमयः प्राण शरीरः” इत्य-
नन्वर्थतया निर्दिष्टस्य विभक्तिविपरिणाममात्रेणोभयाकांक्षा निवृत्तिसिद्धेः । एवं निश्चिते जीवत्वे “एतद्ब्रह्म” इत्युपसंहारस्य ब्रह्मपदमपि जीव पूजार्थं प्रयुक्तमित्यध्यवसीयत इति । “वह यज्ञ करेगा” इस श्रुति में जो उपासना विहित है, वह उपास्य सापेक्ष है, अन्य वाक्य में भी जो उपास्य ब्रह्म का उल्लेख मिलता है, उसका भी इससे सम्बन्ध है; ऐसा भी नहीं कह सकते । क्योंकि- प्रासंगिक वाक्य में “मनोमय” आदि गुण से, उपास्य के रूप का भली- भांति ज्ञान हो जाता है, इसलिए उसके जानने की आकांक्षा तो रहती नहीं । “मनोमय प्राणशरीर” इत्यादि वाक्यांश में उक्त तात्पर्य के प्रति- पादन के लिए, एकमात्र विभक्ति विपरिणाम से (अर्थात् प्रथमा के स्थान पर द्वितीया विभक्ति कर देने मात्र से) उपास्य, उपासना दोनों की आकांक्षा निवृत्ति हो जाती है । इस प्रकार जीवत्व के निश्चित हो जाने पर “यह ब्रह्म है” इस उपसंहार वाक्यांश में “ब्रह्म” शब्द जीववाची ही निश्चित होता है, जो कि—एकमात्र उत्कर्ष बतलाने के लिए प्रयोग किया गया है । एवं प्राप्ते ब्रूमः—सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्—मनोमयत्वादिगुणकः परमात्मा । कुतः ? सर्वत्र—वेदांतेषु परस्मिन्नेव ब्रह्मणि प्रसिद्धस्य मनोमयत्वादेरुपदेशात् । प्रसिद्धं हि मनोमयत्वादि ब्रह्मणः । यथा— “मनोमयः प्राणशरीरनेता” स एषोऽन्तहृदय आकाश, तस्मिन्नयं पुरुषो मनोमयः अमृतोहिरण्मयः “हृदामनीषा मनसाऽभिकॢप्तो य एनं विदुरमृतास्ते भवंति” “न चक्षुषा गृह्यते नापिवाचा “मनसा तु विशुद्धेन’ तथा “प्राणस्य प्राणः” अथखलु प्राण एवं प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योथापयति “सर्वाणि हवा इमानि भूतानि प्राणमेवा- भिसंविशंति प्राणमभ्युज्जिहते” इत्यादिषु । मनोमयत्वं विशुद्धेन मनसा ग्राह्यत्वम् । प्राणशरीरत्वं–प्राणस्याप्याधारत्वं नियन्तृत्वं च । उक्त संशय पर सूत्रकार सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् सूत्र का उपदेश करते हैं । अर्थात् मनोमयत्व आदि गुण वाला परमात्मा ही है, क्योंकि-
( ३६२ ) सभी वेदांत वाक्यों में मनोमयत्वादिका, परब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध प्रयोग किया गया है। मनोमयत्व आदि गुण ब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध हैं जैसे कि—"मनोमय परमात्मा ही प्राण और शरीर का परिचालक है" वही हृदयस्थ आकाश है, उसी से मनोमय, ज्योतिर्मय और अमृतमय यह पुरुष वर्त्तमान है" वह भक्ति और धृति संपन्न मन से ही ग्राह्य है" जो इस बात को जानता है वही मुक्त हो जाता है। "उसे नेत्र या वाणी से नहीं जान सकते" वह तो विशुद्ध मन से ही ग्राह्य है "जो कि प्राणों का प्राण है" प्रज्ञात्मक प्राण ही इस शरीर को ग्रहण कर परिचालित करता है। "ये सारे भूत, इस प्राण में ही लीन और प्राण से ही प्रकट होते हैं" इत्यादि । वस्तुतः विशुद्ध मन से ग्रहण करना ही मनोमयता है। प्राण शरीरत्व का तात्पर्य है प्राण की धारकता और नियामकता। एवं च सति—"एष मे आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्म" इति ब्रह्म शब्दोऽपि मुख्य एव भवति । "अप्राणो ह्यमनाः" इति मनआयत्तं ज्ञानं प्राणायतः स्थिति च ब्रह्मणो निषेधति । इस प्रकार "यह जो हृदयस्थ आत्मा है वही ब्रह्म है" इस वाक्य में ब्रह्म शब्द भी मुख्य ही सिद्ध होता है "अप्राण अमन" इत्यादि वाक्य ब्रह्म सम्बन्धी मन आयत्त ज्ञान और प्राणायत स्थिति का निषेध करता है । अथवा "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत्" इत्यत्रैवोपासनं विधीयते-सर्वात्मकं ब्रह्म शान्तः सन्नुपासीतेति । "सक्रतुं कुर्वीत" इति तस्यैव गुणोपादनाथोऽनुवादः । उपादेयाश्च गुणामनीमयत्वादयः, यतस्सर्वात्मकंब्रह्म मनोमयत्वादि गुणकमुपा- सीतेति वाक्यार्थः। अथवा "यह सारा जगत ब्रह्म ही है, उन्हीं से उत्पन्न और उन्हीं में लीन हो जाता है, शान्तभाव से उनकी उपासना करो" इस वाक्य में, सर्वात्मक ब्रह्म की शान्तभाव से उपासना करनी चाहिए, ऐसा उपासना
का प्रकार बतलाया गया है। “वह क्रतु (चिन्तन) करता है' इत्यादि वाक्य उपास्य ब्रह्म के गुण प्रकाश का प्रतिपादक मात्र है। ब्रह्म के मनोमयत्व आदि गुण ही उपादेय हैं, सर्वात्मक ब्रह्म की मनोमयत्व आदि गुण विशिष्ट रूप से ही उपासना करनी चाहिए, यही युक्तियुक्त वाक्यार्थ है। तत्र संदेहः-किमिह ब्रह्मशब्देन प्रत्यगात्मा निर्दिश्यते उत परमात्मा-इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? तस्यैव सर्वपद सामानाधिकरण्यनिर्देशोपपत्तेः । सर्वशब्दनिर्दिष्टं हि ब्रह्मादि स्तम्बपर्यन्तं कृत्स्नं जगत् । ब्रह्मादि भावश्च प्रत्यगात्मनोऽनाद्य- विद्यामूलकर्मविशेषोपाधिकोविद्यत एव, परस्य तु ब्रह्मणस्सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रपहतपाप्मनो निरस्तसमस्ताविद्यादिदोषगंधस्य समस्त हेयाकर सर्वभावो नोपपद्यते । प्रत्यगात्मन्यपि क्वचिद् क्वचिद् ब्रह्मशब्दः प्रयुज्यते । अत एव परमात्मा परंब्रह्मेति परमेश्वरस्य क्वचित् सविशेषणो निर्देशः । प्रत्यगात्मनश्च निर्मुक्तोपाधेर्बृहत्वं च विद्यते “स चानन्त्याय कल्पते” इति श्रुतेः । अविदुषस्तस्यैव कर्म- ·निमित्त त्वाज्जन्मस्थितिलयानां तज्जलानिति हेतुनिर्देशोऽप्युपपद्यते । तदयमर्थः-अयं जीवात्मा स्वतोऽपरिच्छन्न स्वरूपत्वेन ब्रह्मभूतस्स- न्नाद्यविद्यया देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मनाऽवतिष्ठते-इति । इस पर भी यह संशय तो शेष रही जाता है कि-ब्रह्म शब्द जीवात्मा वाची है अथवा परमात्मावाची । कह सकते हैं कि जीवात्मा वाची है, क्योंकि-सर्व शब्द के साथ प्रत्यक् शब्द का सामानाधिकरण्य हो संकता है। सर्व शब्द से ब्रह्म से लेकर स्तम्ब पर्यन्त संपूर्ण जगत का निर्देश किया गया है, अनादि अविद्या मूलक, विशेष कर्म निबंधक, जीव का ब्रह्मात्मभाव भी सर्व शब्द में निहित है। पर ब्रह्म में तो, सर्वज्ञ-सर्व शक्ति सम्पन्न-निष्पाप होने से अविद्या जन्य दोषों की गंध भी संभव नहीं है, इसलिए उसमें हेय कर्मों का सम्बन्ध सर्वथा असम्भव है। ankurnagpal108@gmail.com
( ३६४ ) जीवात्मा के लिए भी कही कहीं ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया गया है। परमात्मा परमेश्वर को तो विशेषण युक्त “परब्रह्म” शब्द से ही स्मरण किया गया है। जीवात्मा भी जब कर्म बन्धन शून्य होता है तब उसमे भी बृहत्त्व रहता है। जैसा कि-“सचानन्त्याय कल्पते” इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। जगत् का जन्म स्थिति और लय निश्चित ही कर्मजन्य है, अतः ज्ञानरहित जीवात्मा का ही “तज्जलानि” इत्यादि में निदर्श प्रतीत होता है। उक्त श्रुति का तात्पर्य है कि-जीवात्मा स्वभाव से अपरिच्छिन्न ब्रह्म स्वरूप है वह अनादि अविद्यावश, देवता मनुष्य पशु, पक्षी स्थावर आदि रूपों मे स्थित रहता है। अत्र प्रतिविधीयते-सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्-सर्वत्र-“सर्वं खल्विदं” इति निर्दिष्टे सर्वस्मिन् जगति ब्रह्म शब्देन तदात्मतया विधीयमानं परंब्रह्मैऽव न प्रत्यगात्मा। कुतः ? प्रसिद्धोपदेशात् “तज्जलान्” इति हेतुतः “सर्वं खल्विदं ब्रह्मैऽव” इति प्रसिद्धवदुपदेश
( ३६५ ) उक्त संशय के निवारणार्थ सूत्रकार "सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात् सूत्र कहते हैं—जिसका तात्पर्य है कि-"सर्वं खल्विदं" इत्यादि श्रुति में जगद्- रूप से निर्दिष्ट ब्रह्म शब्द जीववाची नहीं है अपितु परमात्मावाची ही है। क्योंकि-प्रसिद्ध परब्रह्म का जैसा जगत् कर्त्ता का निर्देश किया गया है "उससे उत्पन्न और लीन होता है" ऐसा हेतु बतला कर "सारा जगत् ब्रह्म है" ऐसा परमात्मा सम्बन्धी प्रसिद्ध सा निर्देश है। ब्रह्म से उत्पन्न हीने से, ब्रह्म में लीन होने से, ब्रह्माधीन जीवन होने से ही यह सारा जगत ब्रह्मात्मक है, वेदांत वाक्यो में जगत का जन्म स्थिति और लय ब्रह्म में ही बतलाया गया है इसलिए उक्त प्रसंग में ब्रह्म ही जगत कर्त्ता प्रतीत होता है। जैसे कि "जिससे यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न है, तथा जिससे जीवित है और लय होकर जिसमें प्रविष्ट होता है उसे जानो वही ब्रह्म है" ऐसा उपक्रम करते हुए "आनन्द को ही ब्रह्म जानो, आनन्द से ही यह सारा भूत समुदाय उत्पन्न होता है" इत्यादि से पूर्वोक्त निरवधि निरतिशय आनन्द सम्पन्न विपश्चित परब्रह्म में ही जगत की सृष्टि इत्यादि बतलाई गई है। तथा "वही कारण एव करणाधिपो के भी अधिपति हैं, जिनका कोई भी जनक या अधिपति नही है" इस वाक्य में इन्द्रियो के स्वामी जीव का अधिपति ब्रह्म को ही बतलाया गया है। इस प्रकार सर्वत्र परमात्मा की ही सर्व कारणता प्रसिद्ध है। अतः परब्रह्मणो जातत्वात्तस्मिन् प्रलीनत्वात्तेन प्राणनात्तदा- त्मकतया तादात्म्यमुपपन्नम् । अतः "सर्वं प्रकारं सर्वशरीरं सर्वा- त्मभूतं परंब्रह्म शांतोभूत्वोपासीतेति श्रुतेरेव परस्य ब्रह्मणः सर्वात्मकत्वमुपपाद्य तस्योपासनमुपदिशति । परंब्रह्म हि कारणावस्थं सूक्ष्मस्थूल चिदचिद्वस्तुशरीरतया सर्वदा सर्वात्मभूतम् । एवम्भूत- तादात्म्यस्य प्रतिपादने परस्यब्रह्मणः सकलहेयप्रत्यनीककल्याण गुणाकरत्व न विरुध्यते प्रकारभूत शरीरगतानां दोषाणां प्रकारिण्- यात्मन्य प्रसंगात्, प्रत्युत निरतिशयैश्वर्यापादनेन गुणायैव भवतीति पूर्वमेवोक्तम् । ankurnagpal108@gmail.com
( ३६६ ) इस प्रकार परब्रह्म से उत्पन्न होने से, उन्ही में लीन होने से और उन्ही से प्राणित होने से जगत की तदात्मकता सिद्ध हो जाती है। इसी प्रकार “सर्व प्रकार, सर्व शरीर, सर्वात्मभूत परब्रह्म की शान्त रूप से उपासना करो” इत्यादि श्रुति परब्रह्म की सर्वात्मकता का उपपादन करके उनकी उपासना का उपदेश करती है। परब्रह्म ही, कारणावस्थ और कार्यावस्थ सूक्ष्म-स्थूल चेतन-जड़ शरीर धारण करने से सर्वात्मभूत हैं। ऐसे तादात्म्य प्रतिपादन से परब्रह्म के हेय और उत्तम गुणों में कोई विरुद्धता नहीं होती। उक्त शरीर उन्हीं के प्रकार अर्थात् विशेषण रूप हैं। विशेषणगत दोषराशि कभी प्रकारी विशेष्य में संभव नहीं है, अपितु वह अत्यधिक ऐश्वर्य शाली परमात्मा की गुण स्वरूप होगी; ऐसा हम पहिले ही कह चुके हैं। यदुक्तं जीवस्य सर्वतादात्म्यमुपपद्यत इति, तदसत्, जीवानां प्रतिशरीरं भिन्नानामन्यतादात्म्यासम्भवात् । मुक्तस्याप्यनवच्छिन्न- स्वरूपस्यापि जगत्तादात्म्यं जगज्जन्मस्थितिप्रलयकारणत्वनिमित्तं न संभवतीति “जगद्व्यापारवर्ज्यम् ” इत्यत्र वक्ष्यते । जीवकर्मनिमित्तत्वाज्जगज्जन्मस्थितिलयानां स एव कारण- मित्यपिन साधीयः, तत्कर्मनिमित्तत्वेऽपीश्वरस्यैव जगत्कारणत्वात् । अतः परमात्मैवाऽत्र ब्रह्मशब्दाभिधेयः । इममेव सूत्रार्थमभियुक्ता बहुमन्वते । यथाह वृत्तिकारः “सर्वं खल्विति सर्वात्मा ब्रह्मेशः” । जो यह कहते हैं कि—जीव का सबसे तादात्म्य हो सकता है यह कथन भी असंगत है, क्योंकि जीवों का अनेक शरीरों में आश्रय रहता है इसलिए उनमें परस्पर तादात्म्य कभी संभव नहीं है। मुक्तात्मा जीव का भी, जगत्जन्मस्थितिलयकारणत्व निमित्तक तादात्म्य संभव नहीं है, सूत्रकार “जगद्व्यापारवर्ज्यम्” सूत्र में मुक्तात्मा को जागतिक व्यापारों से रहित बतलाते हैं । जीव का कर्म ही, जगत की सृष्टि स्थिति और लय का निमित्त कारण होता है, वही जीव जगत का उपादान कारण भी हो, ऐसा संभव नहीं है। जीव के कर्मानुसार ईश्वर जगत की रचना करता है, अतएव
( ३६७ ) वही जगत का कारण है। उक्त प्रसंग में परमात्मा ही ब्रह्म शब्द से अभिधेय हैं। हमारे द्वारा किये गये इस सूत्रार्थ को ही विद्वज्जन मानेंगे, जैसा कि वृत्तिकार का भी मत है—“सर्वंखलु “इत्यादि में सर्वात्मा ईश ही ब्रह्म हैं”। विवक्षित गुणोपपत्तेश्च १।२।२॥ वक्ष्यमाणाश्च गुणाः परमात्मन्येवोपपद्यन्ते “मनोमयः प्राण- शरीरो भारूपः सत्यसंकल्पआकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगन्धः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः” इति । मनोमयःपरि- शुद्धेन ,मनसैकेन ग्राह्यः । विवेकविमोकादिसाधनसप्तकानुगृहीत परमात्मोपासन निर्मलीकृतेन हि मनसा गृह्यते । अनेन हेयप्रत्यनीक कल्याणैकतानतया सकलेतरविलक्षणस्वरूपतोच्यते, मलिनमनोभि- र्मलिनानामेव ग्राह्यत्वात् । प्राणशरीरः जगति सर्वेषां प्राणानां धारकः । प्राणो यस्य शरीरम् आधेयं विधेयं शेषभूतं च स प्राण शरीरः । आधेयत्वविधेयत्वशेषत्वानि शरोरशब्द प्रवृत्तिनिमित्तानी- त्युपपादयिष्यते । भारूपः = भास्वररूपः अप्राकृत स्वासाधारण निरतिशयकल्याण दिव्यरूपत्वेन निरतिशयदीप्तियुक्त इत्यर्थः सत्य संकल्पः = अप्रतिहत् संकल्पः । आकाशात्मा = आकाशवत्सूक्ष्म- स्वच्छस्वरूपः, सकलेतरकारणभूतस्याकाशस्याप्यात्मभूत इति वा आकाशात्मा स्वयं च प्रकाशते अन्यानपि प्रकाशयतीति वा अ्रकाशात्मा सर्वकर्मा = क्रियत इति कर्म, सर्वंजगद्यस्यकर्म, असौ सर्वकर्मा; सर्वा वा क्रिया यस्यासौ सर्वकर्मा । सर्वकामः = काम्यन्त इति कामाः, सर्वगंधः भोग्यभोगोपकरणादयः, ते परिशुद्धाः सर्वविधास्तस्य सन्ती- त्यर्थः । सर्वरसः = “अशब्दमस्पर्शम्” इत्यादिना प्राकृतगंधरसादिनिषे- धात् प्राकृताः स्वासाधारणनिरवद्याः निरतिशयाः कल्याणाः स्वभोग्य- भूताः सर्वविधा गन्धरसाः तस्य सन्तीत्यर्थः । सर्वमिदमभ्यात्तः = ankurnagpal108@gmail.com
( ३६८ ) उक्तंरसपर्यन्तं सर्वमिदं कल्याणगुणजातं स्वीकृतवान् । “अभ्यात्तः” इति “भुक्ताः ब्राह्मणाः” इतिवत् कर्त्तरिक्तः प्रतिपत्तव्यः । अवाकी = वाकः = उक्तिः, सोऽस्यनास्तीत्यवाकी । कुत इत्याह, अनादर इति, अवाप्तसमस्तकामत्वेनादर्तव्याभावादादर रहितः । अतएव अवाकी = अजल्पाकः, परिपूर्णैश्वर्याद्ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तं निखिलं जगत्तृणीकृत्य जोषमासीन इत्यर्थः । त एते विवक्षिताः गुणाः परमा- त्मन्येवोपपद्यन्ते । वेदांत वाक्यों में कहे गये गुण, परमात्मा के लिए ही उपयुक्त हैं । “मनोमय, प्राणशरीर, ज्योतिरूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध, सर्वरस, जगद्व्यापी, वाक्यहीन, अनादर” इत्यादि श्रुत्युक्त गुण, परमात्मा में ही समुचित रूप से घटते हैं । मनोमय का तात्पर्य है, एक मात्र शुद्ध मन से ही ग्राह्य अर्थात् विवेक, विमोक आदि सात साधनों से निर्मल मन से परमात्मा की उपासना संभव है । इससे ज्ञात होता है कि श्रेष्ठ गुणों के खान विलक्षण स्वरूप परमात्मा ही हो सकते हैं; मलिन मन से तो मलिन पदार्थों का ही ग्रहण हो सकता है । प्राण शरीर का अर्थ है संसार के समस्त प्राणों के धारक; प्राण जिसके आधेय-विधेय और शेषत्व का संपादन करे उसे प्राण शरीर कहते हैं । आधेयत्व, विधेयत्व और शेषत्व ही, “शरीर” शब्द के व्यवहार का निदान है, ऐसा आगे उपपादन करेंगे । भारूप का अर्थ है—उज्ज्वल- रूपसंपन्न, अर्थात् उनका अपना रूप, अप्राकृत-असाधारण और निरतिशय कल्याणमय होने से सर्वापेक्षा दीप्तियुक्त है । सत्यसंकल्प का तात्पर्य है अनिवार्य इच्छा । आकाशामा का तात्पर्य है—आकाश के समान सूक्ष्म स्वच्छ स्वरूप, अथवा अन्यान्य समस्त पदार्थों के कारण स्वरूप आकाश का अन्तर्यामी, अथवा जो स्वयं प्रकाशवान होते हुए अन्यों को प्रकाशित करता है । सर्वकर्मा का तात्पर्य है—जो किया जायें, ऐसा समस्त संसार रूप कर्मवाला अथवा समस्त क्रियायें ही जिसका कर्म है । सर्वकाम का तात्पर्य है—जिससे कामना होती है वे भोग्य पदार्थ और भोग के साधन काम्यपदार्थ तथा उनकी प्राप्ति की इच्छा को काम कहते हैं, उस परमात्मा के वे सारे काम्य विषय आसक्तिरहित होने से विशुद्ध हैं, ankurnagpal108@gmail.com