श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंका प्रकार बतलाया गया है। “वह क्रतु (चिन्तन) करता है' इत्यादि वाक्य उपास्य ब्रह्म के गुण प्रकाश का प्रतिपादक मात्र है। ब्रह्म के मनोमयत्व आदि गुण ही उपादेय हैं, सर्वात्मक ब्रह्म की मनोमयत्व आदि गुण विशिष्ट रूप से ही उपासना करनी चाहिए, यही युक्तियुक्त वाक्यार्थ है। तत्र संदेहः-किमिह ब्रह्मशब्देन प्रत्यगात्मा निर्दिश्यते उत परमात्मा-इति किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति, कुतः ? तस्यैव सर्वपद सामानाधिकरण्यनिर्देशोपपत्तेः । सर्वशब्दनिर्दिष्टं हि ब्रह्मादि स्तम्बपर्यन्तं कृत्स्नं जगत् । ब्रह्मादि भावश्च प्रत्यगात्मनोऽनाद्य- विद्यामूलकर्मविशेषोपाधिकोविद्यत एव, परस्य तु ब्रह्मणस्सर्वज्ञस्य सर्वशक्ते रपहतपाप्मनो निरस्तसमस्ताविद्यादिदोषगंधस्य समस्त हेयाकर सर्वभावो नोपपद्यते । प्रत्यगात्मन्यपि क्वचिद् क्वचिद् ब्रह्मशब्दः प्रयुज्यते । अत एव परमात्मा परंब्रह्मेति परमेश्वरस्य क्वचित् सविशेषणो निर्देशः । प्रत्यगात्मनश्च निर्मुक्तोपाधेर्बृहत्वं च विद्यते “स चानन्त्याय कल्पते” इति श्रुतेः । अविदुषस्तस्यैव कर्म- ·निमित्त त्वाज्जन्मस्थितिलयानां तज्जलानिति हेतुनिर्देशोऽप्युपपद्यते । तदयमर्थः-अयं जीवात्मा स्वतोऽपरिच्छन्न स्वरूपत्वेन ब्रह्मभूतस्स- न्नाद्यविद्यया देवतिर्यङ्मनुष्यस्थावरात्मनाऽवतिष्ठते-इति । इस पर भी यह संशय तो शेष रही जाता है कि-ब्रह्म शब्द जीवात्मा वाची है अथवा परमात्मावाची । कह सकते हैं कि जीवात्मा वाची है, क्योंकि-सर्व शब्द के साथ प्रत्यक् शब्द का सामानाधिकरण्य हो संकता है। सर्व शब्द से ब्रह्म से लेकर स्तम्ब पर्यन्त संपूर्ण जगत का निर्देश किया गया है, अनादि अविद्या मूलक, विशेष कर्म निबंधक, जीव का ब्रह्मात्मभाव भी सर्व शब्द में निहित है। पर ब्रह्म में तो, सर्वज्ञ-सर्व शक्ति सम्पन्न-निष्पाप होने से अविद्या जन्य दोषों की गंध भी संभव नहीं है, इसलिए उसमें हेय कर्मों का सम्बन्ध सर्वथा असम्भव है। ankurnagpal108@gmail.com