श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६२ ) सभी वेदांत वाक्यों में मनोमयत्वादिका, परब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध प्रयोग किया गया है। मनोमयत्व आदि गुण ब्रह्म के लिए ही प्रसिद्ध हैं जैसे कि—"मनोमय परमात्मा ही प्राण और शरीर का परिचालक है" वही हृदयस्थ आकाश है, उसी से मनोमय, ज्योतिर्मय और अमृतमय यह पुरुष वर्त्तमान है" वह भक्ति और धृति संपन्न मन से ही ग्राह्य है" जो इस बात को जानता है वही मुक्त हो जाता है। "उसे नेत्र या वाणी से नहीं जान सकते" वह तो विशुद्ध मन से ही ग्राह्य है "जो कि प्राणों का प्राण है" प्रज्ञात्मक प्राण ही इस शरीर को ग्रहण कर परिचालित करता है। "ये सारे भूत, इस प्राण में ही लीन और प्राण से ही प्रकट होते हैं" इत्यादि । वस्तुतः विशुद्ध मन से ग्रहण करना ही मनोमयता है। प्राण शरीरत्व का तात्पर्य है प्राण की धारकता और नियामकता। एवं च सति—"एष मे आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्म" इति ब्रह्म शब्दोऽपि मुख्य एव भवति । "अप्राणो ह्यमनाः" इति मनआयत्तं ज्ञानं प्राणायतः स्थिति च ब्रह्मणो निषेधति । इस प्रकार "यह जो हृदयस्थ आत्मा है वही ब्रह्म है" इस वाक्य में ब्रह्म शब्द भी मुख्य ही सिद्ध होता है "अप्राण अमन" इत्यादि वाक्य ब्रह्म सम्बन्धी मन आयत्त ज्ञान और प्राणायत स्थिति का निषेध करता है । अथवा "सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शान्त उपासीत्" इत्यत्रैवोपासनं विधीयते-सर्वात्मकं ब्रह्म शान्तः सन्नुपासीतेति । "सक्रतुं कुर्वीत" इति तस्यैव गुणोपादनाथोऽनुवादः । उपादेयाश्च गुणामनीमयत्वादयः, यतस्सर्वात्मकंब्रह्म मनोमयत्वादि गुणकमुपा- सीतेति वाक्यार्थः। अथवा "यह सारा जगत ब्रह्म ही है, उन्हीं से उत्पन्न और उन्हीं में लीन हो जाता है, शान्तभाव से उनकी उपासना करो" इस वाक्य में, सर्वात्मक ब्रह्म की शान्तभाव से उपासना करनी चाहिए, ऐसा उपासना