श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६४ ) जीवात्मा के लिए भी कही कहीं ब्रह्म शब्द का प्रयोग किया गया है। परमात्मा परमेश्वर को तो विशेषण युक्त “परब्रह्म” शब्द से ही स्मरण किया गया है। जीवात्मा भी जब कर्म बन्धन शून्य होता है तब उसमे भी बृहत्त्व रहता है। जैसा कि-“सचानन्त्याय कल्पते” इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। जगत् का जन्म स्थिति और लय निश्चित ही कर्मजन्य है, अतः ज्ञानरहित जीवात्मा का ही “तज्जलानि” इत्यादि में निदर्श प्रतीत होता है। उक्त श्रुति का तात्पर्य है कि-जीवात्मा स्वभाव से अपरिच्छिन्न ब्रह्म स्वरूप है वह अनादि अविद्यावश, देवता मनुष्य पशु, पक्षी स्थावर आदि रूपों मे स्थित रहता है। अत्र प्रतिविधीयते-सर्वत्र प्रसिद्धोपदेशात्-सर्वत्र-“सर्वं खल्विदं” इति निर्दिष्टे सर्वस्मिन् जगति ब्रह्म शब्देन तदात्मतया विधीयमानं परंब्रह्मैऽव न प्रत्यगात्मा। कुतः ? प्रसिद्धोपदेशात् “तज्जलान्” इति हेतुतः “सर्वं खल्विदं ब्रह्मैऽव” इति प्रसिद्धवदुपदेश