भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३८४ ) “वाक्य विषयक जिज्ञासा मत करो वाचक को जानने की चेष्टा करो” तीन शिर वाले, त्वष्टा के पुत्र विश्वरूप को मारा “वेदानभिज्ञ यतियों को गृहपालित कुत्तों की तरह दिया” इत्यादि जीववाची प्रमाणों तथा “इस शरीर में जब तक प्राण रहते हैं तभी तक शरीर की आयु होती है” प्रज्ञात्मक प्राण ही शरीर को सहारा देकर उठाता है” इत्यादि मुख्य प्राण वाची प्रमाणों से सिद्ध होता है कि-अध्यात्म सम्बन्धी बाहुल्य ही शास्त्रों का अभिधेय नहीं है। उक्त कथन उपयुक्त नहीं है—क्यो कि शास्त्रों में तीन प्रकार की उपासना बतलाई गई है (१) निखिल कारण स्वरूप ब्रह्म का उसके रूप में ही अनुसंधान (२) भोक्ता शरीरक जीवात्मा का अनुसंधान (३) भोग्य शरीर का अनुसंधान। अर्थात् तीन प्रकार के अनुसंधानों का उपदेश मिलता है। तदिदं त्रिविधं ब्रह्मानुसंधानं प्रकरणान्तरेष्वप्याश्रितम्— “सत्यंज्ञानमनंतंब्रह्म” “आनंदोब्रह्म” इत्यादिषु स्वरूपानुसंधानम्। तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत्, तदनुप्रविश्य सच्चत्यच्चाभवत्, निरुक्तं चानिरुक्तं च, निलयनं चानिलयनं च, विज्ञानं चाविज्ञानं, सत्यं चानृतं च, सत्यमभवत् ।” इत्यादिषु भोक्तृशरीरतया, भोग्यभोगोप- करणशरीरतया चानुसंधानम्। इहापि प्रकरणे त्रिविधमनुसंधानं युज्यत एवेत्यर्थः। उक्त तीनों प्रकार के अनसंधानों का वर्णन विभिन्न श्रुतियो में मिलता है-- “ब्रह्म सत्य ज्ञान अनंत स्वरूप है “ब्रह्म आनन्द स्वरूप है” इत्यादि श्रुतियों में स्वरूपानुसंधान का निर्देश है। “उसकी रचना करके उसी में प्रविष्ट हो गए, उसमें प्रविष्ट होकर सत् और त्यत् (परोक्ष अपरोक्ष) निरुक्त और अनिरुक्त (वाच्य और अनिर्वाच्य) निलयन और अनिलयन (माश्रित और अनाश्रित) विज्ञान और अविज्ञान (चेतन और जड़) सत्य और असत्य हुये” इत्यादि श्रुति, भोक्ता जीव और भोग्य शरीर के रूप में अनुसंधान का उपदेश देती है। इस इन्द्र प्रणादि प्रकरण में भी त्रिविध ब्रह्मानुसंधान का ही उपदेश है, ऐसा मानना चाहिये। ankurnagpal108@gmail.com