श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८३ ) र्वामदेवः प्रतिपेदे अहं मनुरभवं सूर्य्यश्चाहं कक्षीवानृषिरस्मि विप्रः” इत्यादिना । यथा च प्रह्लादः” सर्वंगतत्वादनंतस्य स एवाहंमवस्थितः मत्तः सर्वमहं सर्वमपि सर्वं सनातने” इत्यादि वदति । जैसे कि वामदेव ऋषि ने, परब्रह्म को सर्वान्तर्यामी जीवात्मा का शरीरी कहा है-शरीरवाची शब्दों की अंतिम सीमा जानकर, आत्मशरीरी परब्रह्म की ओर लक्ष्य करके उन्होंने “अहं” शब्द से सूर्य मनु आदि का सामानाधिकरण बतलाया है । उन्होंने प्रसिद्ध ब्रह्म तत्त्व का उपदेश करते हुए कहा कि—"मैं ही सूर्य और मनु हुआ और मैं ही कक्षीवान् ऋषि हूं" इत्यादि । ऐसे ही प्रह्लाद ने भी कहा था “अनंत ब्रह्म सर्वगत हैं, मैं भी उन्हीं में स्थित हूं, मुझसे ही सारा जगत हुआ है ।” अस्मिन् प्रकरणे जीववाचिभिशब्दैरचित्विशेषाभिधायिभिश- चोपास्यभूतस्य परस्यब्रह्मणोऽभिधाने कारणं चोद्यपूर्वकमाह— इस प्रकरण में जीव वाची शब्दों तथा अचिद्विशेषाभिधायि शब्दों द्वारा उपास्य ब्रह्म का उपदेश दिया गया है, इसी तथ्य को शंका समाधान पूर्वक पुनः कहते हैं— जीवमुख्यप्राण लिंगान्नेति चेन्नोपासात्रैविध्यादाश्रितत्त्वादिह तद्योगात् १।१।३२॥ “न वाचं विजिज्ञासीत वक्तारं विद्यात् ” त्रिशीर्षाणं त्वाष्ट्र- महनम् “अरुन्मुखान्यतीन् सालावृकेभ्यः प्रायच्छम्” इत्यादि जीवंलिगात् “यावदस्मिन् शरीरे प्राणो वसतितावदायूः” अथखलु प्राण एव प्रज्ञात्मेदं शरीरं परिगृह्योत्थापयति” इति मुख्य प्राण लिंगाच्च नाध्यात्मसंबंधभूमेति चेत्-न, उपासात्रैविध्यात् हेतोः, उपासनात्रैविध्यमुपदेष्टुं तत्तच्छब्देनाभिधानम्-निखिल कारणभूतस्य ब्रह्मणः स्वरूपेणानुसंधानम्, भोक्तृवर्ग शरीरकत्वानुसंधानं भोग्य- भोगोपकरणशरीरकत्वानुसंधानंचेति, त्रिविधमनुसंधानमुपदेष्टु- मित्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com