श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३८५ ) एतदुक्तं भवति-यत्र हिरण्यगर्भादिजीवविशेषाणां प्रकृत्याद्य- चेतनविशेषाणां च परमात्मासाधारणधर्मयोगतदभिधायिनां शब्दानांपरमात्मवाचिशब्दैः सामानाधिकरण्यं वा दृश्यते । तत्र परमात्मानः तत्तच्चिदाचिद्विशेषान्तरात्मत्वानुसंधानं प्रतिपिपा- दयिषितम्-इति । अतोऽत्रे'न्द्रप्राणशब्दनिर्दिष्टोजीवादर्थान्तरभूतः परमात्मैवेति सिद्धम् । कहने का तात्पर्य यह है कि—जहाँ परमात्मा की असाधारण विशेषताओं के साथ हिरण्यगर्भ आदि विशिष्ट जीवों का अथवा प्रकृति आदि विशिष्ट अचेतनों का योग दिखलाई देता है अथवा हिरण्यगर्भ आदि विशिष्ट जीवों के वाचक या प्रकृति आदि शरीर वाचक शब्दों का, परमात्म सम्बन्धी शब्दों के साथ सामानाधिकरण्य दिखलाया गया है, उससे समझना चाहिए कि परमात्मा के इन दोनों जड़ और चेतन रूपों के अन्तरात्मानुसंधान का प्रतिपादन किया गया है । इससे निश्चित होता है कि-उक्त प्रकरण में भी, जीव से विलक्षण परमात्मा का ही, इन्द्र प्राण आदि शब्दों से प्रतिपादन किया गया है । प्रथम पाद समाप्त