श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ३६८ ) उक्तंरसपर्यन्तं सर्वमिदं कल्याणगुणजातं स्वीकृतवान् । “अभ्यात्तः” इति “भुक्ताः ब्राह्मणाः” इतिवत् कर्त्तरिक्तः प्रतिपत्तव्यः । अवाकी = वाकः = उक्तिः, सोऽस्यनास्तीत्यवाकी । कुत इत्याह, अनादर इति, अवाप्तसमस्तकामत्वेनादर्तव्याभावादादर रहितः । अतएव अवाकी = अजल्पाकः, परिपूर्णैश्वर्याद्ब्रह्मादिस्तंबपर्यन्तं निखिलं जगत्तृणीकृत्य जोषमासीन इत्यर्थः । त एते विवक्षिताः गुणाः परमा- त्मन्येवोपपद्यन्ते । वेदांत वाक्यों में कहे गये गुण, परमात्मा के लिए ही उपयुक्त हैं । “मनोमय, प्राणशरीर, ज्योतिरूप, सत्यसंकल्प, आकाशात्मा सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध, सर्वरस, जगद्व्यापी, वाक्यहीन, अनादर” इत्यादि श्रुत्युक्त गुण, परमात्मा में ही समुचित रूप से घटते हैं । मनोमय का तात्पर्य है, एक मात्र शुद्ध मन से ही ग्राह्य अर्थात् विवेक, विमोक आदि सात साधनों से निर्मल मन से परमात्मा की उपासना संभव है । इससे ज्ञात होता है कि श्रेष्ठ गुणों के खान विलक्षण स्वरूप परमात्मा ही हो सकते हैं; मलिन मन से तो मलिन पदार्थों का ही ग्रहण हो सकता है । प्राण शरीर का अर्थ है संसार के समस्त प्राणों के धारक; प्राण जिसके आधेय-विधेय और शेषत्व का संपादन करे उसे प्राण शरीर कहते हैं । आधेयत्व, विधेयत्व और शेषत्व ही, “शरीर” शब्द के व्यवहार का निदान है, ऐसा आगे उपपादन करेंगे । भारूप का अर्थ है—उज्ज्वल- रूपसंपन्न, अर्थात् उनका अपना रूप, अप्राकृत-असाधारण और निरतिशय कल्याणमय होने से सर्वापेक्षा दीप्तियुक्त है । सत्यसंकल्प का तात्पर्य है अनिवार्य इच्छा । आकाशामा का तात्पर्य है—आकाश के समान सूक्ष्म स्वच्छ स्वरूप, अथवा अन्यान्य समस्त पदार्थों के कारण स्वरूप आकाश का अन्तर्यामी, अथवा जो स्वयं प्रकाशवान होते हुए अन्यों को प्रकाशित करता है । सर्वकर्मा का तात्पर्य है—जो किया जायें, ऐसा समस्त संसार रूप कर्मवाला अथवा समस्त क्रियायें ही जिसका कर्म है । सर्वकाम का तात्पर्य है—जिससे कामना होती है वे भोग्य पदार्थ और भोग के साधन काम्यपदार्थ तथा उनकी प्राप्ति की इच्छा को काम कहते हैं, उस परमात्मा के वे सारे काम्य विषय आसक्तिरहित होने से विशुद्ध हैं, ankurnagpal108@gmail.com