भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ३६१ ) इसलिये वे सर्वकाम हैं। सर्वगंध सर्वरस का तात्पर्य है-“अशब्द अस्पर्शं” आदि वाक्य में प्राकृतगंध रस आदि का निषेध किया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि उस परमात्मा में स्वतंत्र भोगोपयोगी निर्दोष, निस्सीम, कल्याणमय, अलौकिक, असाधारण अनोखे गंधरस आदि विद्यमान हैं। सर्वमिदमभ्यात्त का तात्पर्य है कि-उपर्युक्त सभी कल्याणमय गुणों से उद्भूत विशेषताओं को वह स्वेच्छा से स्वीकारते हैं। “भुक्ताः ब्राह्मणाः” वाक्य की तरह अभ्यात्त में भी कर्त्ता में क्तप्रत्यय है जिसका तात्पर्य होता है कि वे परमात्मा उक्त गुणों को स्वीकार कर तृप्त हैं। अवाकी का तात्पर्य है, वाणी की उक्ति अर्थात् उच्चारण का उनमें अभाव है। क्यों कि वे, अनादर अर्थात् संपूर्ण कामनाओं से तृप्त है, इसलिए उन्हें किसी भी पदार्थ की ओर आकर्षण नहीं है, इसलिए वह सभी के प्रति अनादर ( अभिलाषा युक्त प्राप्ति की उत्सुकता से रहित ) हैं। इसलिए वे ( अनिच्छुक होने से) चुप रहते हैं। परिपूर्ण ऐश्वर्य होने के कारण, ब्रह्मा से लेकर तृण पर्यन्त सारा जगत उनके लिए तृणवत ही है। इससे इसलिये वे सदा तुष्ट भाव से चुप रहते हैं। निश्चित होता है कि श्रुतियुक्त समस्त गुण, परमात्मा के लिए ही उपयुक्त हैं, ऐसा मानना चाहिए। अनुपपत्तेस्तु न शारीरः ।१।२।३॥ तमिमं गुणसागरं पर्यालोचयतां खद्योतकल्पस्य शरीरसंबंध- निबंधनापरिमितदुःखसंबंधयोग्यस्यबद्धमुक्तावस्थस्यजीवस्य प्रस्तुत- गुणलेशसंबंधगंधोऽपि नोपपद्यत, इति नास्मिन् प्रकरणे शारीर- परिग्रहशंका जायत इत्यर्थः। जिन्होंने, उन गुण सागर परमात्मा को शास्त्र पर्यालोचना से भलीभांति जान लिया है उनकी दृष्टि में, जुगनू के समान यदा कदा टिमटिमाने वाले, शरीर संबद्ध होने से अपरिमित दुःख भागी, बद्धमुक्त अवस्था वाले, जीवात्मा का उन गुणो से लेशमात्र सम्बन्ध हो भी सकता है, ऐसी तनिक भी संभावना नहीं रहती। इसलिए इस प्रसंग में शरीरी जीवात्मा का वर्णन है, ऐसी आशंका करना व्यर्थ है। ankurnagpal108@gmail.com