श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 460, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४०० ) कर्मकर्तृव्यपदेशाच्च ॥१।२।४॥ “एतमितः प्रेत्याभिसंभविताऽस्मि” इति प्राप्यतया परंब्रह्म व्यपदिश्यते, प्राप्तृतया च जीवः । अतः प्राप्ता जीव उपासकः प्राप्यंपरंब्रह्मोपास्यमिति प्राप्तुरन्यदेवेदमिति विज्ञायते । “शरीर से छूटने पर मैं इसी ब्रह्म को प्राप्त होऊँगा” इस वाक्य में प्राप्य रूप से परब्रह्म का तथा प्राप्त करने वाले जीव का स्पष्ट भिन्न निर्देश है । इससे समझना चाहिए कि प्राप्त करने वाला जीव उपासक तथा प्राप्य परब्रह्म उपास्य है जो कि प्रापक जीव से निश्चित ही भिन्न है । शब्दविशेषात् ॥१।२।५॥ “एष म आत्मान्तर्हृदये” इति शारीरः षष्ठ्या निर्दिष्टः उपास्यस्तु प्रथमया । एवं समानप्रकरणे वाजिनां च श्रुतौ शब्द विशेषः श्रूयते जीवपरयोः, यथा “ब्रीहिर्वा यवो वा श्यामाको वा श्यामाकतण्डुलो वा एवमयमन्तरात्मन् पुरुषो हिरण्मयो यथा ज्योतिर्धूमम्” इति । अत्र “अन्तरात्मन्” सप्तम्यन्तेन शारीरो निर्दिश्यते, “पुरुषो हिरण्मयः” इति प्रथमयोपास्यः । अतः पर एवो- पास्यः । “मेरे हृदय कमल के भीतर यह आत्मा” इत्यादि वाक्य में झरीरी को षष्ठी (संबंध कारक) तथा उपास्य (आत्मा) को प्रथमा (कर्त्ता कारक) दिखलाया गया है । इसी प्रकार के 'प्रकरण वाजसनेय में भी जीव और परमात्मा वाची शब्दों का विशेष उल्लेख मिलता है । जैसे कि— “सरसों, जव, श्यामाक तण्डुल से भी सूक्ष्म अन्तर्यामी पुरुष स्वर्ण के समान उद्दीप्त निधू'म ज्योतिस्वरूप है” इस वाक्य में सप्तम्यन्त “अन्तरात्मन” पद से झरीरी जीव को तथा प्रथमान्त “हिरण्मय पुरुष” पद से उपास्य परमात्मा का निर्देश है । इससे सिद्ध होता है कि परमात्मा ही उपास्य है । ankurnagpal108@gmail.com