भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४०१ ) इतश्च शारीरादन्यः—इसलिए भी जीव से परमात्मा भिन्न है कि— स्मृतेश्च ॥१।२।६। सर्वस्यचाहं हृदि सन्निविष्टो मत्तःस्मृतिर्ज्ञानमपोहनं च”— ‘यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम्”—ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति, भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया, तमेव शरणं गच्छ” इति शारीरमुपासकं, परमात्मानं चोपास्यं स्मृतिर्दर्शयति । मैं सबके हृदय में प्रविष्ट हूं, मुझसे ही स्मृति, ज्ञान और अपोहन (वितर्क) होते हैं” जो पुरुष मुझे पुरुषोत्तम जानता है, “अर्जुन ! ईश्वर सभी प्राणियों के हृदय में बैठकर यंत्र की तरह सभी प्राणियों को अपनी माया से घुमा रहा है—“उन्हीं की शरण में जाओ” इत्यादि श्रुति वाक्य भी, शरीरी जीवात्मा को उपासक तथा परमात्मा को उपास्य रूप से निर्देश करते हैं। अर्भकौकस्त्वात्तद्व्यपदेशाच्च नेतिचेन्न निचाय्यत्वादेवं व्योमवच्च । १।२।७॥ अल्पायतनत्वमर्भकौकस्त्वम्, तद्व्यपदेशः = अल्पत्वव्यपदेशः [L1