भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 462, कुल 696 में से

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( ४०२ ) जानते हैं वह सर्वगत, अतिसूक्ष्म और अव्यय है" इत्यादि वाक्य से परमात्मा का अपरिच्छिन्नत्व ज्ञात होता है जीव का स्वरूप तो, आरा की अग्रिम सूक्ष्म धार के समान बतलाया गया है । नैतदेवम्-परमात्मैव हि अणीयानित्येवं निचाय्यत्वेन व्यप- दिश्यते, एवं निचाय्यत्वेन-एवं द्रष्टव्यत्वेन, एवमुपास्यत्वेनेति यावत् । न पुनरणीयस्त्वमेवास्यस्वरूपमिति, व्योमवच्चायं व्यपदिश्यते, स्वाभाविकमहत्वं चात्रैव व्यपदिश्यते-"ज्यायान्पृथिव्या ज्याया- नन्तरिक्षा ज्ज्यायान्दिवो ज्यायानेभ्योलोकेभ्यः" इति । अत उपासनार्त्थमेवाल्पत्वव्यपदेशः । जैसा अर्थ आप करते है वह नही है अपितु परमात्मा ही उपासना के लिए अणीयस रूप से बतलाए गये है। उन्हें अतिसूक्ष्म बतलाने का तात्पर्य है कि, उन्हे अत्यल्प रूप से देखने की चेष्टा करो अर्थात् उनके अणीयस रूप की उपासना करो। इसका यह अर्थ नहीं है कि वे अणीयस रूप वाले ही है इनकी आकाश की सी सूक्ष्मता बतलाई गई है अर्थात् वे सूक्ष्म आकाश की तरह सर्वगत है। परमात्मा की स्वाभाविक महत्ता इस प्रकार वर्णन की गई है- "वह पृथवी से महान् अन्तरिक्ष से महान् द्युलोक से महान् तथा इन समस्त लोकों से महान् है।" इससे सिद्ध होता है कि उपासना के लिए ही उनका अणीयस रूप बतलाया गया है। तथाहि-"सर्वं खल्विदं ब्रह्म तज्जलानिति शांत उपासीत्" इति सर्वोत्पत्तिप्रलयकारणत्वेन सर्वस्याऽत्मतयाऽनुप्रवेशकृतजोव- यितृत्वेन च सर्वात्मकं ब्रह्मोपासीतेत्युपासनं विधाय "अथखलु क्रतुमयः पुरुषो यथा क्रतुरस्मिंल्लोके पुरुषो भवति तथेतः प्रेत्य भवति" इति यथोपासनं प्राप्यसिद्धिमभिधाय "स क्रतुंकुर्वीत" इति गुणविधानार्थमुपासनमनूद्य "मनोमयः प्राणशरीरो अरूप. सत्यसंकल्प आकाशात्मा सर्वकर्मा सर्वकामः सर्वगंधः सर्वरसः ankurnagpal108@gmail.com

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