भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः" इति जगदैश्वर्यविशिष्टस्य स्वरूप- गुणांश्चोपादेयान् प्रतिपाद्य "एष म आत्माऽन्तर्हृदयेऽणीयान् व्रीहेर्वा यवाद् वा सर्षपाद्वा श्यामाकाद् वा श्यामाकतण्डुलाद् वा" इत्यु- पासकस्य हृदयेऽणीयस्त्वेन तदात्मतयोपास्यस्यपरमपुरुषस्योपास- नार्थमवस्थानमुक्त्वा 'एष म आत्माऽन्तर्हृदये ज्यायान् पृथिव्या ज्यायानन्तरिक्षज्ज्यायान् दिवो ज्यायानेभ्योलोकेभ्यः सर्वकर्मा सर्व- कामः सर्वरसः सर्वमिदमभ्यात्तोऽवाक्यनादरः" इत्यन्तर्हृदयेऽवस्थित- स्योपास्यमानस्य प्राप्याकारं निर्दिश्य—"एष म आत्माऽन्तर्हृदय एतद् ब्रह्म" एवम्भूतं परं ब्रह्म परमकारुण्येनास्मदुज्जिजीविषयाऽस्मद् हृदये सन्निहितमितीदमनुसंधानं विधाय "एतमितः प्रेत्याभिसंभा- विताऽस्मि" इति यथोपासनं प्राप्तिनिश्चयानुसंधानं च विधाय इति यस्य स्यादद्धा न विचिकित्साऽस्ति" इत्येवंविध प्राप्यप्राप्ति- निश्चयोपेतस्योपासकस्य प्राप्तौ न संशयोऽस्तीत्युपसंहृतम् । अतः उपासनार्थमर्भकौकस्त्वमणीयस्त्वं च । तथा—"सारा जगत ब्रह्म का ही रूप है, उसी में लीन हो जाता है, उस परमात्मा की शांतभाव से उपासना करनी चाहिए" वाक्य में, समस्त जगत की उत्पत्ति और प्रलय के कारण सबके आत्मस्वरूप और जीवान्तर्यामी जीवनधारक सर्वात्मक ब्रह्म की उपासना करनी चाहिए, ऐसा उपासना का स्वरूप बतलाकर—"पुरुष निश्चय ही क्रतुमय है, इस लोक में पुरुष जैसे निश्चय वाला होता है वैसा ही मरने पर भी होता है" इस प्रकार उपासना के अनुरूप प्राप्य फल की बात कहकर "इसलिए उस पुरुष को निश्चय करना चाहिए" ऐसा गुण विधान के लिए उपासना का अनुवाद करते हुए "वह ब्रह्म मनोमय प्राणशरीर प्रकाश स्वरूप सत्य- संकल्प आकाश शरीर सर्वकर्मा सर्वकाम सर्वगंध सर्वरस इस सारे जगत को सब ओर से व्याप्त करने वाला, वाणी रहित संभ्रम शून्य है" इत्यादि ब्रह्म के, जागतिक ऐश्वर्यों से विशिष्ट उपादेय स्वरूप गुणों का प्रतिपादन करके "हृदय कमल के भीतर यह आत्मा धान, जव, श्यामाक सरसों से