भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

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( ४०४ ) भी सूक्ष्म है" इत्यादि में बतलाया गया कि उपास्य परंपुरुष अतिसूक्ष्म उपासक के हृदय में अभिन्नभाव से स्थित हैं ऐसा निश्चित करके "हृदय कमल में स्थित वह आत्मा, पृथिवी, अंतरिक्ष, द्युलोक तथा इन सभी लोकों से महान् है जो कि—सर्वकर्मा, सर्वकाम, सर्वगंध, सर्वरस सारे जगत को व्याप्त करने वाला, वाक्यरहित, भ्रमशून्य है।" इत्यादि उस हृदस्थ उपास्यमान परमेश्वर के प्राप्य रूप का वर्णन करके—"मेरे अन्तहृदय में जो आत्मा है वही ब्रह्म है" ऐसी करुणावरुणालय, हमारे उद्धार के लिए तत्पर हृदयस्थित परमात्मा के अनुसंधान की अनिवार्यता बतलाकर "इस शरीर को छोड़कर जाने पर उन्हीं को प्राप्त होऊँगा" इत्यादि उपासना के अनुरूप फलावाप्ति विषयक निश्चित नियम बतलाकर "इत्यादि प्राप्य प्राप्ति निश्चय संबंधी सिद्धान्त निर्णय से उपासक को परब्रह्म की प्राप्ति में कोई संदेह नहीं रह जाता; " ऐसा प्रकरण का उपसंहार किया जाता है। उपर्युक्त प्रकरण की पर्यालोचना से सिद्ध होता है कि—उपासना के लिए ही अल्पायतनत्व और अणीयत्व का प्रतिपादन किया गया है [स्वरूप निरूपण के लिए नहीं]। संभोगप्राप्तिरिति चेन्न वैशेष्यात् ॥१।२।८॥ जीवस्येव परस्यापि ब्रह्मणः शरीरान्तर्वर्त्तित्वमभ्युपगतं चेत्— तद्वदेव शरीरसंबंधप्रयुक्तसुखदुःखोपभोगप्राप्तिरिति चेत्तन्न, हेतु वैशेष्यात्—नहि शरीरान्तर्वर्तित्वमेव सुखदुःखोपभोग हेतुः, अपितु पुण्यपापरूपकर्मपरवशतत्वम्, तत्त्वपहतपाप्मनः परमात्मनो न संभवति । तथा च श्रुतिः “तयोरन्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इति । यदि यह कहें कि—जीव की तरह परब्रह्म की भी यदि शरीर में उपस्थिति मानेंगे तो शरीर संबंध होने से जीव की तरह ही, उनमें भी सुखदुःखात्मक भोग घटित होंगे। सो ऐसा संभव नहीं होगा, क्योंकि दोनों में भोग के कारण की भिन्नता रहती है। शरीर में रहना ही भोग का कारण हो ऐसा कोई आवश्यक नहीं है, अपितु पुण्य पाप रूप कर्म परवशता, भोग का कारण है, जो कि निष्पाप परमात्मा में संभव नहीं ankurnagpal108@gmail.com