श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 465, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४०५ ) है। जैसा कि--श्रुति वाक्य भी है--उन दोनो में एक वृक्ष के कर्मरूप फलों का स्वाद लेकर उपभोग करता है, दूसरा केवल देखता मात्र है।" २ अधिकरण:— यदि परमात्मा न भोक्ता, एवं तर्हि सर्वत्र भोक्तृतया प्रतीय- मानो जीव एव स्यादित्याशंक्याह-- यदि परमात्मा भोक्ता नहीं है तो क्या हर जगह जीवात्मा ही भोक्ता कहा गया है ? इस शंका का उत्तर देते हैं— अत्ता चराचरग्रहणात् १।२।९।। कठवल्लीष्वाम्नायते “यस्य ब्रह्म च क्षत्रं च उभे भवत ओदनः, मृत्युर्यस्योपसेचनं क इत्था वेद यत्र सः” इति । अत्रौदनोपसेचन सूचितोऽत्ता कि जीव एव, उत परमात्मेति संदिह्यते । कियुक्तम् जीव इति । कुतः ? भोक्तृत्वस्य कर्मनिमित्तत्वाज्जीवस्यैवतत्सं- भवात् । कठोपनिषद् में कहा गया है कि—‘धर्मशील ब्राह्मण और धर्म रक्षक क्षत्रिय दोनों जिसके भोज्य बन जाते हैं, सबको मारने वाला काल भी भोज्य का उपसेचन ( चटनी ) बन जाता है, ऐसे की महिमा को कौन जान सकता है?' इस प्रकरण में भोज्य और उपसेचन का भोक्ता कौन है, जीवात्मा या परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा, क्योंकि निमित्तक भोक्तृत्व जीव में ही संभव हो सकता है। अत्रोच्यते—अत्ता चराचर ग्रहणात्—अत्तापरमात्मैव कुतः ? चराचर ग्रहणात्—चराचरस्य कृत्स्नस्यात्तृत्वं हि तस्यैव संभवति न चेदं कर्मनिमित्तभोक्तृत्वं, अपि तु जगज्जन्मस्थितिलयहेतु भूतस्यपरस्यब्रह्मणोविष्णोः संहर्तृत्वम् “सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इत्यत्रैव दर्शनात् । तथा च “मृत्युर्यस्योप- सेचनं “इति वचनात् “ब्रह्म च क्षत्रं च” इति कृत्स्नं चराचरं