भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४०६ ) जगदिहादनीयौदनत्वेन गृह्यते । उपसेचनं हि नाम स्वयमद्यमानं सदन्यस्यादनहेतुः । अत उपसेचनत्वेन मृत्योरप्यद्यमानत्वात्तदुपसिच्य- मानस्यकृत्स्नस्य ब्रह्मक्षत्रपूर्वकस्य जगतश्चराचरस्यादनमत्र विवक्षितमिति गम्यते । ईदृशंचादनमुपसंहार एव । तस्मादीदृशं जगदुपसंहारित्वरूपं भोक्तृत्वं परमात्मन एव । उक्त संशय पर सूत्रकार कहते है कि--अत्ता परमात्मा ही हैं, क्योकि- इस प्रसंग मे चराचर सभी को भोज्य कहा गया है, चराचर जगत के भोजन करने की क्षमता परमात्मा में ही हो सकती है । यहाँ कर्म निमित्तक भोक्तृत्व की चर्चा नही है, अपितु जगत के जन्म स्थिति और लय के एकमात्र कारण परब्रह्म विष्णु के संहारक शक्ति निमित्तक भोक्तृत्व का प्रसंग है । “वह संसार मार्ग के पार जाकर भगवान विष्णु के सुप्रसिद्ध परमपद को प्राप्त हो जाता है” इत्यादि वाक्य उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं । “मृत्युर्यस्योपसेचनम्” तथा “ब्रह्म च क्षत्रं च” इत्यादि वाक्यांश से चराचर संपूर्ण जगत की भोज्यता ज्ञात होती है । स्वयं स्वतंत्र भोज्य होने के साथ ही जो अन्य भोज्य पदार्थों का सहायक भोज्य होता है उसे उपसेचन कहते हैं, उपसेचन रूप से जो मृत्यु का वर्णन किया गया है उसका तात्पर्य है कि--मृत्युमय ब्राह्मण क्षत्रिय आदि सारा जगत उस परमात्मा का भोज्य है। इस प्रकार यहाँ भोजन का अर्थ, संहार के अतिरिक्त, कुछ और नही है । इससे जगत की उपसंहारा- त्मक भोक्तृता परमात्मा की ही निश्चित होती है । प्रकरणाच्च १।२।१० । प्रकरणं चेदं परस्यैव ब्रह्मणः “महान्तं विभुमात्मानं मत्वाधीरो न शोचति” नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्” इति हि प्रकृतम् । “क इत्था वेद यत्र सः” इत्यपि हि तत् प्रसादात् ऋते तस्य दुखबोधत्वमेव पूर्वंप्रस्तुतं प्रत्यभिज्ञायते । ankurnagpal108@gmail.com