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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४०६ ) जगदिहादनीयौदनत्वेन गृह्यते । उपसेचनं हि नाम स्वयमद्यमानं सदन्यस्यादनहेतुः । अत उपसेचनत्वेन मृत्योरप्यद्यमानत्वात्तदुपसिच्य- मानस्यकृत्स्नस्य ब्रह्मक्षत्रपूर्वकस्य जगतश्चराचरस्यादनमत्र विवक्षितमिति गम्यते । ईदृशंचादनमुपसंहार एव । तस्मादीदृशं जगदुपसंहारित्वरूपं भोक्तृत्वं परमात्मन एव । उक्त संशय पर सूत्रकार कहते है कि--अत्ता परमात्मा ही हैं, क्योकि- इस प्रसंग मे चराचर सभी को भोज्य कहा गया है, चराचर जगत के भोजन करने की क्षमता परमात्मा में ही हो सकती है । यहाँ कर्म निमित्तक भोक्तृत्व की चर्चा नही है, अपितु जगत के जन्म स्थिति और लय के एकमात्र कारण परब्रह्म विष्णु के संहारक शक्ति निमित्तक भोक्तृत्व का प्रसंग है । “वह संसार मार्ग के पार जाकर भगवान विष्णु के सुप्रसिद्ध परमपद को प्राप्त हो जाता है” इत्यादि वाक्य उक्त तथ्य की ही पुष्टि करते हैं । “मृत्युर्यस्योपसेचनम्” तथा “ब्रह्म च क्षत्रं च” इत्यादि वाक्यांश से चराचर संपूर्ण जगत की भोज्यता ज्ञात होती है । स्वयं स्वतंत्र भोज्य होने के साथ ही जो अन्य भोज्य पदार्थों का सहायक भोज्य होता है उसे उपसेचन कहते हैं, उपसेचन रूप से जो मृत्यु का वर्णन किया गया है उसका तात्पर्य है कि--मृत्युमय ब्राह्मण क्षत्रिय आदि सारा जगत उस परमात्मा का भोज्य है। इस प्रकार यहाँ भोजन का अर्थ, संहार के अतिरिक्त, कुछ और नही है । इससे जगत की उपसंहारा- त्मक भोक्तृता परमात्मा की ही निश्चित होती है । प्रकरणाच्च १।२।१० । प्रकरणं चेदं परस्यैव ब्रह्मणः “महान्तं विभुमात्मानं मत्वाधीरो न शोचति” नायमात्मा प्रवचनेन लभ्यो न मेधया न बहुना श्रुतेन, यमेवैषवृणुते तेन लभ्यस्तस्यैष आत्मा विवृणुते तनूं स्वाम्” इति हि प्रकृतम् । “क इत्था वेद यत्र सः” इत्यपि हि तत् प्रसादात् ऋते तस्य दुखबोधत्वमेव पूर्वंप्रस्तुतं प्रत्यभिज्ञायते । ankurnagpal108@gmail.com

( ४०७ )

उक्त प्रकरण परब्रह्म संबंधी ही है, जैसा कि--“धीर व्यक्ति इन महत् विभु आत्मा को जानकर शोक नहीं करता,”--इन परमात्मा को शास्त्र ज्ञान प्रवचन या मेधा से नहीं जाना जा सकता, वे ही जिसे वरण करते हैं, वही उन्हें पा सकता है, वे उसके समक्ष अपना रूप प्रकट कर देते हैं ।” इत्यादि “वह कहाँ है उसे कौन जानता है ?” इत्यादि वाक्य भी उनकी दुर्बोधता और कृपापेक्षा का ज्ञापन करते हैं ।

अथस्यात्--नायं ब्रह्मक्षत्रौदनसूचितः पुरुषोऽपहतपाप्मा पर- मात्मा, अनन्तरं “ऋतं पिबन्तौ सुकृतस्यलोके गुहांप्रविष्टौ परमे परार्ध्ये, छायातपौ ब्रह्मविदोवदंति पंचाग्नयो ये च त्रिणाचिकेताः “इति कर्मफलभोक्तुरेव सद्वितीयस्याभिधानात् । द्वितीयश्च प्राणौ बुद्धिर्वा स्यात् । ऋतपानं हि कर्मफल भोग एव, स च परमात्मनो न संभवति, बुद्धिप्राणयोस्तु भोक्तृजीवस्योपकरणभूतयोर्य- थाकथंचित्पानेऽन्वयस्संभवतीति तयोरन्यतरेण सद्वितीयो जीव एव प्रतिपाद्यते, तदेकप्रकरणात्वात् पूर्वप्रस्तुतोऽत्ताऽपि स एव भवितु- मर्हति-इति । तत्रोच्यते--

शंका होती है कि--ब्रह्मक्षत्र भोज्य रूप से जिस भोक्ता के कहे गए हैं वह निष्पाप परमात्मा नहीं है । क्योंकि--जिस प्रकरण में ओदन रूप ब्रह्म क्षत्र का वर्णन है, उसी में आगे “शुभ कर्मों के फलस्वरूप मनुष्य शरीर में, परब्रह्म के उत्तम निवास स्थान बुद्धि रूपी गुहा में छिपे हुए सत्य का पान करने वाले छाया और धूप के समान दो परस्पर भिन्न हैं, ऐसा ब्रह्म वेत्ता ज्ञानी पुरुष कहते हैं, तथा तीन बार नाचिकेत अग्नि का चयन करने वाले पंचाग्नि संपन्न गृहस्थ भी ऐसा ही कहते हैं” इस प्रकार द्वितीय कर्मफल भोक्ता का वर्णन है; द्वितीय प्राण या बुद्धि हो सकते हैं । ऋतपान का अर्थ, कर्मफल का भोग ही है, जो कि—परमात्मा में संभव नहीं है । बुद्धि और प्राण भोक्ता जीव के सहायक उपकरण हैं, प्राण को यदि मुख्य प्राण मानें तो जीव ही द्वितीय स्थानीय होता है और उसे ही भोक्ता कहा गया है । एक ही प्रकरण में जिस प्रसंग की

( ४०८ ) प्रस्तावना की जाती है, उसे ही आगे समर्थन किया जाता है । इसलिए जीव ही भोक्ता हो सकता है । इस शंका का समाधान करते हैं— गुहांप्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥१।२।११॥ न प्राणजीवौ बुद्धिजीवौ वा गुहां प्रविष्टावृतं पिबन्तावित्युच्येते अपि तु जीवपरमात्मानौ हि तथाव्यपदिश्येते । कुत ? तद्दर्शनात् । अस्मिन् प्रकरणे जीवपरयोरेव गुहाप्रवेश व्यपदेशो दृश्यते । पर- मात्मानस्तावत् “तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्, अध्यात्मयोगाधिगमेन देवंमत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति । जीवस्यापि—“या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी, गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत” इति । कर्मफलान्यत्तीत्यदितिर्जीव उच्यते । प्राणेन सम्भवति-प्राणेन सहवर्त्तते । देवतामयी-इन्द्रियाधीन भोगा। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती-हृदयपुण्डरीकोदरवर्त्तिनो । भूतेभि- व्यंजायत्-पृथिव्यादिभिर्भूतैस्सहिता देवादिरूपेण विविधा जायते । एवं च सति “ऋतं पिबन्तौ” इति व्यपदेशः “छत्रिणोगच्छन्ति” इतिवत् प्रतिपत्तव्यः । यद् वा प्रयोज्यप्रयोजकरूपेण कर्तृत्वं जीव- परयोरुपपद्यते । उक्त प्रकरण में प्राण-जीव या बुद्धि जीव की गुहा में बैठने की बात नहीं है अपितु जीव और परमात्मा के प्रवेश की बात है । इस प्रकरण में जीव और परमात्मा का ही प्रसंग चल रहा है । प्रसंग के पूर्वभाग में परमात्मा का वर्णन जैसे— “जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबकी हृदय गुहा में स्थित, संसार रूप गहन वन में रहने वाले, सनातन, कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मा देव को शुद्ध बुद्धि युक्त साधक, अध्यात्मयोग की प्राप्ति द्वारा समझकर हर्ष शोक को छोड़ देते हैं ।” प्रकरण के उत्तर भाग में जीव का वर्णन जैसे--“जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न होती है, हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वही रहती है ।” ankurnagpal108@gmail.com

( ४०६ ) इत्यादि में अदिति का तात्पर्य है, कर्मफलों को भोगने वाली, इस व्याख्या के अनुसार अदिति शब्द जीव वाची ही है। प्राणेन संभवति का तात्पर्य है, प्राण के साथ व्यवहार करना। देवतामयी का तात्पर्य है—इन्द्रियाधीन भोग। “गुहां प्रविश्य तिष्ठंती” का अर्थ है हृदयकमल के अन्दर रहने वाली। “भूतेभिर्व्यजायत” का अर्थ है—पृथिवी आदि भूतों के साथ देवादि अनेक आकृतियों को धारण करने वाली। इसी प्रकार “ऋतं पिबन्तौ” का अर्थ “छत्रिणो गच्छन्ति” की तरह जानना चाहिए [जैसे कि छाता लगाकर जाते हुए झुंड को देखकर कहा जाता है कि छाते वाले जा रहे हैं, वस्तुतः छाता एक ही के सर पर होता है पर प्रयोग सभी के लिए होता है. वैसे ही गुहा में जीवात्मा परमात्मा दोनों हैं, जीवात्मा ही केवल ऋतदान करता है, परन्तु प्रयोग दोनों के लिए किया गया है] अथवा प्रयोजक परमात्मा और प्रयोज्य जीवात्मा है, ऐसा मान कर ही दोनों को भोक्ता कहा गया है [अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा से ही जीवात्मा भोग करता है, इसलिए दोनों को ही भोक्ता कह दिया गया] विशेषणाच्च ।१।२।१२॥ अस्मिन् प्रकरणे जीवपरमात्मानावेवोपास्यत्वोपासकत्वप्राप्यत्व- प्राप्तृत्वविशिष्टौ सर्वत्र प्रतिपाद्येते । तथाहि–“ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” इति । ब्रह्मजज्ञो जीवः ब्रह्मणोजातत्वात् ज्ञत्वाच्च, तं देवमीडं विदित्वा–जीवात्मानमुपासकं ब्रह्मात्मकत्वेनावगम्येत्यर्थः । तथा–“यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्, अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि” इत्युपास्यः परमात्मोच्यते । नाचिकेतं नाचिकेतस्य कर्मणः प्राप्यमित्यर्थः । “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरंरथमेव च” इत्यादिनोपासको जीव उच्यते । तथा–“विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इति प्राप्यप्राप्तारावभिधीयेते जीवपरमात्मानौ । इहापि “छायातपौ” इत्यज्ञत्वसर्वज्ञत्वाभ्यांतावेव विशिष्य व्यपदिश्येते । ankurnagpal108@gmail.com

( ४१० ) इस प्रकरण मे जीवात्मा और परमात्मा का उपास्य उपासक तथा प्राप्य प्रापक विशिष्ट रूप से सर्वत्र प्रतिपादन किया गया है। जैसा कि— “ब्रह्मोपासको से स्तवनीय परमात्मा को जानकर निष्कामभाव से उपासना करने वाला अत्यत शांति प्राप्त करता है” इस श्रुति से ज्ञात होता है। ब्रह्मजज्ञ का अर्थ है जीव, ब्रह्म से उत्पन्न होने अथवा ब्रह्म को जानने से ब्रह्मजज्ञ है। स्तवनीय उस देव को जानकर का तात्पर्य है जीवात्मा उपासक भाव से ब्रह्म स्वरूप को जानकर। तथा—“जो उपासकों के लिए सेतु के समान ( विभिन्न प्रकार के फल दाता ) हैं और जो भवसागर से पार होने के इच्छुको को अभय देने वाले हैं उन नाचिकेत कर्मलभ्य अक्षर ब्रह्म को हम जानने मे समर्थ हो सकते हैं ।” इस वाक्य मे परमात्मा को उपास्य बतलाया गया है। नाचिकेत का तात्पर्य है नाचिकेत कर्म के फलस्वरूप प्राप्त। “आत्मा को रथी तथा शरीर को रथ जानो” इत्यादि मे जीव को उपासक बतलाया गया है। तथा—“विज्ञान ( बुद्धि ) जिसका सारथी, तथा मन जिसकी लगाम है ऐसा मनुष्य विष्णू के परपद मार्ग को सरलता से प्राप्त कर लेता है ।” इत्यादि में जीवात्मा परमात्मा को प्राप्य प्रापक रूप से बतलाया गया है। इसी प्रकार “छायातपौ” इत्यादि मे अनभिज्ञ जीवात्मा तथा सर्वज्ञ परमात्मा का विशिष्ट उल्लेख है। अथस्यात्—“येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायम- स्तीति चैके” इति जीवस्वरूपयाथात्म्यप्रश्नोपक्रमत्वात्सर्वमिदं प्रकरणं जीवपरं इति प्रतीयते। नैतदेवम्, न हि जीवस्य देहाति- रिक्तस्यास्तित्वनास्तित्वशंकायाऽयं प्रश्नः, तथासति पूर्वावरद्वयवर- णानुपपत्तेः। तथा हि पितुः सर्ववेदसदक्षिणक्रतुसमाप्तिवेलायां दीय- मानं दक्षिणावैगुण्येन क्रतुवैगुण्यं मन्यमानेन कुमारेण नचिकेतसा आस्तिकाग्रेसरेण स्वात्मदानेनापि पितुः क्रतुसाद्गुण्यमिच्छता “कस्मै मां दास्यसि” इत्यसकृत्पितरं पृष्टवतास्वनिर्बन्धरुष्टपितृ- वचनान्मृत्युसदनं प्रविष्टेन स्वसदनात्प्रोषुषि यमे तद्दर्शनात्तत्र तिस्रो रात्रीरुपोषुषा स्वोपवासभीततत्प्रतिविधानप्रवृत्तमृत्युप्रदत्ते

( ४११ ) वरत्रये आस्तिक्यातिरेकात् प्रथमैववरेण स्वात्मानंप्रति पितुः प्रसादोवृतः, एतच्चसर्वं देहातिरिक्तात्मानमजानतो नोपपद्यते । द्वितीयेन च वरेणोत्तीर्णदेहात्मानुभाव्य फलसाधन भूताग्निविद्या वृत्ता; तदपि देहातिरिक्तात्मानमभिज्ञस्य न संभवति । अतस्तृतीयेन वरेण यदिदं व्रियते “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके, एतद्विद्यामनुशिष्टः त्वयाहं वराणामेष वर- स्तृतीयः ।” अत्र परमपुरुषार्थरूप ब्रह्मप्राप्ति लक्षणमोक्षयाथात्म्य विज्ञानाय तदुपायभूत परमात्मोपासनपरावरात्मतत्त्वजिज्ञासयाऽयं प्रश्नः क्रियते । एवं च-“येयं प्रेते” इति न शरीरवियोगमात्रभिप्रायं अपितु सर्वबन्धविनिर्मोक्षाभिप्रायम् । यथा “न प्रेत्यसंज्ञाऽस्ति” इति । अयमर्थः मोक्षाधिकृतेमनुष्ये प्रेतेसर्वबन्धविनिर्मुक्त तत्स्वरूप विषया वादिविप्रतिपत्तिनिमित्ताऽस्तिनास्त्यात्मिका येयं विचिकित्सा, तदपनोदनाय तत्स्वरूपयाथात्म्यं त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विद्याजानीयाम्- इति । संशय होता है कि-मृत्यु के बाद कुछों के मत में जीव का अस्तित्व रहता है और कुछों के मत में उसका अस्तित्व शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है ?” इस वाक्य को पढ़ने से ज्ञात होता है कि-“सर्वमिदम्” इत्यादि प्रकरण जीवात्मा का ही विवेचन करता है । जीव स्वरूप के यथार्थ निरूपण के लिए ही उक्त प्रश्न का उपक्रम किया गया है । ( समाधान ) बात ऐसी नहीं है-यह जीव के मरणोत्तर अस्तित्व, नास्तित्व विषयक संबंधी शंका नहीं है, यदि ऐसा मानेंगे तो नाचिकेता द्वारा इसके पूर्व के दो वरों की मांग असंगत हो जावेगी । जैसा कि प्रसंग है कि-पिता के सर्वस्व दक्षिणात्मक यज्ञ के अंत में जब सब कुछ दक्षिणा में दिया जा चुका उस समय यज्ञ की पूर्ति में कमी समझकर परम आस्तिक कुमार नचिकेता के “मुझे किसे देते हैं” इस प्रश्न को बारबार करने पर दुराग्रह से रुष्ट पिता के द्वारा मृत्यु को दिये जाने पर वह मृत्यु के घर गया, ankurnagpal108@gmail.com

( ४१२ ) उस समय यम प्रवास में थे, इसलिए उसने तीन रात्रि का उपवास किया, घर लौटने पर उपवास से भयभीत यमराज द्वारा वरयाचना का आश्वा- सन प्राप्त कर आस्तिकता के अतिरेक से नचिकेता ने प्रथम वर में अपने पिता की प्रसन्नता मांगी; ऐसा वर देह को ही आत्मा मानने वाला कभी नहीं मांग सकता। दूसरा वर उसने, देहोत्तीर्ण आत्मा के अनुभव योग्य फल की साधनिका, अग्नि विद्या की जानकारी का मांगा; देह को ही आत्मा मानने वाला ऐसा भी नहीं मांग सकता। "मनुष्य के मरने पर जो दो विभिन्न संशयालु धारणायें हैं कि शरीर के बाद भी जीव का अस्तित्व रहता है तथा शरीर के साथ ही अस्तित्व समाप्त हो जाता है; इसको समझने के लिए मैं तुम्हारे सामने उपस्थित हूं, मुझे इसकी जानकारी का तीसरा वर दो।" इस तीसरे वर में उसने, परमपुरुषार्थ ब्रह्मप्राप्ति स्वरूप मोक्ष प्राप्त की उपाय भूत परमात्मोपासना और परमात्मतत्त्व की जिज्ञासा की है। "येयं प्रेते" वाक्य वस्तुतः शरीरोपरान्त अर्थ के अभिप्राय से ही नहीं कहा गया है, अपितु उसमें सर्वबन्धविनिर्मोक्ष का अभिप्राय निहित है। जैसा कि--"न प्रेत्य संज्ञाऽस्ति" अर्थात् उपासक का शरीर पात के बाद कुछ भी शेष नहीं रह जाता, ऐसा एकमत है। ऐसे मुक्त पुरुष के स्वरूप के विषय में, परस्पर अस्तित्व और नास्तित्व का जो मतभेद जन्य संशय है उसकी निवृत्ति के लिये तुम्हारा उपदेश प्राप्त कर स्वरूपगत यथार्थ तत्त्व जानू ( यह तीसरा वरदान दो )। तथाहि बहुधा विप्रतिपद्यन्ते, केचिद् वित्तिमात्रस्यात्मनः स्व- रूपोच्छित्ति लक्षणं मोक्षमाचक्षते। अन्ये वित्तिमात्रस्यैव सतोऽविद्याऽ स्तमयम्। अपरे पाषाणकल्पस्यात्मनो ज्ञानाद्यशेषवैशेषिकगुणोच्छेद- लक्षणं कैवल्यरूपम्। अपरे तु अपहतपाप्मानं परमात्मानमुपगच्छन्त- स्तस्यैवोपाधिसंसर्गनिमित्तजीवभावस्योपाध्यपगमेन तद्भावलक्षणं मोक्षमातिष्ठन्ते। त्रय्यन्तनिष्णातास्तु निखिलजगदेककारणस्याशेषहेय प्रत्यनीकानन्तज्ञानानन्दैकस्वरूपस्य स्वाभाविकानवधिकातिशया- संख्येयकल्याणगुणाकरस्य सकलेतरविलक्षणस्य सर्वात्मभूतस्यपरस्य ब्रह्मणः शरीरतया प्रकारभूतस्यानुकूलापरिच्छिन्नज्ञानस्वरूपस्य

( ४१३ ) परमात्मानुभवेकरसस्य जीवस्यानादिकर्मरूपाविद्यातिरोहितस्वरूप- स्याविद्योच्छेदपूर्वकं स्वाभाविक परमात्मानुभवमेव मोक्षमाचक्षते । तत्र मोक्षस्वरूपंतत्साधनं च त्वत्प्रसादात् विद्यामिति नचिकेतसा पृष्टो मृत्युस्तस्यार्थस्य दुखबोधत्वप्रदर्शनेन विविधभोगवितरण प्रलोभनेन चैनं परीक्ष्य योग्यतामभिज्ञाय परावरात्मतत्त्वविज्ञानं परमात्मोपासनं तत्पदप्राप्तिलक्षणं मोक्षं च “तं दुर्दर्शं गूढमनु प्रविष्टम्” इत्यारभ्य “सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इत्यन्तेनोपदिश्य तदपेक्षितांश्च विशेषानुपदिदेशेति सर्वं समञ्जसम् । अतः परमात्मैवात्तेति सिद्धम् । इस विषय मे अनेक मत प्रस्तुत किये जाते है कोई एकमात्र ज्ञान स्वरूप आत्मा के स्वरूपोच्छेद को मोक्ष कहते है । दूसरे आत्मा को ज्ञान- स्वरूप कहते हुए अविद्याध्वंस को मोक्ष कहते हैं । एक कहते है कि पाषाण के सदृश अन्तःकरण के ज्ञान आदि विशेष गुणों का समुच्छेद ही मोक्ष है । कोई परमात्मा को निष्पाप मानकर उनकी उपाधि के संसर्ग से जीव भाव को प्र प्त करानेवाली उपाधियों के नष्ट हो जाने पर ब्रह्म भाव प्राप्ति को मोक्ष कहते है । जिनकी बुद्धि वेदांत शास्त्र के अनुशीलन से परिपक्व है, वे संपूर्ण जगत के एकमात्र कारण निर्दोष, आनंद स्वरूप, स्वाभाविक अगणित असख्य कल्याणमय गुणों के आकर, सर्वथा विलक्षण, सर्वान्तर्यामी परब्रह्म के शरीर स्थानीय, उन्ही के समान ज्ञानस्वरूप, परमात्मानुभूति जन्य आनंदरस निमग्न जीव का जो, अनादि कर्म रूप अविद्या से वास्तविक स्वरूप छिपा हुआ है, अविद्या के उच्छेद हो जाने पर उसी वास्तविक स्वरूप की पुनः प्राप्ति और आत्मानुभवरस की निमग्नता को ही मोक्ष मानते है । इन्ही विभिन्न मतों मे वस्तुतः मोक्ष का स्वरूप क्या है ? उसकी प्राप्ति का माधन क्या है ? इसको मै तुम्हारे अनुग्रह से जानना चाहता हूँ, नचिकेता के पूछे जाने पर यम ने पहिले जिज्ञासित विषय की दुर्गमता फिर भोगों का प्रलोभन देकर उसकी पात्रता की परीक्षा की । उमकी योग्यता की भली भाँति परीक्षा लेकर पर ( ब्रह्म ) और अवर ( जीव ) ankurnagpal108@gmail.com

४१४ आत्मतत्त्व विज्ञान, परमात्मोपासना तथा परमात्मपद प्राप्ति का “तंदुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टम्' से प्रारंभ करके “सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” तक उपदेश देते हुए मोक्ष प्राप्ति के विशेष साधनो का उपदेश दिया जिससे कि सब सामंजस्य हो गया । इससे सिद्ध होता है कि-उक्त प्रकरण में उपदिष्ट अत्ता परमात्मा ही है । ३ अधिकरण— अन्तर उपपत्तेः १।१।१३॥ इदमामनंति छंदोगाः “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते, एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” इति । तत्र संदेहः किमयं- मक्ष्याधारतया निर्दिश्यमानः पुरुषः प्रतिबिम्बात्मा, उत चक्षुरिन्द्रिया- धिष्ठाता देवताविशेषः, उत जीवात्मा अथ परमात्मा इति । किं युक्तम् ? प्रतिबिम्बात्मेति, कुतः ? प्रसिद्धवन्निर्देशात्, “दृश्यते” इत्यपरोक्षाभिधानाच्च । जीवात्मा वा तस्यापि हि चक्षुषि विशेषेण सन्निधानात् प्रसिद्धिरुपपद्यते उन्मीलितं हि चक्षुरुद्वीक्ष्य जीवात्मनः शरीरेस्थितिगती निश्चिन्वन्ति । “रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः” इति श्रुतिप्रसिद्ध्या चक्षुः प्रतिष्ठो देवताविशेषो वा, एष्वेव प्रसिद्धवन्निर्देशोपपत्तेरेषामन्यतमः । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि—“यह जो आंखों के बीच में पुरुष दीखता है, यही आत्मा, अमृत और अभयरूप ब्रह्म है” इस पर विचार होता है कि यह पुरुष है कौन, छायापुरुष अथवा नेत्रेन्द्रिय का अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा या परमात्मा ? छाया पुरुष भी हो सकता है क्योकि—“दृश्यते” ऐसा प्रत्यक्ष उल्लेख है। जीवात्मा भी हो सकता है क्योंकि—नेत्रों में उसका सानिध्य रहता है, ऐसी प्रसिद्धि है। नेत्रों के उन्मीलन से ही अनुमान होता है कि-जीव की उसमे स्थिति है । “वह सूर्य रश्मियों द्वारा नेत्रों में स्थित है' इस श्रौत वाक्य से, नेत्र प्रतिष्ठित प्रसिद्ध देवताविशेष का होना भी सिद्ध होता है। इन सभी की प्रसिद्धि पाई जाती है, इन सब में कौन है ? ankurnagpal108@gmail.com

( ४१५ ) इति प्राप्ति प्रचक्ष्महे-अन्तरउपपत्तेः-अक्ष्यन्तरः परमात्मा कुतः ? “एष आत्मेति होवाचैतदमृतमभयमेतद्ब्रह्मेति एतं संयद्वाम इत्याचक्षते, एतं हि सर्वाणि वामान्यभिसंयन्ति एष उएववामनिः, एषहि सर्वाणि वामानि नयति, एष उ एव भामनिः । एष हि सर्वेषुलोकेषु भाति” इत्येषां गुणानां परमात्मन्येवोपपत्तेः । उक्त विचारो पर कहते है—कि—नेत्रों में परमात्मा है क्योंकि-- “उसने कहा कि यह आत्मा अमृत, अभय ब्रह्म है, इसे सयद्वाम कहते है, क्योकि संपूर्ण सेवा वस्तुए सब ओर से इसे ही प्राप्त होती है, इसलिए यही वामनी है, यही सपूर्ण वामो को वह न करता है, यह भामनी है, यही संपूर्ण लोको में भासमान है ।” इत्यादि गुण परमात्मा मे ही उपपन्न हो सकते है । : स्थानादिव्यपदेशाच्च १।२।१४॥ चक्षुषि स्थितिनियमनादय. परमात्मन् एव “यश्चक्षुषि तिष्ठन्” इत्येवमादौ व्यपदिश्यन्ते । अतश्च” “य एषोऽक्षिणिपुरुषः” इति स एव प्रतीयते । अतः प्रसिद्धवन्निर्देशश्च परमात्मन्युपपद्यते । तत एव “दृश्यते” इति साक्षात्कारव्यपदेशोऽपि योगिभिर्दृश्यमानत्वा- दुपपद्यते । नेत्रों में स्थित, नियमन करने वाले परमात्मा ही हैं, 'जो नेत्रों में अवस्थान करते है” इत्यादि से ज्ञात होता है । “यही नेत्र पुरुष है” इस वाक्य में उन्ही का वर्णन है । इससे प्रसिद्ध निर्देश भी परमात्मा का ही प्रतीत होता है । “दृश्यते” इत्यादि में योगियों के लिए दृश्य साक्षात् का उल्लेख किया गया है । सुखविशिष्टाभिधानादेव १।२।१५॥ इतश्चाक्ष्याधारः पुरुषोत्तमः “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति प्रकृतस्य सुखविशिष्टस्य ब्रह्मणः उपासनस्थानविधानार्थं संयद्वामत्वादि ankurnagpal108@gmail.com

( ४१६ ) गुणविधानार्थं च "य एषोऽक्षिणि पुरुषः" इत्यभिधानात् । एवकारो नैरपेक्ष्यं हेतोद्योतयति । इसलिए भी नेत्रों में स्थिति पुरुषोत्तम हैं कि-- 'ब्रह्म क ( सुख- विशिष्ट ) तथा ख ( आकाश ) स्वरूप हैं" इस वाक्य में जिस सुख- विशिष्ट ब्रह्म को उपासना योग्य संयद्वाम आदि गुणों वाला बतलाया गया है, उन्हें ही "य एषोऽक्षिणि" इत्यादि में नेत्रस्थानीय बतलाया गया है । एकमात्र सुखविशिष्ट हेतु से ही अक्षि-पुरुष का परमपुरुषत्व प्रमा- णित हो सकता है । नन्वग्निविद्याव्यवधानात् "कं ब्रह्म" इति प्रकृतंब्रह्म नेह सन्निधत्ते । तथा हि-अग्नयः "प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इति ब्रह्म विद्यामुपदिश्य "अथहैनं गार्हपत्योऽनुशशास" इत्यारभ्याग्नीनामु- पासनमुपदिदिशुः । न चाग्निविद्या ब्रह्मविद्यांगमिति शक्यं वक्तुम्; ब्रह्मविद्याफलानन्तर्गततद्विरोधिसर्वायुः प्राप्ति संतत्यविच्छेदादिफल श्रवणात् उच्यते— "प्राणो ब्रह्म"— "एतदमृतमभयमेतद् ब्रह्म" इत्युभयत्र ब्रह्म संशब्दनात् । "आचार्यस्तु ते गतिं वक्ता" इत्याग्नि- वचनाच्च गत्युपदेशात् पूर्वं ब्रह्मविद्याया असमाप्तेस्तन्मध्यगताग्नि- विद्या ब्रह्मविद्यांगमिति निश्चीयते । "अथ हैनं गार्हपत्योऽनुशशास" इति ब्रह्मविद्याधिकृतस्यैवाग्निविद्योपदेशाच्च । संशय होता है कि--अग्निविद्या का व्यवधान स्वरूप उपदेश "क ब्रह्म" के प्रसंग में ठीक नहीं जचता । जैसा कि--तीन प्रकार की अग्नि का "प्राण ब्रह्म, क ब्रह्म, ख ब्रह्म" ब्रह्म विद्यात्मक उपदेश देकर "उसके बाद उसे गार्हपत्य अग्नि का उपदेश दिया" इस वाक्य से प्रारंभ करके सभी अग्नियों की उपासना का उपदेश दिया गया है । यह नहीं कह सकते कि--अग्निविद्या ब्रह्मविद्या का अंग है, क्योंकि-पूर्णायु और संतति परम्परा की प्राप्ति ही अग्निविद्या का फल है जो कि ब्रह्मविद्या के फल से सर्वथा विपरीत है । इसलिए विपरीत फलवाली विद्याओं का एक साथ उपदेश अप्रासंगिक है । ankurnagpal108@gmail.com

( ४१७ ) उक्त शंका का समाधान करते हैं—"प्राण ब्रह्म"—"वह अमृत और अभय स्वरूप है" इन दोनों वाक्यों में ब्रह्म शब्द का उल्लेख करके "आचार्य तुम्हें गति ( ब्रह्म ) प्राप्ति के उपाय का उपदेश देंगे" अग्नि- विषयक वाक्य के उल्लेख से ज्ञात होता है कि गति के उपदेश के पहिले तक ब्रह्मविद्या का ही प्रसंग है। प्रसंग के मध्य में जो अग्निविद्या का उपदेश दिया गया वह ब्रह्मविद्या का ही अंग है। "उसके बाद उसे गार्हपत्याग्नि का उपदेश दिया गया" इस वाक्य में भी ब्रह्मविद्या के अधिकारी रूप से ही अग्निविद्या का उपदेश दिया गया है। किंच—"व्याधिभिः प्रतिपूर्णोऽस्मि" इति ब्रह्मप्राप्तिव्यतिरिक्त नानाविधकामोपहतित्वपूर्वकगर्भजन्मजरामरणादिभवभयोपतप्तायोप- कोसलाय "एषा सोम्य तेऽस्मद्विद्याऽऽत्मविद्या च" इति समुच्चि- तयोपदेशात् 'मोक्षैकफलात्मविद्यांगत्वमग्निविद्यायाः प्रतीयते । एवं चांगत्वेऽवगते सति फलानुकीर्त्तनमर्थवाद इति गम्यते । तथा—ब्रह्म प्राप्ति के अभाव में अनेक प्रकार की कामनाओं से आक्रान्त होने से गर्भ जन्म जरामरण आदि जन्य व्याधियों से भयभीत उपकौशल ने जब कहा कि—"मैं व्याधियों से परिपूर्ण हूँ" तब उसे उप- देश हुआ कि—"हे सौम्य ! तुझे अग्नि विद्या और आत्मविद्या का उपदेश दिया गया" इस प्रकार एक साथ दो विद्याओं का उपदेश देकर ब्रह्मविद्या की अंगरूप से, अग्निविद्या को मोक्षदायिनी सिद्ध किया गया है। जिससे अग्निविद्या की, ब्रह्मविद्यांगता प्रतीत होती है। इस प्रकार अग्निविद्या की अंगता सिद्ध हो जाने पर फलविपरीतता की बात औप- चारिक कथनमात्र ज्ञात होती है। न चात्र मोक्षविरोधिफलं किंचिच्छ्रूयते "अपहते पापकृत्यां लोकी भवति सर्वमायुरेति ज्योग्जीवति नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते उपवयं तं भुंजामोऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च" इत्यमीषां फलानां मोक्षाधिकृतस्यानुगुणत्वात् । अपहतेपापकृत्यां = ब्रह्मप्राप्ति विरोधी पापकर्मपहंति । लोकी भवतितद्विरोधिनि पापे निरस्ते ब्रह्मलोकं ankurnagpal108@gmail.com

( ४१७ ) प्राप्नोति । सर्वमायुरेति = ब्रह्मोपासनसमासेर्याविदायुरपेक्षितम्, तत्सर्वमेति । ज्योग्जीवति = व्याध्यादिभिरनुपहतो यावद्ब्रह्मप्राप्ति जीवति । नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते = अस्यशिष्यप्रशिष्यादयः पुत्रपौत्रादयोऽपि ब्रह्मविद एव भवंति । “नास्याब्रह्मवित्कुले भवति” इति च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मविद्याफलत्वेन श्रूयते । उपवयन्तं भुंजामो- ऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च = वयम् अग्नयस्तमेनमुपभुंजामः, यावद् ब्रह्मप्राप्तिविघ्नेभ्यः परिपालयाम इति । अतोऽग्निविद्याया ब्रह्मविद्यां गत्वेन तत् संन्निधान अविरोधात् सुखविशिष्टं प्राकृतमेव ब्रह्मो- पासनस्थानविधानार्थं गुणविधानार्थं चोच्यते । अग्निविद्या के प्रसंग में कुछ भी मोक्ष विरोधी फल की बात नहीं है--“अग्नि का उपासक, पाप कर्मों को नष्ट कर लोकवान पूर्णायु होकर उज्वल जीवन व्यतीत करता है, उसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष क्षीण नहीं होते, उसका हम लोग इस लोक और परलोक में पालन करते है ।’’ इस श्रुति मे कहे गए सारे फल मोक्षाधिकारी पुरुष के अनुकूल ही हैं । “पापों को नष्ट कर” अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति विरोधी पापों को नष्ट कर । “लोक वान होता है” अर्थात् उन विरोधी पापो के नष्ट होने पर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । “पूर्णायु होता है” अर्थात् ब्रह्मोपासना मे अपेक्षित आयु प्राप्त करता है । “उज्वल जीवन व्यतीत करता है “अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति की अवधि तक रोगादिकों से मुक्त होकर सुखी जीवनयापन करता है ।” इसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष नष्ट नहीं होते “अर्थात् उसके शिष्य, प्रशिष्य, पुत्र पौत्र सभी ब्रह्मवेत्ता होते हैं ।” उसके कुल में कोई अब्रह्मविद नहीं होता” इस अन्य श्रुति से भी ब्रह्मविद्या की फलरूप से ज्ञप्ति की गई है । “उसका हम इस लोक और परलोक में पालन करते हैं” अर्थात् हम अग्नियां ऐसे पुरुष का उपभोग करते हैं, जब तक उसे ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक विघ्नों से उसका पालन करते है । इससे स्पष्ट है कि अग्निविद्या, ब्रह्मविद्या की ही अंग है, इन दोनों का एक साथ किया गया उपदेश विरोधी नहीं है अपितु उपयोगी ही है । उपासना के उपयुक्त ankurnagpal108@gmail.com

स्थान के विधान, तथा तदुपयोगी गुणविधान के लिए जो सुखविष्ट (क) ब्रह्म की चर्चा की वह स्वाभाविक ही है (विरोधी नहीं) । ननु-“आचार्यस्तुतेगतिं वक्ता” इति गतिमात्रपरिशेषणादा- चार्येण गतिरेवोपदेश्येति गम्यते, तत्कथं स्थानगुणविध्यर्थतोच्यते तदभिधीयते “आचार्यस्तुते गतिवक्ता” इत्यस्यायमभिप्रायः ब्रह्मवि- द्याम्रनुपदिश्य प्रोषुषिगुरौ तदलाभादनाश्वासमुपकोसलमुज्जीवयितुं स्वपरिचरप्रणीता गार्हपत्यादयो गुरोरग्नयस्तस्मै ब्रह्मस्वरूपमात्रं तदंगभूतां चाग्निविद्यामुपदिश्य “आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत्” इति श्रुत्यर्थमालोच्य साधुतमत्वप्राप्त्यर्थमाचार्यं एवास्य संयद्वामत्वादि गुणकं ब्रह्म तदुपासनस्थानमर्चिरादिकां च गतिमुपदि- शत्वितिमत्वा “आचार्यस्तु ते गतिवक्ता” इत्यवोचन् । (प्रश्न) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे” इस वाक्य से तो ज्ञात होता है कि—एकमात्र गति विषयक उपदेश ही शेष रह गया था आचार्य को केवल उसी का उपदेश करना था, फिर स्थान और गुण विशेष के लिए सुखविशिष्ट का ब्रह्म की चर्चा कैसे स्वाभाविक है ? ( समाधान ) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देगे” का अभिप्राय यह है कि—उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिये बिना ही आचार्य प्रवास मे चले गए थे, ब्रह्मविद्या न पाकर उपकोसल बहुत निराश हुआ, उसके द्वारा की गई परिचर्या से प्रसन्न होकर अग्नियों ने उसे, ब्रह्म के स्वरूप और उसकी प्राप्ति की अंगस्वरूप अग्निविद्या का उपदेश देकर “आचार्य से प्राप्त ब्रह्मविद्या ही अतिशय साधुता को प्राप्त होती है इस श्रुत्यर्थ का विचार कर अतिशय सिद्धि प्राप्ति के लिए आचाय ही इसे संयद्वामत्व आदि गुण युक्त ब्रह्म, ब्रह्मोपासना का स्थान एवं अर्चिरादि- गति का उपदेश करें; ऐसा निश्चय कर उन्होने उपकोसल को आदेश दिया कि—आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे। गतिग्रहणमुपदेश्यविद्याशेषप्रदर्शनाथंम् । अतएव आचार्योऽपि “अहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाशआपो न श्लिष्यन्ते एव-

( ४२० ) मेवंविदि पापंकर्म न श्लिष्यते” इत्युपक्रम्य संयद्वामत्वादिकल्याण गुणविशिष्टं ब्रह्माक्षिस्थानोपास्यमर्चिरादिकां च गतिमुपदिदेश। अतः “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति सुखविशिष्टस्य प्रकृतस्यैव ब्रह्मणो- ऽत्राभिधानादयमक्ष्याधारः परमात्मा। उपदेष्टव्य विद्या से सबंधित जो कुछ भी वक्तव्य है वह सभी “गति” शब्द के प्रयोग में उल्लेख्य है। इसलिए आचार्य ने भी—“अब मैं तुझे वह बतलाता हूं, जिसे जानकर पापकर्मों का उसी प्रकार संबंध विच्छेद हो जाता है जैसे कि कमल पत्र में जल का आश्लेष नहीं रहता ।” इस भूमिका के साथ संयदवामत्व आदि गुण विशिष्ट ब्रह्म की नेत्रस्थानीय उपासना तथा अर्चिरादिगति का उपदेश दिया। इस प्रकरण की इस प्रकार पर्यालोचना करने पर स्पष्ट हो जाता है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म” सुखविशिष्ट नेत्र स्थानीय उपास्य का जो उल्लेख किया गया है, वह स्वाभाविक ही है। ननु च “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति परंब्रह्माभिहितमिति कथमव- गम्यते, यस्येहाक्ष्याधारतयाऽभिधानंब्रूषे; यावता “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति प्रसिद्धाकाश लौकिकसुखयोरेव ब्रह्मदृष्टिर्विधीयत इति प्रति- भाति “नाम ब्रह्म”-मनोब्रह्म” इत्यादि वचनसारूप्यात् । तत्राह- शंका होती है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म” यह प्रयोग परंब्रह्म के लिए ही किया गया है, तथा यही नेत्रस्थानीय है, यह कैसे जान गए ? “कं ब्रह्म ख ब्रह्म” शब्द से तो प्रसिद्ध आकाश और लौकिक सुख को ही ब्रह्म दृष्टि से प्रतिपादन किया गया है, यह तो “नाम ब्रह्म” “मन ब्रह्म” की तरह ही वाक्य है। इसका समाधान करते हैं-- अत एव च स ब्रह्म १।२।१६॥ यतस्तत्र “यदेव कं तदेव खं” इति सुखविशिष्टस्याकाशस्याभि- धानम् अतएव ख शब्दाभिधेय. सः आकाशः परंब्रह्म एतदुक्त भवति- अग्निभिः “प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इत्युक्ते उपकोसल उवाच- ankurnagpal108@gmail.com

( ४२१ ) "विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामि" इति । अस्यान्यमभिप्रायः-न तावत्प्राणादिप्रतीकोपासनमग्निभिरभिहितम् जन्मजरामरणादिभवभयभीतस्य मुमुक्षोर्ब्रह्मोपदेशाय प्रवृत्तत्वात् अतो ब्रह्मैवोपास्यमुपदिष्टम् । तत्र प्रसिद्धैः प्राणादिभिः समाना- धिकरणं ब्रह्म निर्दिष्टम् । तेषु च प्राण विशिष्टत्वं जगद्विधरण- योगेन वा प्राणशरीर तया प्राणस्यनियंतृत्वेन वा ब्रह्मण उपपद्यत इति "विजानाम्यहं यत्प्राणोब्रह्म" इत्युक्तवान् । विशेष प्रयोजन से ही वहां "जो क है वही ख है" ऐसा सुख विशिष्ट आकाश का निरूपण किया गया है (अर्थात् आकाश के समान अपार निर्दोष, सुख विशेष ही ब्राह्मसुख है) इसलिए ख शब्द से अभिधेय आकाश भी परंब्रह्म है। तीनों अग्नियों के "प्राण ब्रह्म-कं ब्रह्म-ख ब्रह्म" ' कहने पर उपकोसल ने कहा-"मैं प्राण ब्रह्म को तो जानता हूं पर क और ख कैसे ब्रह्म है यह नहीं समझ पाया। इसका तात्पर्य है कि-अग्नियों ने प्राण आदि की प्रतीकोपासना रूप से व्याख्या की हो, ऐसा नहीं है, अपितु जन्मजरामरण आदि सांसारिक भयों से भीत मुमुक्षु को, ब्रह्मोपदेश देने के लिए ऐसा कहा था। इससे ज्ञात होता है कि-ब्रह्म की उपासना का ही उपदेश दिया गया है तथा उन वाक्यों में, प्रसिद्ध प्राण आदि के सामानाधिकरण्य से ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। ब्रह्म ही जगत को धारण करते हैं अथवा प्राण ब्रह्म का शरीर है अतएव वे ही प्राण के नियामक परि- चालक हैं इत्यादि से ब्रह्म का प्राण विशिष्टत्व धर्म सिद्ध होता है-इसी लिए-"प्राण ब्रह्म को तो मैं जानता हूँ" ऐसा (उपकोसल ने) कहा। तथा सुखाकाशयोरपि ब्रह्मणः शरीरतया तन्नियाम्यत्वेन विशेषणत्वम्,उतान्योन्यव्यवच्छेदकतया निरतिशयानंदरूपब्रह्मस्व- रूपसमर्पणपरत्वेन वा तत्र पृथग्भूतयोः शरीरतया विशेषणत्वे वैषयिकसुखभूताकाशयोर्नियामकत्वं ब्रह्मणः स्यादिति स्वरूपा- ankurnagpal108@gmail.com

( ४२२ ) वगर्तिनस्यात्, अन्योन्यव्यवच्छेदकत्वेऽपरिच्छिन्नानन्दैकस्वरूपत्वं ब्रह्मणः स्यादित्यन्यतरप्रकारनिर्दिधारयिषया 'कं च तु खं च न विजानामि" इत्युक्तवान् । इसी प्रकार सुख और आकाश भी ब्रह्म के शरीर स्थानीय रूप से उनके नियंत्रण में रहने से विशेषण स्वरूप है अथवा परस्पर एक दूसरे से विशेषित होकर निरतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप का प्रकाश करते हैं इसलिए वे ब्रह्म के विशेषण हैं ? इस विचारणीय प्रश्न पर-इन दोनों (क और ख) को ब्रह्म का भिन्न-भिन्न शरीर मानकर यदि विशेषण माना जावे तो ब्रह्म का नियंत्रण वैषयिक सुख और भूताकाश पर हो सकता है, पर ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नही हो सकता [अर्थात् सुख ही ब्रह्म है, आकाश ही ब्रह्म है ऐसा नहीं कहा जा सकता अपितु वैषयिक सुख और भूताकाश को ब्रह्मसुख और दहराकाश का अंग कहा जा सकता है] एक दूसरे से विशेषित होकर तो अतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप की अवगति हो सकती है [अर्थात् जो क है वही ख है और जो ख है वही क है, इस व्याख्या के अनुसार सुख और आकाश की पारस्परिक विशेषताओ से, आकाश के समान व्यापक स्वच्छ सुख है अथवा सुख का सा सरल गंभीर आकाश है, ये दोनों ही विशेषतायें, ब्रह्म की अखंड आनंदमयता का प्रकाश करती है] उपकोसल के समक्ष उपर्युक्त संशयात्मक दो विचार थे, इसीलिए उसने गुरु से कहा था कि-“क और ख कैसे ब्रह्म हैं यह मैं नहीं समझ सका।" उपकोसलस्येममाशयं जानन्तोऽग्नयः “यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ” इत्यूचिरे । ब्रह्मणः सुखरूपत्वमेवापरिच्छिन्न मित्यर्थः । अतः प्राणशरीरतया प्राणविशिष्टं यद् ब्रह्म तदेव अपरिच्छिन्नं सुखरूपं चेति निगमितम् “प्राणं च हास्मैतदाकाशं चोचुः” इति । अतः 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इत्यत्रापरिच्छिन्नं सुखं ब्रह्म प्रतिपादितमिति परंब्रह्मैव तत्र प्रकृतम्, तदेव चात्राक्ष्याधारतयाऽ- मिधीयत इत्यक्ष्याधारः परमात्मा ।

उपकोसल के उक्त आशय को समझ कर अग्नियों ने कहा कि— "जो क है वही ख है, जो ख है वही क है" ब्रह्म निस्सीम सुख स्वरूप है यही उनके कथन का तात्पर्यार्थ है। प्राण जिनका शरीर है, ऐसे प्राण से विशिष्ट ब्रह्म, निस्सीम सुखस्वरूप भी है ऐसा "प्राण और उसके आश्रय- भूत आकाश का उपदेश किया" इस वेदांत वाक्य से सिद्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि—"क ब्रह्म ख ब्रह्म" इत्यादि वाक्य में निस्सीम सुख स्वरूप ब्रह्म का ही वर्णन है जो कि परब्रह्म का ही प्रतिपादक है, वही उक्त प्रकरण का नेत्रस्थानीय नेत्राधार परमात्मा है। श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ।१।२।१७॥ श्रुतोपनिषत्कस्य—अधिगतपरमपुरुषयाथात्म्यस्यानुसंधेयतया श्रुत्यंतरप्रतिपाद्यमाना अचिरादिका गतिर्या, तामपुनरावृत्तिलक्षण- परं पुरुषप्राप्तिकरीमुपकोसलायाक्षिपुरुषं श्रुतवते "तेऽर्चिषमेवाभि- संभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षम" इत्यारभ्य" चन्द्रमसोविद्युतम् तत्पुरुषो मानव. स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमानां इमं मानवमावर्त्तं नावत्र्त्तन्ते "इत्यन्तेनोपदिशति । अतोऽप्ययमक्षिपुरुषः परमात्मा । श्रुतोपनिषत्क अर्थात औपनिषद ज्ञातव्य परमपुरुष भगवान तथा तत्संबंधी अन्यान्य श्रुतिवाक्यों से अपुनरावृति लक्षण वाली परंपुरुष को प्राप्त कराने वाली अचिरादिगति, उपकोसल को—" वे अर्चिअभिमानी देवता को ही प्राप्त होते है, अर्चि से दिवसाभिमानी देवता को दिवसा- भिमानी देवता से शुक्लपक्षाभिमानी देवता को" इत्यादि से प्रारंभ करके "चन्द्रमा से विद्युत को, वहाँ से अमानव पुरुष, ब्रह्म को प्राप्त करा देता है, यह देवमार्ग ब्रह्मपथ है, इससे जाने वाले मानव, मानव मंडल में कदापि नहीं लौटते" यहाँ तक बतलाई गई है. वह अक्षिपुरुष के लिए ही है। इससे भी सिद्ध होता है कि अक्षिपुरुष परमात्मा ही है। अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ।१।२।१८॥ प्रतिबिम्बादीनामक्षिणि नियमेनानवस्थानाद मृतत्वादीनां च

( ४२४ ) निरुपाधिकानां तेष्वसंभवान्न परमात्मन इतरः छायादिः अक्षिपुरुषो भवितुमर्हति । प्रतिबिम्बस्य तावत्पुरुषान्तर संनिधानायत्तत्वान्न नियमेनावस्थानसंभवः । जीवस्यापि सर्वेन्द्रियव्यापारानुगुण्यत्वाय- सर्वेन्द्रियकेन्द्रभूते स्थानविशेषे वृत्तिरिति चक्षुषि नावस्थानम् । देवतायाश्च ‘ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः' इति रश्मिद्वारेणा- वस्थानवचनात् देशांतरावस्थितस्यापीन्द्रियाधिष्ठानोपपत्तेर्न चक्षु- ष्यवस्थानं सर्वेषामेवैषां निरुपाधिकामृतत्वादयो न संभवन्त्येव । तस्मादक्षिपुरुषः परमात्मा । अमृतत्व आदि धर्म छायापुरुष आदि में संभव नहीं हैं, नेत्रों में इन सबको नियमित स्थिति भी संभव नहीं है । परमात्मा के अतिरिक्त ये सब अक्षिपुरुष नहीं हो सकते । सामने किसी व्यक्ति के हुए बिना छाया तो पड़ नहीं सकती, इसलिए छायापुरुष की नेत्रों में नियमित स्थिति संभव नहीं है । जीव की,

( ४२५ ) धर्म हैं, “स्थानादिव्यपदेशाच्च” सूत्र में प्रमाणों द्वारा सिद्ध करके, अक्षि- पुरुष की परमात्मकता सिद्ध की गई अब उसी का समर्थन करते हैं । अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषुतद्धर्मव्यपदेशाच्च ॥ १।२।१८॥ काण्वा-माध्यन्दिनाश्च-वाजसनेयिनः समामनंति-“यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येषत आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति । एवम् अम्ब्वग्न्यन्तरिक्षवाय्वादित्यदिक्चंद्रतारकाकाशतमस्तेजस्सुदैवेषु च सर्वेषु भूतेषु प्राणवाक्चक्षुश्श्रोत्रमनस्त्वग्विज्ञानरेतः स्वात्मात्मीयेषु च तिष्ठंतं तत्तदन्तरभूतं तत्तदवेद्यं तत्तच्छरीरकं तत्तद्यमयन्तं कंचिन्निर्दिश्य “एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्युपदिश्यते । माध्यन्दिन पाठे तु ‘यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन्’ ‘यः सर्वेषु वेदेषु’— यः सर्वेषु यज्ञेषु “इति च पर्यायाः ।” यो विज्ञाने तिष्ठन् “इत्यस्य पर्यायस्य स्थाने” य आत्मनितिष्ठन् “इति पर्यायः । “सत आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति विशेषः । तत्र संशय्यते-किमयमन्तर्यामी प्रत्यगात्मा उत परमात्मा-इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः । वाक्यशेषे “द्रष्टाश्रोता” इतिकरणायत ज्ञानताश्रुतेः । एवं द्रष्टुरे- वान्तर्यामित्वोपदेशात् । ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इति द्रष्ट्रन्तर निषेधाच्चेति । यजुर्वेदीय काण्वशाखा और माध्यन्दिन वाजसनेयी शाखा में ऐसा वर्णन मिलता है कि— “जो पृथिवी में होते हुए भी पृथिवी से भिन्न हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पर पृथिवी उनका शरीर है, वह पृथिवी में अन्तर्यामी रूप से उसका संयमन करते है, वे अन्तर्यामी अमृत परमात्मा ही तुम्हारे आत्मा हैं ।” इत्यादि— इसी प्रकार जल-अग्नि-अंतरिक्ष- वायु-आदित्य-दिक्-चंद्र-तारा-आकाश-तम और तेज रूप देवताओं में, समस्त भूतों में, प्राण-वाक्-चक्षु-श्रोत्र-मन-त्वग्-बुद्धि और शुक्र आदि आत्मा और आत्मियों में अवस्थित उनके अन्तर्यामी उनसे अज्ञेय, उनके ankurnagpal108@gmail.com