श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०८ ) प्रस्तावना की जाती है, उसे ही आगे समर्थन किया जाता है । इसलिए जीव ही भोक्ता हो सकता है । इस शंका का समाधान करते हैं— गुहांप्रविष्टावात्मानौ हि तद्दर्शनात् ॥१।२।११॥ न प्राणजीवौ बुद्धिजीवौ वा गुहां प्रविष्टावृतं पिबन्तावित्युच्येते अपि तु जीवपरमात्मानौ हि तथाव्यपदिश्येते । कुत ? तद्दर्शनात् । अस्मिन् प्रकरणे जीवपरयोरेव गुहाप्रवेश व्यपदेशो दृश्यते । पर- मात्मानस्तावत् “तं दुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टं गुहाहितं गह्वरेष्ठं पुराणम्, अध्यात्मयोगाधिगमेन देवंमत्वा धीरो हर्षशोकौ जहाति” इति । जीवस्यापि—“या प्राणेन सम्भवत्यदितिर्देवतामयी, गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती या भूतेभिर्व्यजायत” इति । कर्मफलान्यत्तीत्यदितिर्जीव उच्यते । प्राणेन सम्भवति-प्राणेन सहवर्त्तते । देवतामयी-इन्द्रियाधीन भोगा। गुहां प्रविश्य तिष्ठन्ती-हृदयपुण्डरीकोदरवर्त्तिनो । भूतेभि- व्यंजायत्-पृथिव्यादिभिर्भूतैस्सहिता देवादिरूपेण विविधा जायते । एवं च सति “ऋतं पिबन्तौ” इति व्यपदेशः “छत्रिणोगच्छन्ति” इतिवत् प्रतिपत्तव्यः । यद् वा प्रयोज्यप्रयोजकरूपेण कर्तृत्वं जीव- परयोरुपपद्यते । उक्त प्रकरण में प्राण-जीव या बुद्धि जीव की गुहा में बैठने की बात नहीं है अपितु जीव और परमात्मा के प्रवेश की बात है । इस प्रकरण में जीव और परमात्मा का ही प्रसंग चल रहा है । प्रसंग के पूर्वभाग में परमात्मा का वर्णन जैसे— “जो योगमाया के पर्दे में छिपा हुआ, सर्वव्यापी, सबकी हृदय गुहा में स्थित, संसार रूप गहन वन में रहने वाले, सनातन, कठिनता से देखे जाने वाले परमात्मा देव को शुद्ध बुद्धि युक्त साधक, अध्यात्मयोग की प्राप्ति द्वारा समझकर हर्ष शोक को छोड़ देते हैं ।” प्रकरण के उत्तर भाग में जीव का वर्णन जैसे--“जो देवतामयी अदिति प्राणों के सहित उत्पन्न होती है या जो प्राणियों के सहित उत्पन्न होती है, हृदयरूपी गुहा में प्रवेश करके वही रहती है ।” ankurnagpal108@gmail.com