श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४०६ ) इत्यादि में अदिति का तात्पर्य है, कर्मफलों को भोगने वाली, इस व्याख्या के अनुसार अदिति शब्द जीव वाची ही है। प्राणेन संभवति का तात्पर्य है, प्राण के साथ व्यवहार करना। देवतामयी का तात्पर्य है—इन्द्रियाधीन भोग। “गुहां प्रविश्य तिष्ठंती” का अर्थ है हृदयकमल के अन्दर रहने वाली। “भूतेभिर्व्यजायत” का अर्थ है—पृथिवी आदि भूतों के साथ देवादि अनेक आकृतियों को धारण करने वाली। इसी प्रकार “ऋतं पिबन्तौ” का अर्थ “छत्रिणो गच्छन्ति” की तरह जानना चाहिए [जैसे कि छाता लगाकर जाते हुए झुंड को देखकर कहा जाता है कि छाते वाले जा रहे हैं, वस्तुतः छाता एक ही के सर पर होता है पर प्रयोग सभी के लिए होता है. वैसे ही गुहा में जीवात्मा परमात्मा दोनों हैं, जीवात्मा ही केवल ऋतदान करता है, परन्तु प्रयोग दोनों के लिए किया गया है] अथवा प्रयोजक परमात्मा और प्रयोज्य जीवात्मा है, ऐसा मान कर ही दोनों को भोक्ता कहा गया है [अर्थात् परमात्मा की प्रेरणा से ही जीवात्मा भोग करता है, इसलिए दोनों को ही भोक्ता कह दिया गया] विशेषणाच्च ।१।२।१२॥ अस्मिन् प्रकरणे जीवपरमात्मानावेवोपास्यत्वोपासकत्वप्राप्यत्व- प्राप्तृत्वविशिष्टौ सर्वत्र प्रतिपाद्येते । तथाहि–“ब्रह्मजज्ञं देवमीड्यं विदित्वा निचाय्येमां शान्तिमत्यन्तमेति” इति । ब्रह्मजज्ञो जीवः ब्रह्मणोजातत्वात् ज्ञत्वाच्च, तं देवमीडं विदित्वा–जीवात्मानमुपासकं ब्रह्मात्मकत्वेनावगम्येत्यर्थः । तथा–“यः सेतुरीजानानामक्षरं ब्रह्म यत्परम्, अभयं तितीर्षतां पारं नाचिकेतं शकेमहि” इत्युपास्यः परमात्मोच्यते । नाचिकेतं नाचिकेतस्य कर्मणः प्राप्यमित्यर्थः । “आत्मानं रथिनं विद्धि शरीरंरथमेव च” इत्यादिनोपासको जीव उच्यते । तथा–“विज्ञानसारथिर्यस्तु मनः प्रग्रहवान्नरः, सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इति प्राप्यप्राप्तारावभिधीयेते जीवपरमात्मानौ । इहापि “छायातपौ” इत्यज्ञत्वसर्वज्ञत्वाभ्यांतावेव विशिष्य व्यपदिश्येते । ankurnagpal108@gmail.com