श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१० ) इस प्रकरण मे जीवात्मा और परमात्मा का उपास्य उपासक तथा प्राप्य प्रापक विशिष्ट रूप से सर्वत्र प्रतिपादन किया गया है। जैसा कि— “ब्रह्मोपासको से स्तवनीय परमात्मा को जानकर निष्कामभाव से उपासना करने वाला अत्यत शांति प्राप्त करता है” इस श्रुति से ज्ञात होता है। ब्रह्मजज्ञ का अर्थ है जीव, ब्रह्म से उत्पन्न होने अथवा ब्रह्म को जानने से ब्रह्मजज्ञ है। स्तवनीय उस देव को जानकर का तात्पर्य है जीवात्मा उपासक भाव से ब्रह्म स्वरूप को जानकर। तथा—“जो उपासकों के लिए सेतु के समान ( विभिन्न प्रकार के फल दाता ) हैं और जो भवसागर से पार होने के इच्छुको को अभय देने वाले हैं उन नाचिकेत कर्मलभ्य अक्षर ब्रह्म को हम जानने मे समर्थ हो सकते हैं ।” इस वाक्य मे परमात्मा को उपास्य बतलाया गया है। नाचिकेत का तात्पर्य है नाचिकेत कर्म के फलस्वरूप प्राप्त। “आत्मा को रथी तथा शरीर को रथ जानो” इत्यादि मे जीव को उपासक बतलाया गया है। तथा—“विज्ञान ( बुद्धि ) जिसका सारथी, तथा मन जिसकी लगाम है ऐसा मनुष्य विष्णू के परपद मार्ग को सरलता से प्राप्त कर लेता है ।” इत्यादि में जीवात्मा परमात्मा को प्राप्य प्रापक रूप से बतलाया गया है। इसी प्रकार “छायातपौ” इत्यादि मे अनभिज्ञ जीवात्मा तथा सर्वज्ञ परमात्मा का विशिष्ट उल्लेख है। अथस्यात्—“येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायम- स्तीति चैके” इति जीवस्वरूपयाथात्म्यप्रश्नोपक्रमत्वात्सर्वमिदं प्रकरणं जीवपरं इति प्रतीयते। नैतदेवम्, न हि जीवस्य देहाति- रिक्तस्यास्तित्वनास्तित्वशंकायाऽयं प्रश्नः, तथासति पूर्वावरद्वयवर- णानुपपत्तेः। तथा हि पितुः सर्ववेदसदक्षिणक्रतुसमाप्तिवेलायां दीय- मानं दक्षिणावैगुण्येन क्रतुवैगुण्यं मन्यमानेन कुमारेण नचिकेतसा आस्तिकाग्रेसरेण स्वात्मदानेनापि पितुः क्रतुसाद्गुण्यमिच्छता “कस्मै मां दास्यसि” इत्यसकृत्पितरं पृष्टवतास्वनिर्बन्धरुष्टपितृ- वचनान्मृत्युसदनं प्रविष्टेन स्वसदनात्प्रोषुषि यमे तद्दर्शनात्तत्र तिस्रो रात्रीरुपोषुषा स्वोपवासभीततत्प्रतिविधानप्रवृत्तमृत्युप्रदत्ते