भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

पृष्ठ 471, कुल 696 में से

संदर्भ में पढ़ें
पृष्ठ 471

( ४११ ) वरत्रये आस्तिक्यातिरेकात् प्रथमैववरेण स्वात्मानंप्रति पितुः प्रसादोवृतः, एतच्चसर्वं देहातिरिक्तात्मानमजानतो नोपपद्यते । द्वितीयेन च वरेणोत्तीर्णदेहात्मानुभाव्य फलसाधन भूताग्निविद्या वृत्ता; तदपि देहातिरिक्तात्मानमभिज्ञस्य न संभवति । अतस्तृतीयेन वरेण यदिदं व्रियते “येयं प्रेते विचिकित्सा मनुष्ये अस्तीत्येके नायमस्तीति चैके, एतद्विद्यामनुशिष्टः त्वयाहं वराणामेष वर- स्तृतीयः ।” अत्र परमपुरुषार्थरूप ब्रह्मप्राप्ति लक्षणमोक्षयाथात्म्य विज्ञानाय तदुपायभूत परमात्मोपासनपरावरात्मतत्त्वजिज्ञासयाऽयं प्रश्नः क्रियते । एवं च-“येयं प्रेते” इति न शरीरवियोगमात्रभिप्रायं अपितु सर्वबन्धविनिर्मोक्षाभिप्रायम् । यथा “न प्रेत्यसंज्ञाऽस्ति” इति । अयमर्थः मोक्षाधिकृतेमनुष्ये प्रेतेसर्वबन्धविनिर्मुक्त तत्स्वरूप विषया वादिविप्रतिपत्तिनिमित्ताऽस्तिनास्त्यात्मिका येयं विचिकित्सा, तदपनोदनाय तत्स्वरूपयाथात्म्यं त्वयाऽनुशिष्टोऽहं विद्याजानीयाम्- इति । संशय होता है कि-मृत्यु के बाद कुछों के मत में जीव का अस्तित्व रहता है और कुछों के मत में उसका अस्तित्व शरीर के साथ ही समाप्त हो जाता है ?” इस वाक्य को पढ़ने से ज्ञात होता है कि-“सर्वमिदम्” इत्यादि प्रकरण जीवात्मा का ही विवेचन करता है । जीव स्वरूप के यथार्थ निरूपण के लिए ही उक्त प्रश्न का उपक्रम किया गया है । ( समाधान ) बात ऐसी नहीं है-यह जीव के मरणोत्तर अस्तित्व, नास्तित्व विषयक संबंधी शंका नहीं है, यदि ऐसा मानेंगे तो नाचिकेता द्वारा इसके पूर्व के दो वरों की मांग असंगत हो जावेगी । जैसा कि प्रसंग है कि-पिता के सर्वस्व दक्षिणात्मक यज्ञ के अंत में जब सब कुछ दक्षिणा में दिया जा चुका उस समय यज्ञ की पूर्ति में कमी समझकर परम आस्तिक कुमार नचिकेता के “मुझे किसे देते हैं” इस प्रश्न को बारबार करने पर दुराग्रह से रुष्ट पिता के द्वारा मृत्यु को दिये जाने पर वह मृत्यु के घर गया, ankurnagpal108@gmail.com