श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४२४ ) निरुपाधिकानां तेष्वसंभवान्न परमात्मन इतरः छायादिः अक्षिपुरुषो भवितुमर्हति । प्रतिबिम्बस्य तावत्पुरुषान्तर संनिधानायत्तत्वान्न नियमेनावस्थानसंभवः । जीवस्यापि सर्वेन्द्रियव्यापारानुगुण्यत्वाय- सर्वेन्द्रियकेन्द्रभूते स्थानविशेषे वृत्तिरिति चक्षुषि नावस्थानम् । देवतायाश्च ‘ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः' इति रश्मिद्वारेणा- वस्थानवचनात् देशांतरावस्थितस्यापीन्द्रियाधिष्ठानोपपत्तेर्न चक्षु- ष्यवस्थानं सर्वेषामेवैषां निरुपाधिकामृतत्वादयो न संभवन्त्येव । तस्मादक्षिपुरुषः परमात्मा । अमृतत्व आदि धर्म छायापुरुष आदि में संभव नहीं हैं, नेत्रों में इन सबको नियमित स्थिति भी संभव नहीं है । परमात्मा के अतिरिक्त ये सब अक्षिपुरुष नहीं हो सकते । सामने किसी व्यक्ति के हुए बिना छाया तो पड़ नहीं सकती, इसलिए छायापुरुष की नेत्रों में नियमित स्थिति संभव नहीं है । जीव की,