श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ेंउपकोसल के उक्त आशय को समझ कर अग्नियों ने कहा कि— "जो क है वही ख है, जो ख है वही क है" ब्रह्म निस्सीम सुख स्वरूप है यही उनके कथन का तात्पर्यार्थ है। प्राण जिनका शरीर है, ऐसे प्राण से विशिष्ट ब्रह्म, निस्सीम सुखस्वरूप भी है ऐसा "प्राण और उसके आश्रय- भूत आकाश का उपदेश किया" इस वेदांत वाक्य से सिद्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि—"क ब्रह्म ख ब्रह्म" इत्यादि वाक्य में निस्सीम सुख स्वरूप ब्रह्म का ही वर्णन है जो कि परब्रह्म का ही प्रतिपादक है, वही उक्त प्रकरण का नेत्रस्थानीय नेत्राधार परमात्मा है। श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ।१।२।१७॥ श्रुतोपनिषत्कस्य—अधिगतपरमपुरुषयाथात्म्यस्यानुसंधेयतया श्रुत्यंतरप्रतिपाद्यमाना अचिरादिका गतिर्या, तामपुनरावृत्तिलक्षण- परं पुरुषप्राप्तिकरीमुपकोसलायाक्षिपुरुषं श्रुतवते "तेऽर्चिषमेवाभि- संभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षम" इत्यारभ्य" चन्द्रमसोविद्युतम् तत्पुरुषो मानव. स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमानां इमं मानवमावर्त्तं नावत्र्त्तन्ते "इत्यन्तेनोपदिशति । अतोऽप्ययमक्षिपुरुषः परमात्मा । श्रुतोपनिषत्क अर्थात औपनिषद ज्ञातव्य परमपुरुष भगवान तथा तत्संबंधी अन्यान्य श्रुतिवाक्यों से अपुनरावृति लक्षण वाली परंपुरुष को प्राप्त कराने वाली अचिरादिगति, उपकोसल को—" वे अर्चिअभिमानी देवता को ही प्राप्त होते है, अर्चि से दिवसाभिमानी देवता को दिवसा- भिमानी देवता से शुक्लपक्षाभिमानी देवता को" इत्यादि से प्रारंभ करके "चन्द्रमा से विद्युत को, वहाँ से अमानव पुरुष, ब्रह्म को प्राप्त करा देता है, यह देवमार्ग ब्रह्मपथ है, इससे जाने वाले मानव, मानव मंडल में कदापि नहीं लौटते" यहाँ तक बतलाई गई है. वह अक्षिपुरुष के लिए ही है। इससे भी सिद्ध होता है कि अक्षिपुरुष परमात्मा ही है। अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ।१।२।१८॥ प्रतिबिम्बादीनामक्षिणि नियमेनानवस्थानाद मृतत्वादीनां च