श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 482, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४२२ ) वगर्तिनस्यात्, अन्योन्यव्यवच्छेदकत्वेऽपरिच्छिन्नानन्दैकस्वरूपत्वं ब्रह्मणः स्यादित्यन्यतरप्रकारनिर्दिधारयिषया 'कं च तु खं च न विजानामि" इत्युक्तवान् । इसी प्रकार सुख और आकाश भी ब्रह्म के शरीर स्थानीय रूप से उनके नियंत्रण में रहने से विशेषण स्वरूप है अथवा परस्पर एक दूसरे से विशेषित होकर निरतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप का प्रकाश करते हैं इसलिए वे ब्रह्म के विशेषण हैं ? इस विचारणीय प्रश्न पर-इन दोनों (क और ख) को ब्रह्म का भिन्न-भिन्न शरीर मानकर यदि विशेषण माना जावे तो ब्रह्म का नियंत्रण वैषयिक सुख और भूताकाश पर हो सकता है, पर ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नही हो सकता [अर्थात् सुख ही ब्रह्म है, आकाश ही ब्रह्म है ऐसा नहीं कहा जा सकता अपितु वैषयिक सुख और भूताकाश को ब्रह्मसुख और दहराकाश का अंग कहा जा सकता है] एक दूसरे से विशेषित होकर तो अतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप की अवगति हो सकती है [अर्थात् जो क है वही ख है और जो ख है वही क है, इस व्याख्या के अनुसार सुख और आकाश की पारस्परिक विशेषताओ से, आकाश के समान व्यापक स्वच्छ सुख है अथवा सुख का सा सरल गंभीर आकाश है, ये दोनों ही विशेषतायें, ब्रह्म की अखंड आनंदमयता का प्रकाश करती है] उपकोसल के समक्ष उपर्युक्त संशयात्मक दो विचार थे, इसीलिए उसने गुरु से कहा था कि-“क और ख कैसे ब्रह्म हैं यह मैं नहीं समझ सका।" उपकोसलस्येममाशयं जानन्तोऽग्नयः “यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ” इत्यूचिरे । ब्रह्मणः सुखरूपत्वमेवापरिच्छिन्न मित्यर्थः । अतः प्राणशरीरतया प्राणविशिष्टं यद् ब्रह्म तदेव अपरिच्छिन्नं सुखरूपं चेति निगमितम् “प्राणं च हास्मैतदाकाशं चोचुः” इति । अतः 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इत्यत्रापरिच्छिन्नं सुखं ब्रह्म प्रतिपादितमिति परंब्रह्मैव तत्र प्रकृतम्, तदेव चात्राक्ष्याधारतयाऽ- मिधीयत इत्यक्ष्याधारः परमात्मा ।