श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें४१४ आत्मतत्त्व विज्ञान, परमात्मोपासना तथा परमात्मपद प्राप्ति का “तंदुर्दर्शं गूढमनुप्रविष्टम्' से प्रारंभ करके “सोऽध्वनः पारमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” तक उपदेश देते हुए मोक्ष प्राप्ति के विशेष साधनो का उपदेश दिया जिससे कि सब सामंजस्य हो गया । इससे सिद्ध होता है कि-उक्त प्रकरण में उपदिष्ट अत्ता परमात्मा ही है । ३ अधिकरण— अन्तर उपपत्तेः १।१।१३॥ इदमामनंति छंदोगाः “य एषोऽक्षिणि पुरुषो दृश्यते, एष आत्मेति होवाच एतदमृतमभयमेतद्ब्रह्म” इति । तत्र संदेहः किमयं- मक्ष्याधारतया निर्दिश्यमानः पुरुषः प्रतिबिम्बात्मा, उत चक्षुरिन्द्रिया- धिष्ठाता देवताविशेषः, उत जीवात्मा अथ परमात्मा इति । किं युक्तम् ? प्रतिबिम्बात्मेति, कुतः ? प्रसिद्धवन्निर्देशात्, “दृश्यते” इत्यपरोक्षाभिधानाच्च । जीवात्मा वा तस्यापि हि चक्षुषि विशेषेण सन्निधानात् प्रसिद्धिरुपपद्यते उन्मीलितं हि चक्षुरुद्वीक्ष्य जीवात्मनः शरीरेस्थितिगती निश्चिन्वन्ति । “रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः” इति श्रुतिप्रसिद्ध्या चक्षुः प्रतिष्ठो देवताविशेषो वा, एष्वेव प्रसिद्धवन्निर्देशोपपत्तेरेषामन्यतमः । छांदोग्योपनिषद् में कहा गया कि—“यह जो आंखों के बीच में पुरुष दीखता है, यही आत्मा, अमृत और अभयरूप ब्रह्म है” इस पर विचार होता है कि यह पुरुष है कौन, छायापुरुष अथवा नेत्रेन्द्रिय का अधिष्ठाता देवता अथवा जीवात्मा या परमात्मा ? छाया पुरुष भी हो सकता है क्योकि—“दृश्यते” ऐसा प्रत्यक्ष उल्लेख है। जीवात्मा भी हो सकता है क्योंकि—नेत्रों में उसका सानिध्य रहता है, ऐसी प्रसिद्धि है। नेत्रों के उन्मीलन से ही अनुमान होता है कि-जीव की उसमे स्थिति है । “वह सूर्य रश्मियों द्वारा नेत्रों में स्थित है' इस श्रौत वाक्य से, नेत्र प्रतिष्ठित प्रसिद्ध देवताविशेष का होना भी सिद्ध होता है। इन सभी की प्रसिद्धि पाई जाती है, इन सब में कौन है ? ankurnagpal108@gmail.com