भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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पृष्ठ 473

( ४१३ ) परमात्मानुभवेकरसस्य जीवस्यानादिकर्मरूपाविद्यातिरोहितस्वरूप- स्याविद्योच्छेदपूर्वकं स्वाभाविक परमात्मानुभवमेव मोक्षमाचक्षते । तत्र मोक्षस्वरूपंतत्साधनं च त्वत्प्रसादात् विद्यामिति नचिकेतसा पृष्टो मृत्युस्तस्यार्थस्य दुखबोधत्वप्रदर्शनेन विविधभोगवितरण प्रलोभनेन चैनं परीक्ष्य योग्यतामभिज्ञाय परावरात्मतत्त्वविज्ञानं परमात्मोपासनं तत्पदप्राप्तिलक्षणं मोक्षं च “तं दुर्दर्शं गूढमनु प्रविष्टम्” इत्यारभ्य “सोऽध्वनः परमाप्नोति तद्विष्णोः परमं पदम्” इत्यन्तेनोपदिश्य तदपेक्षितांश्च विशेषानुपदिदेशेति सर्वं समञ्जसम् । अतः परमात्मैवात्तेति सिद्धम् । इस विषय मे अनेक मत प्रस्तुत किये जाते है कोई एकमात्र ज्ञान स्वरूप आत्मा के स्वरूपोच्छेद को मोक्ष कहते है । दूसरे आत्मा को ज्ञान- स्वरूप कहते हुए अविद्याध्वंस को मोक्ष कहते हैं । एक कहते है कि पाषाण के सदृश अन्तःकरण के ज्ञान आदि विशेष गुणों का समुच्छेद ही मोक्ष है । कोई परमात्मा को निष्पाप मानकर उनकी उपाधि के संसर्ग से जीव भाव को प्र प्त करानेवाली उपाधियों के नष्ट हो जाने पर ब्रह्म भाव प्राप्ति को मोक्ष कहते है । जिनकी बुद्धि वेदांत शास्त्र के अनुशीलन से परिपक्व है, वे संपूर्ण जगत के एकमात्र कारण निर्दोष, आनंद स्वरूप, स्वाभाविक अगणित असख्य कल्याणमय गुणों के आकर, सर्वथा विलक्षण, सर्वान्तर्यामी परब्रह्म के शरीर स्थानीय, उन्ही के समान ज्ञानस्वरूप, परमात्मानुभूति जन्य आनंदरस निमग्न जीव का जो, अनादि कर्म रूप अविद्या से वास्तविक स्वरूप छिपा हुआ है, अविद्या के उच्छेद हो जाने पर उसी वास्तविक स्वरूप की पुनः प्राप्ति और आत्मानुभवरस की निमग्नता को ही मोक्ष मानते है । इन्ही विभिन्न मतों मे वस्तुतः मोक्ष का स्वरूप क्या है ? उसकी प्राप्ति का माधन क्या है ? इसको मै तुम्हारे अनुग्रह से जानना चाहता हूँ, नचिकेता के पूछे जाने पर यम ने पहिले जिज्ञासित विषय की दुर्गमता फिर भोगों का प्रलोभन देकर उसकी पात्रता की परीक्षा की । उमकी योग्यता की भली भाँति परीक्षा लेकर पर ( ब्रह्म ) और अवर ( जीव ) ankurnagpal108@gmail.com