श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४१७ ) प्राप्नोति । सर्वमायुरेति = ब्रह्मोपासनसमासेर्याविदायुरपेक्षितम्, तत्सर्वमेति । ज्योग्जीवति = व्याध्यादिभिरनुपहतो यावद्ब्रह्मप्राप्ति जीवति । नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते = अस्यशिष्यप्रशिष्यादयः पुत्रपौत्रादयोऽपि ब्रह्मविद एव भवंति । “नास्याब्रह्मवित्कुले भवति” इति च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मविद्याफलत्वेन श्रूयते । उपवयन्तं भुंजामो- ऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च = वयम् अग्नयस्तमेनमुपभुंजामः, यावद् ब्रह्मप्राप्तिविघ्नेभ्यः परिपालयाम इति । अतोऽग्निविद्याया ब्रह्मविद्यां गत्वेन तत् संन्निधान अविरोधात् सुखविशिष्टं प्राकृतमेव ब्रह्मो- पासनस्थानविधानार्थं गुणविधानार्थं चोच्यते । अग्निविद्या के प्रसंग में कुछ भी मोक्ष विरोधी फल की बात नहीं है--“अग्नि का उपासक, पाप कर्मों को नष्ट कर लोकवान पूर्णायु होकर उज्वल जीवन व्यतीत करता है, उसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष क्षीण नहीं होते, उसका हम लोग इस लोक और परलोक में पालन करते है ।’’ इस श्रुति मे कहे गए सारे फल मोक्षाधिकारी पुरुष के अनुकूल ही हैं । “पापों को नष्ट कर” अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति विरोधी पापों को नष्ट कर । “लोक वान होता है” अर्थात् उन विरोधी पापो के नष्ट होने पर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । “पूर्णायु होता है” अर्थात् ब्रह्मोपासना मे अपेक्षित आयु प्राप्त करता है । “उज्वल जीवन व्यतीत करता है “अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति की अवधि तक रोगादिकों से मुक्त होकर सुखी जीवनयापन करता है ।” इसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष नष्ट नहीं होते “अर्थात् उसके शिष्य, प्रशिष्य, पुत्र पौत्र सभी ब्रह्मवेत्ता होते हैं ।” उसके कुल में कोई अब्रह्मविद नहीं होता” इस अन्य श्रुति से भी ब्रह्मविद्या की फलरूप से ज्ञप्ति की गई है । “उसका हम इस लोक और परलोक में पालन करते हैं” अर्थात् हम अग्नियां ऐसे पुरुष का उपभोग करते हैं, जब तक उसे ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक विघ्नों से उसका पालन करते है । इससे स्पष्ट है कि अग्निविद्या, ब्रह्मविद्या की ही अंग है, इन दोनों का एक साथ किया गया उपदेश विरोधी नहीं है अपितु उपयोगी ही है । उपासना के उपयुक्त ankurnagpal108@gmail.com