भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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स्थान के विधान, तथा तदुपयोगी गुणविधान के लिए जो सुखविष्ट (क) ब्रह्म की चर्चा की वह स्वाभाविक ही है (विरोधी नहीं) । ननु-“आचार्यस्तुतेगतिं वक्ता” इति गतिमात्रपरिशेषणादा- चार्येण गतिरेवोपदेश्येति गम्यते, तत्कथं स्थानगुणविध्यर्थतोच्यते तदभिधीयते “आचार्यस्तुते गतिवक्ता” इत्यस्यायमभिप्रायः ब्रह्मवि- द्याम्रनुपदिश्य प्रोषुषिगुरौ तदलाभादनाश्वासमुपकोसलमुज्जीवयितुं स्वपरिचरप्रणीता गार्हपत्यादयो गुरोरग्नयस्तस्मै ब्रह्मस्वरूपमात्रं तदंगभूतां चाग्निविद्यामुपदिश्य “आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत्” इति श्रुत्यर्थमालोच्य साधुतमत्वप्राप्त्यर्थमाचार्यं एवास्य संयद्वामत्वादि गुणकं ब्रह्म तदुपासनस्थानमर्चिरादिकां च गतिमुपदि- शत्वितिमत्वा “आचार्यस्तु ते गतिवक्ता” इत्यवोचन् । (प्रश्न) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे” इस वाक्य से तो ज्ञात होता है कि—एकमात्र गति विषयक उपदेश ही शेष रह गया था आचार्य को केवल उसी का उपदेश करना था, फिर स्थान और गुण विशेष के लिए सुखविशिष्ट का ब्रह्म की चर्चा कैसे स्वाभाविक है ? ( समाधान ) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देगे” का अभिप्राय यह है कि—उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिये बिना ही आचार्य प्रवास मे चले गए थे, ब्रह्मविद्या न पाकर उपकोसल बहुत निराश हुआ, उसके द्वारा की गई परिचर्या से प्रसन्न होकर अग्नियों ने उसे, ब्रह्म के स्वरूप और उसकी प्राप्ति की अंगस्वरूप अग्निविद्या का उपदेश देकर “आचार्य से प्राप्त ब्रह्मविद्या ही अतिशय साधुता को प्राप्त होती है इस श्रुत्यर्थ का विचार कर अतिशय सिद्धि प्राप्ति के लिए आचाय ही इसे संयद्वामत्व आदि गुण युक्त ब्रह्म, ब्रह्मोपासना का स्थान एवं अर्चिरादि- गति का उपदेश करें; ऐसा निश्चय कर उन्होने उपकोसल को आदेश दिया कि—आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे। गतिग्रहणमुपदेश्यविद्याशेषप्रदर्शनाथंम् । अतएव आचार्योऽपि “अहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाशआपो न श्लिष्यन्ते एव-