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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४१७ ) प्राप्नोति । सर्वमायुरेति = ब्रह्मोपासनसमासेर्याविदायुरपेक्षितम्, तत्सर्वमेति । ज्योग्जीवति = व्याध्यादिभिरनुपहतो यावद्ब्रह्मप्राप्ति जीवति । नास्यावरपुरुषाः क्षीयंते = अस्यशिष्यप्रशिष्यादयः पुत्रपौत्रादयोऽपि ब्रह्मविद एव भवंति । “नास्याब्रह्मवित्कुले भवति” इति च श्रुत्यन्तरे ब्रह्मविद्याफलत्वेन श्रूयते । उपवयन्तं भुंजामो- ऽस्मिंश्च लोकेऽमुष्मिंश्च = वयम् अग्नयस्तमेनमुपभुंजामः, यावद् ब्रह्मप्राप्तिविघ्नेभ्यः परिपालयाम इति । अतोऽग्निविद्याया ब्रह्मविद्यां गत्वेन तत् संन्निधान अविरोधात् सुखविशिष्टं प्राकृतमेव ब्रह्मो- पासनस्थानविधानार्थं गुणविधानार्थं चोच्यते । अग्निविद्या के प्रसंग में कुछ भी मोक्ष विरोधी फल की बात नहीं है--“अग्नि का उपासक, पाप कर्मों को नष्ट कर लोकवान पूर्णायु होकर उज्वल जीवन व्यतीत करता है, उसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष क्षीण नहीं होते, उसका हम लोग इस लोक और परलोक में पालन करते है ।’’ इस श्रुति मे कहे गए सारे फल मोक्षाधिकारी पुरुष के अनुकूल ही हैं । “पापों को नष्ट कर” अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति विरोधी पापों को नष्ट कर । “लोक वान होता है” अर्थात् उन विरोधी पापो के नष्ट होने पर ब्रह्मलोक को प्राप्त करता है । “पूर्णायु होता है” अर्थात् ब्रह्मोपासना मे अपेक्षित आयु प्राप्त करता है । “उज्वल जीवन व्यतीत करता है “अर्थात् ब्रह्म प्राप्ति की अवधि तक रोगादिकों से मुक्त होकर सुखी जीवनयापन करता है ।” इसके पश्चाद्वर्त्ती पुरुष नष्ट नहीं होते “अर्थात् उसके शिष्य, प्रशिष्य, पुत्र पौत्र सभी ब्रह्मवेत्ता होते हैं ।” उसके कुल में कोई अब्रह्मविद नहीं होता” इस अन्य श्रुति से भी ब्रह्मविद्या की फलरूप से ज्ञप्ति की गई है । “उसका हम इस लोक और परलोक में पालन करते हैं” अर्थात् हम अग्नियां ऐसे पुरुष का उपभोग करते हैं, जब तक उसे ब्रह्म प्राप्ति नहीं हो जाती तब तक विघ्नों से उसका पालन करते है । इससे स्पष्ट है कि अग्निविद्या, ब्रह्मविद्या की ही अंग है, इन दोनों का एक साथ किया गया उपदेश विरोधी नहीं है अपितु उपयोगी ही है । उपासना के उपयुक्त ankurnagpal108@gmail.com

स्थान के विधान, तथा तदुपयोगी गुणविधान के लिए जो सुखविष्ट (क) ब्रह्म की चर्चा की वह स्वाभाविक ही है (विरोधी नहीं) । ननु-“आचार्यस्तुतेगतिं वक्ता” इति गतिमात्रपरिशेषणादा- चार्येण गतिरेवोपदेश्येति गम्यते, तत्कथं स्थानगुणविध्यर्थतोच्यते तदभिधीयते “आचार्यस्तुते गतिवक्ता” इत्यस्यायमभिप्रायः ब्रह्मवि- द्याम्रनुपदिश्य प्रोषुषिगुरौ तदलाभादनाश्वासमुपकोसलमुज्जीवयितुं स्वपरिचरप्रणीता गार्हपत्यादयो गुरोरग्नयस्तस्मै ब्रह्मस्वरूपमात्रं तदंगभूतां चाग्निविद्यामुपदिश्य “आचार्याद्धैव विद्या विदिता साधिष्ठं प्रापत्” इति श्रुत्यर्थमालोच्य साधुतमत्वप्राप्त्यर्थमाचार्यं एवास्य संयद्वामत्वादि गुणकं ब्रह्म तदुपासनस्थानमर्चिरादिकां च गतिमुपदि- शत्वितिमत्वा “आचार्यस्तु ते गतिवक्ता” इत्यवोचन् । (प्रश्न) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे” इस वाक्य से तो ज्ञात होता है कि—एकमात्र गति विषयक उपदेश ही शेष रह गया था आचार्य को केवल उसी का उपदेश करना था, फिर स्थान और गुण विशेष के लिए सुखविशिष्ट का ब्रह्म की चर्चा कैसे स्वाभाविक है ? ( समाधान ) “आचार्य तुझे गति का उपदेश देगे” का अभिप्राय यह है कि—उपकोसल को ब्रह्मविद्या का उपदेश दिये बिना ही आचार्य प्रवास मे चले गए थे, ब्रह्मविद्या न पाकर उपकोसल बहुत निराश हुआ, उसके द्वारा की गई परिचर्या से प्रसन्न होकर अग्नियों ने उसे, ब्रह्म के स्वरूप और उसकी प्राप्ति की अंगस्वरूप अग्निविद्या का उपदेश देकर “आचार्य से प्राप्त ब्रह्मविद्या ही अतिशय साधुता को प्राप्त होती है इस श्रुत्यर्थ का विचार कर अतिशय सिद्धि प्राप्ति के लिए आचाय ही इसे संयद्वामत्व आदि गुण युक्त ब्रह्म, ब्रह्मोपासना का स्थान एवं अर्चिरादि- गति का उपदेश करें; ऐसा निश्चय कर उन्होने उपकोसल को आदेश दिया कि—आचार्य तुझे गति का उपदेश देंगे। गतिग्रहणमुपदेश्यविद्याशेषप्रदर्शनाथंम् । अतएव आचार्योऽपि “अहं तु ते तद्वक्ष्यामि यथा पुष्करपलाशआपो न श्लिष्यन्ते एव-

( ४२० ) मेवंविदि पापंकर्म न श्लिष्यते” इत्युपक्रम्य संयद्वामत्वादिकल्याण गुणविशिष्टं ब्रह्माक्षिस्थानोपास्यमर्चिरादिकां च गतिमुपदिदेश। अतः “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति सुखविशिष्टस्य प्रकृतस्यैव ब्रह्मणो- ऽत्राभिधानादयमक्ष्याधारः परमात्मा। उपदेष्टव्य विद्या से सबंधित जो कुछ भी वक्तव्य है वह सभी “गति” शब्द के प्रयोग में उल्लेख्य है। इसलिए आचार्य ने भी—“अब मैं तुझे वह बतलाता हूं, जिसे जानकर पापकर्मों का उसी प्रकार संबंध विच्छेद हो जाता है जैसे कि कमल पत्र में जल का आश्लेष नहीं रहता ।” इस भूमिका के साथ संयदवामत्व आदि गुण विशिष्ट ब्रह्म की नेत्रस्थानीय उपासना तथा अर्चिरादिगति का उपदेश दिया। इस प्रकरण की इस प्रकार पर्यालोचना करने पर स्पष्ट हो जाता है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म” सुखविशिष्ट नेत्र स्थानीय उपास्य का जो उल्लेख किया गया है, वह स्वाभाविक ही है। ननु च “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति परंब्रह्माभिहितमिति कथमव- गम्यते, यस्येहाक्ष्याधारतयाऽभिधानंब्रूषे; यावता “कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इति प्रसिद्धाकाश लौकिकसुखयोरेव ब्रह्मदृष्टिर्विधीयत इति प्रति- भाति “नाम ब्रह्म”-मनोब्रह्म” इत्यादि वचनसारूप्यात् । तत्राह- शंका होती है कि--“कं ब्रह्म ख ब्रह्म” यह प्रयोग परंब्रह्म के लिए ही किया गया है, तथा यही नेत्रस्थानीय है, यह कैसे जान गए ? “कं ब्रह्म ख ब्रह्म” शब्द से तो प्रसिद्ध आकाश और लौकिक सुख को ही ब्रह्म दृष्टि से प्रतिपादन किया गया है, यह तो “नाम ब्रह्म” “मन ब्रह्म” की तरह ही वाक्य है। इसका समाधान करते हैं-- अत एव च स ब्रह्म १।२।१६॥ यतस्तत्र “यदेव कं तदेव खं” इति सुखविशिष्टस्याकाशस्याभि- धानम् अतएव ख शब्दाभिधेय. सः आकाशः परंब्रह्म एतदुक्त भवति- अग्निभिः “प्राणो ब्रह्म कं ब्रह्म खं ब्रह्म” इत्युक्ते उपकोसल उवाच- ankurnagpal108@gmail.com

( ४२१ ) "विजानाम्यहं यत्प्राणो ब्रह्म कं च तु खं च न विजानामि" इति । अस्यान्यमभिप्रायः-न तावत्प्राणादिप्रतीकोपासनमग्निभिरभिहितम् जन्मजरामरणादिभवभयभीतस्य मुमुक्षोर्ब्रह्मोपदेशाय प्रवृत्तत्वात् अतो ब्रह्मैवोपास्यमुपदिष्टम् । तत्र प्रसिद्धैः प्राणादिभिः समाना- धिकरणं ब्रह्म निर्दिष्टम् । तेषु च प्राण विशिष्टत्वं जगद्विधरण- योगेन वा प्राणशरीर तया प्राणस्यनियंतृत्वेन वा ब्रह्मण उपपद्यत इति "विजानाम्यहं यत्प्राणोब्रह्म" इत्युक्तवान् । विशेष प्रयोजन से ही वहां "जो क है वही ख है" ऐसा सुख विशिष्ट आकाश का निरूपण किया गया है (अर्थात् आकाश के समान अपार निर्दोष, सुख विशेष ही ब्राह्मसुख है) इसलिए ख शब्द से अभिधेय आकाश भी परंब्रह्म है। तीनों अग्नियों के "प्राण ब्रह्म-कं ब्रह्म-ख ब्रह्म" ' कहने पर उपकोसल ने कहा-"मैं प्राण ब्रह्म को तो जानता हूं पर क और ख कैसे ब्रह्म है यह नहीं समझ पाया। इसका तात्पर्य है कि-अग्नियों ने प्राण आदि की प्रतीकोपासना रूप से व्याख्या की हो, ऐसा नहीं है, अपितु जन्मजरामरण आदि सांसारिक भयों से भीत मुमुक्षु को, ब्रह्मोपदेश देने के लिए ऐसा कहा था। इससे ज्ञात होता है कि-ब्रह्म की उपासना का ही उपदेश दिया गया है तथा उन वाक्यों में, प्रसिद्ध प्राण आदि के सामानाधिकरण्य से ब्रह्म का ही निर्देश किया गया है। ब्रह्म ही जगत को धारण करते हैं अथवा प्राण ब्रह्म का शरीर है अतएव वे ही प्राण के नियामक परि- चालक हैं इत्यादि से ब्रह्म का प्राण विशिष्टत्व धर्म सिद्ध होता है-इसी लिए-"प्राण ब्रह्म को तो मैं जानता हूँ" ऐसा (उपकोसल ने) कहा। तथा सुखाकाशयोरपि ब्रह्मणः शरीरतया तन्नियाम्यत्वेन विशेषणत्वम्,उतान्योन्यव्यवच्छेदकतया निरतिशयानंदरूपब्रह्मस्व- रूपसमर्पणपरत्वेन वा तत्र पृथग्भूतयोः शरीरतया विशेषणत्वे वैषयिकसुखभूताकाशयोर्नियामकत्वं ब्रह्मणः स्यादिति स्वरूपा- ankurnagpal108@gmail.com

( ४२२ ) वगर्तिनस्यात्, अन्योन्यव्यवच्छेदकत्वेऽपरिच्छिन्नानन्दैकस्वरूपत्वं ब्रह्मणः स्यादित्यन्यतरप्रकारनिर्दिधारयिषया 'कं च तु खं च न विजानामि" इत्युक्तवान् । इसी प्रकार सुख और आकाश भी ब्रह्म के शरीर स्थानीय रूप से उनके नियंत्रण में रहने से विशेषण स्वरूप है अथवा परस्पर एक दूसरे से विशेषित होकर निरतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप का प्रकाश करते हैं इसलिए वे ब्रह्म के विशेषण हैं ? इस विचारणीय प्रश्न पर-इन दोनों (क और ख) को ब्रह्म का भिन्न-भिन्न शरीर मानकर यदि विशेषण माना जावे तो ब्रह्म का नियंत्रण वैषयिक सुख और भूताकाश पर हो सकता है, पर ब्रह्म के स्वरूप का यथार्थ ज्ञान नही हो सकता [अर्थात् सुख ही ब्रह्म है, आकाश ही ब्रह्म है ऐसा नहीं कहा जा सकता अपितु वैषयिक सुख और भूताकाश को ब्रह्मसुख और दहराकाश का अंग कहा जा सकता है] एक दूसरे से विशेषित होकर तो अतिशय आनंदमय ब्रह्म के स्वरूप की अवगति हो सकती है [अर्थात् जो क है वही ख है और जो ख है वही क है, इस व्याख्या के अनुसार सुख और आकाश की पारस्परिक विशेषताओ से, आकाश के समान व्यापक स्वच्छ सुख है अथवा सुख का सा सरल गंभीर आकाश है, ये दोनों ही विशेषतायें, ब्रह्म की अखंड आनंदमयता का प्रकाश करती है] उपकोसल के समक्ष उपर्युक्त संशयात्मक दो विचार थे, इसीलिए उसने गुरु से कहा था कि-“क और ख कैसे ब्रह्म हैं यह मैं नहीं समझ सका।" उपकोसलस्येममाशयं जानन्तोऽग्नयः “यद्वाव कं तदेव खं यदेव खं तदेव कम् ” इत्यूचिरे । ब्रह्मणः सुखरूपत्वमेवापरिच्छिन्न मित्यर्थः । अतः प्राणशरीरतया प्राणविशिष्टं यद् ब्रह्म तदेव अपरिच्छिन्नं सुखरूपं चेति निगमितम् “प्राणं च हास्मैतदाकाशं चोचुः” इति । अतः 'कं ब्रह्म खं ब्रह्म" इत्यत्रापरिच्छिन्नं सुखं ब्रह्म प्रतिपादितमिति परंब्रह्मैव तत्र प्रकृतम्, तदेव चात्राक्ष्याधारतयाऽ- मिधीयत इत्यक्ष्याधारः परमात्मा ।

उपकोसल के उक्त आशय को समझ कर अग्नियों ने कहा कि— "जो क है वही ख है, जो ख है वही क है" ब्रह्म निस्सीम सुख स्वरूप है यही उनके कथन का तात्पर्यार्थ है। प्राण जिनका शरीर है, ऐसे प्राण से विशिष्ट ब्रह्म, निस्सीम सुखस्वरूप भी है ऐसा "प्राण और उसके आश्रय- भूत आकाश का उपदेश किया" इस वेदांत वाक्य से सिद्ध होता है। इससे निश्चित होता है कि—"क ब्रह्म ख ब्रह्म" इत्यादि वाक्य में निस्सीम सुख स्वरूप ब्रह्म का ही वर्णन है जो कि परब्रह्म का ही प्रतिपादक है, वही उक्त प्रकरण का नेत्रस्थानीय नेत्राधार परमात्मा है। श्रुतोपनिषत्कगत्यभिधानाच्च ।१।२।१७॥ श्रुतोपनिषत्कस्य—अधिगतपरमपुरुषयाथात्म्यस्यानुसंधेयतया श्रुत्यंतरप्रतिपाद्यमाना अचिरादिका गतिर्या, तामपुनरावृत्तिलक्षण- परं पुरुषप्राप्तिकरीमुपकोसलायाक्षिपुरुषं श्रुतवते "तेऽर्चिषमेवाभि- संभवन्त्यर्चिषोऽहरह आपूर्यमाणपक्षम" इत्यारभ्य" चन्द्रमसोविद्युतम् तत्पुरुषो मानव. स एनान् ब्रह्म गमयत्येष देवपथो ब्रह्मपथ एतेन प्रतिपद्यमानां इमं मानवमावर्त्तं नावत्र्त्तन्ते "इत्यन्तेनोपदिशति । अतोऽप्ययमक्षिपुरुषः परमात्मा । श्रुतोपनिषत्क अर्थात औपनिषद ज्ञातव्य परमपुरुष भगवान तथा तत्संबंधी अन्यान्य श्रुतिवाक्यों से अपुनरावृति लक्षण वाली परंपुरुष को प्राप्त कराने वाली अचिरादिगति, उपकोसल को—" वे अर्चिअभिमानी देवता को ही प्राप्त होते है, अर्चि से दिवसाभिमानी देवता को दिवसा- भिमानी देवता से शुक्लपक्षाभिमानी देवता को" इत्यादि से प्रारंभ करके "चन्द्रमा से विद्युत को, वहाँ से अमानव पुरुष, ब्रह्म को प्राप्त करा देता है, यह देवमार्ग ब्रह्मपथ है, इससे जाने वाले मानव, मानव मंडल में कदापि नहीं लौटते" यहाँ तक बतलाई गई है. वह अक्षिपुरुष के लिए ही है। इससे भी सिद्ध होता है कि अक्षिपुरुष परमात्मा ही है। अनवस्थितेरसम्भवाच्च नेतरः ।१।२।१८॥ प्रतिबिम्बादीनामक्षिणि नियमेनानवस्थानाद मृतत्वादीनां च

( ४२४ ) निरुपाधिकानां तेष्वसंभवान्न परमात्मन इतरः छायादिः अक्षिपुरुषो भवितुमर्हति । प्रतिबिम्बस्य तावत्पुरुषान्तर संनिधानायत्तत्वान्न नियमेनावस्थानसंभवः । जीवस्यापि सर्वेन्द्रियव्यापारानुगुण्यत्वाय- सर्वेन्द्रियकेन्द्रभूते स्थानविशेषे वृत्तिरिति चक्षुषि नावस्थानम् । देवतायाश्च ‘ रश्मिभिरेषोऽस्मिन् प्रतिष्ठितः' इति रश्मिद्वारेणा- वस्थानवचनात् देशांतरावस्थितस्यापीन्द्रियाधिष्ठानोपपत्तेर्न चक्षु- ष्यवस्थानं सर्वेषामेवैषां निरुपाधिकामृतत्वादयो न संभवन्त्येव । तस्मादक्षिपुरुषः परमात्मा । अमृतत्व आदि धर्म छायापुरुष आदि में संभव नहीं हैं, नेत्रों में इन सबको नियमित स्थिति भी संभव नहीं है । परमात्मा के अतिरिक्त ये सब अक्षिपुरुष नहीं हो सकते । सामने किसी व्यक्ति के हुए बिना छाया तो पड़ नहीं सकती, इसलिए छायापुरुष की नेत्रों में नियमित स्थिति संभव नहीं है । जीव की,

( ४२५ ) धर्म हैं, “स्थानादिव्यपदेशाच्च” सूत्र में प्रमाणों द्वारा सिद्ध करके, अक्षि- पुरुष की परमात्मकता सिद्ध की गई अब उसी का समर्थन करते हैं । अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषुतद्धर्मव्यपदेशाच्च ॥ १।२।१८॥ काण्वा-माध्यन्दिनाश्च-वाजसनेयिनः समामनंति-“यः पृथिव्यां तिष्ठन् पृथिव्या अन्तरो यं पृथिवी न वेद यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवीमन्तरो यमयत्येषत आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति । एवम् अम्ब्वग्न्यन्तरिक्षवाय्वादित्यदिक्चंद्रतारकाकाशतमस्तेजस्सुदैवेषु च सर्वेषु भूतेषु प्राणवाक्चक्षुश्श्रोत्रमनस्त्वग्विज्ञानरेतः स्वात्मात्मीयेषु च तिष्ठंतं तत्तदन्तरभूतं तत्तदवेद्यं तत्तच्छरीरकं तत्तद्यमयन्तं कंचिन्निर्दिश्य “एष त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इत्युपदिश्यते । माध्यन्दिन पाठे तु ‘यः सर्वेषु लोकेषु तिष्ठन्’ ‘यः सर्वेषु वेदेषु’— यः सर्वेषु यज्ञेषु “इति च पर्यायाः ।” यो विज्ञाने तिष्ठन् “इत्यस्य पर्यायस्य स्थाने” य आत्मनितिष्ठन् “इति पर्यायः । “सत आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति विशेषः । तत्र संशय्यते-किमयमन्तर्यामी प्रत्यगात्मा उत परमात्मा-इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः । वाक्यशेषे “द्रष्टाश्रोता” इतिकरणायत ज्ञानताश्रुतेः । एवं द्रष्टुरे- वान्तर्यामित्वोपदेशात् । ‘नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा” इति द्रष्ट्रन्तर निषेधाच्चेति । यजुर्वेदीय काण्वशाखा और माध्यन्दिन वाजसनेयी शाखा में ऐसा वर्णन मिलता है कि— “जो पृथिवी में होते हुए भी पृथिवी से भिन्न हैं, पृथिवी उन्हें नहीं जानती पर पृथिवी उनका शरीर है, वह पृथिवी में अन्तर्यामी रूप से उसका संयमन करते है, वे अन्तर्यामी अमृत परमात्मा ही तुम्हारे आत्मा हैं ।” इत्यादि— इसी प्रकार जल-अग्नि-अंतरिक्ष- वायु-आदित्य-दिक्-चंद्र-तारा-आकाश-तम और तेज रूप देवताओं में, समस्त भूतों में, प्राण-वाक्-चक्षु-श्रोत्र-मन-त्वग्-बुद्धि और शुक्र आदि आत्मा और आत्मियों में अवस्थित उनके अन्तर्यामी उनसे अज्ञेय, उनके ankurnagpal108@gmail.com

( ४२६ ) ही शरीर वाले, उनके नियंता आदि रूप से उन्हे बतलाकर “वे ही अमृत स्वरूप अन्तर्यामी तुम्हारे आत्मा हैं।” ऐसा उपदेश दिया गया है। माध्यन्दिन के पाठ में—“जो समस्त लोको में स्थित हैं, जो समस्त वेदों में स्थित हैं, जो समस्त यज्ञों में स्थित हैं” इत्यादि पर्याय विशेष है। “जो विज्ञान में स्थित है” के स्थान पर “जो आत्मा में स्थित है” ऐसा पर्यायवाची वाक्य प्रयोग किया गया है। “वह अमृत स्वरूप अन्तर्यामी तुम्हारे आत्मा हैं” यह विशेष वाक्य दोनों में ही मिलता है। इस पर संशय होता है कि–यह अन्तर्यामी, जीव है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि–जीवात्मा है, क्यों कि–उक्त वाक्य के अंत में अन्तर्यामी का ज्ञान इन्द्रियाधीन है, ऐसा “द्रष्टा श्रोता” इत्यादि विशेषणों से ज्ञात होता है। द्रष्टा को ही अन्तर्यामी कहा गया है तथा उसके अतिरिक्त कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है।” ऐसा निषेध किया गया है इत्यादि से जीवात्मा ही सिद्ध होता है। एवं प्राप्तेऽभिधीयते—अन्तर्याम्यधिदैवाधिलोकादिषु तद्धर्म- व्यपदेशात् अधिदैवाधिलोकादिपदचिह्नितेषु वाक्येषु श्रूयमाणोऽन्त- र्याम्यपहतपाप्मा परमात्मा नारायणः। काण्वपाठसिद्धेभ्योऽधिदै- वादिमद्भ्यो वाक्येभ्योऽधिकान्यधिलोकादिमन्ति वाक्यानि माध्य- न्दिनपाठे सन्तीति ज्ञापनार्थमधिदैवाधिलोकादिष्वित्युभयोरुपादानम्। तदेवमुभयेष्वपि वाक्येष्वन्तर्यामी परमात्मेत्यर्थः। कुतः ? तद्धर्म- व्यपदेशात् परमात्मधर्मोह्ययम्, यदेक एव सन् सर्वलोकसर्वभूत सर्वदेवादीन् नियमयति इति। उस संशय पर कहते हैं कि–अधिदैव और अधिलोक आदि वाक्यों में कहे गए अन्तर्यामी, निष्पाप परमात्मा नारायण ही हैं। काण्वशाखा के पाठ के अनुसार अधिदैवादि युक्त वाक्य की अपेक्षा माध्यन्दिन पाठ में अधिलोकादि युक्त पाठ अधिक है, इसके ज्ञापन के लिए ही सूत्र में अधिदेव के बाद अधिलोक शब्द का उल्लेख किया गया है। इन दोनों ही स्थानों के अन्तर्यामी परमात्मा ही हैं। उनके ही धर्मों का, दोनों ankurnagpal108@gmail.com

स्थानों पर उल्लेख किया गया है। जो स्वयं एक होकर भी, समस्त लोक, समस्त भूत और समस्त देवताओं का नियमन करते हैं। इत्यादि । तथा उद्दालक प्रश्नः “इमं च लोकं परं च लोकं सर्वाणि च भूतानि योऽन्तरो यमयति” इत्युपक्रम्य “तमन्तर्यामिणंब्रूहि” इति तस्य चोत्तरम् “यः पृथिव्यां तिष्ठन्” इत्यारभ्योक्तम्। तदेतत् सर्वांल्लोकान्, सर्वाणि च भूतानि, सर्वान् देवान्, सर्वान् वेदान्, सर्वांश्चयज्ञानन्तः प्रविश्य, सर्वंप्रकारनियमनम्, सर्वशरीरतया सर्वस्यात्मत्वं च सर्वज्ञात् सत्यसंकल्पात् पुरुषोत्तमादन्यस्य न संभवति। इसी प्रकार उद्दालक प्रश्न के प्रकरण में जैसे-“जो अन्तर्यामी होकर इहलोक परलोक और समस्त भूतों का संयमन करते है” ऐसा उपक्रम करके “उन अन्तर्यामी के विषय में बतलावें” ऐसा प्रश्न करने पर “जो पृथिवी में है” इत्यादि उत्तर दिया गया। इससे ज्ञात होता है कि-समस्त लोक, समस्त भूत समुदाय, समस्त देवता, समस्त वेद, समस्त यज्ञ के अन्तर्यामी, हर प्रकार से सबका नियमन करने वाले, सर्व शरीर, सर्वात्मा सर्वज्ञ सत्य संकल्प, एक मात्र पुरुषोत्तम ही हो सकते हैं। तथाहि-“अन्तः प्रविष्टः शास्ताजनानां सर्वात्मा”-“तत्सृष्ट्वा तदेवानुप्राविशत् तदनुप्रविश्य, सच्चत्यच्चाभवत्” इत्यादीन्यौप- निषदानि वाक्यानि परमात्मन एव, सर्वस्य प्रशासितृत्वं सर्वस्या- त्मत्वं इत्यादीनि वदंति । इसी प्रकार-“सर्वात्मभूत परमेश्वर अभ्यंतर में प्रवेश कर समस्त जनों का शासन करते हैं”-“वे सृष्टि करके उसी में प्रविष्ट हो गए, प्रविष्ट होकर वे प्रत्यक्ष और परोक्ष रूप वाले हुए” इत्यादि औपनिषद् वाक्य, परमात्मा की ही सर्वशासकता और सर्वान्तर्यामिता इत्यादि बतलाते हैं। तथा सुबालोपनिषदि-“नैवेह किंचनाग्र आसीदभूतमनाधारं- मिमाः प्रजाः प्रजायंते दिव्योदेव एको नारायणः, चक्षुश्च द्रष्टव्यं

च नारायणः, श्रोत्रं च श्रोतव्यं च नारायणः" इत्यारम्भ "अन्तः शरीरे निहितो गुहायामज एको नित्यः यस्य पृथिवी शरीरं यः पृथिवी- मन्तरे संचरन् यं पृथिवी न वेद यस्यापश्शरीरम्" इत्यादि "यस्य मृत्युः शरीरम् यो मृत्युमन्तरे संचरन् यं मृत्युर्नवेद एष सर्वभूतान्त- रात्माऽपहतपाप्मा दिव्योदेव एको नारायणः" इति परस्यैव ब्रह्मणः सर्वात्मत्वं सर्वशरीरत्वं सर्वस्य नियंतृत्वं च प्रतिपाद्यते । तथा सुबालोपनिषद में भी जैसे—"सृष्टि के पूर्व कुछ नहीं था, ये सारी प्रजा अर्थात् जायमान वस्तुएं, निर्मूल और निराधार रूप से जन्मती हैं, उस समय अलौकिक प्रकाश वाले एकमात्र नारायण ही थे, नारायण ही चक्षु और द्रष्टव्य तथा नारायण ही श्रोत्र और श्रोतव्य थे ।" इत्यादि उपक्रम वाक्य से लेकर "जन्म रहित एक नित्यवस्तु शरीर के अंदर बुद्धि की गुहा मे निहित है, पृथिवी जिनका शरीर है, जो पृथिवी में संचरण करते है पृथिवी जिनको नहीं जानती, जल जिनका शरीर है।" इत्यादि तथा 'मृत्यु जिनका शरीर है, जो मृत्यु मे संचरित हैं, मृत्यु जिन्हें नही जानता, ऐसे समस्त भूतों के अन्तरात्मा, निष्पाप दिव्य देव एकमात्र नारायण ही है।" यहाँ तक परब्रह्म को सर्वात्मक, सर्व शरीरी सर्वनियंता, बतलाया गया है । स्वाभाविकंचामृतत्वं परमात्मन एव धर्मः । न च परस्या- त्मनः करणायत्तद्रष्टृत्वादिकं, अपितु स्वभावत एव सर्वज्ञत्वात् सत्यसंकल्पत्वाच्च स्वत एव । यथा च श्रुतिः—"पश्यत्यचक्षुः स शृणोत्यकर्णः अपाणिपादो जवनो ग्रहीता" इति । न च दर्शन श्रवणादिशब्दाः चक्षुरादिकरणजन्मनो ज्ञानस्य वाचकाः अपितु रूपादिसाक्षात्कारस्य । स च रूपादिसाक्षात्कारः कर्मतिरोहित स्वाभाविकज्ञानस्य जीवस्य चक्षुरादिकरण जन्माः, परस्यतु स्वत एव । 'नान्योऽतोऽस्तिद्रष्टा" इत्येतदपि पूर्ववाक्योदितात् नियतुः दृष्टुः, अन्योद्रष्टा नास्ति इति वदति ।

( ४२६ ) स्वाभाविक अमरता, परमात्मा की ही विशेषता है। परमात्मा में, देखना सुनना इत्यादि क्षमतायें इन्द्रियाधीन नहीं हैं अपितु सर्वज्ञ और सत्यसंकल्प होने से ये सारी क्षमतायें उनमें स्वाभाविक रूप से रहती हैं। जैसा कि-‘बिना नेत्र के ही देखते है, बिना कान के ही सुनते हैं' बिना हाथ और पैर के ही पकड़ते और चलते हैं" इस श्रुति वाक्य से भी सिद्ध है। देखना सुनना इत्यादि शब्द एकमात्र आँख कान इत्यादि इन्द्रिय जन्य ज्ञान के ही बोधक हों, ऐसा नहीं है, अपितु रूपादि विषयक साक्षात्कार के बोधक भी हैं। जीव की स्वाभाविक ज्ञानशक्ति, स्वीय कर्म संस्कारों से आवृत्त रहती है इसीलिए उसे इन्द्रियों की अपेक्षा होती है। किन्तु परमात्मा स्वभाव से ही कर्मादिजन्य दोषों से रहित है, इसलिए उन्हें सदा स्वाभाविक ज्ञान रहता है। “इनसे भिन्न कोई और द्रष्टा नहीं है" इत्यादि श्रुति भी पूर्व वाक्योक्त-नियंता द्रष्टा को कोई दूसरा द्रष्टा नहीं है इसी का समर्थन करती है। “यं पृथिवी न वेद" यमात्मा न वेद “इत्येवमादिभिर्वाक्यैः पृथिव्यात्मादिनियाम्यैरनुपलाभ्यमान एव नियमयतीहि यत्पूर्वमुक्तम् तदेव” अदृष्टो द्रष्टा अश्रुतः श्रोता “इति निगमय्य” नान्योऽतो- ऽस्ति द्रष्टा “इत्यादिना तस्य नियन्तुर्नियन्त्रन्तरं निषिध्यते ।” एष त आत्मा—“सत आत्मा” इति च त इति व्यतिरेकविभक्ति- निर्दिष्टस्य जीवस्यात्मतयोपदिश्यमानोऽन्तर्यामी न प्रत्यगात्मा भवितुमर्हति । “पृथ्वी जिन्हें नहीं जानती" आत्मा जिन्हें नही जानता “इत्यादि वाक्यों से उन्हीं का उल्लेख है जिन्हें पूर्व वाक्यो में पृथ्वी आत्मा आदि का नियामक कहा गया है, उन्हें ही आगे “स्वयं अदृश्य होकर देखते है तथा अश्रुत होकर सुनते है” इत्यादि में अलौकिक बतलाकर “उनके अतिरिक्त कोई अन्य द्रष्टा नही है” इत्यादि से उनकी अनन्य नियंतृता सिद्ध की गई है । ‘यह तुम्हारा आत्मा है—वह तुम्हारा, आत्मा है” इत्यादि में आत्मा से भिन्न विभक्ति का प्रयोग करके जीवात्मा की भिन्नता स्पष्ट कर दी गई है इसलिए जीवात्मा कदापि अन्तर्यामी नहीं हो सकता । ankurnagpal108@gmail.com

( ४३० ) न च स्मार्तमतद्धर्माभिलापाच्छारीरश्च ।१।२।२०॥ स्मार्त्तं प्रधानम्, शारीरः जीवः स्मार्त्तं च शारीरश्च नान्तर्यामी, अतद्धर्माभिलापात्—तयोरसंभावितधर्माभिलापात् । स्वभावत एव सर्वस्य द्रष्टृत्वम्, सर्वस्य नियन्तृत्वं, सर्वस्यात्मत्वं, स्वतएवामृत- त्वम् च तयोर्नसंभावनागंधमर्हति । एतदुक्तं भवति, यथास्मार्तम- चेतनं, सर्वज्ञत्वनियंतृत्वसर्वात्मत्वादिकं नार्हति, तथा जीवोऽपि; अतद्धर्मत्वादिति । सांख्य स्मृति प्रतिपाद्य प्रधान (माया) और शारीर जीवात्मा, अन्तर्यामी नहीं हैं क्यों कि उन दोनों में वे विशेषतायें नहीं हैं जो कि अन्तर्यामी के लिए वेदांत वाक्यों में कही गई हैं। स्वाभाविक ही सर्व- दर्शन शक्ति, सर्व नियंत्रण शक्ति, सर्वात्मकता, और स्वाभाविक अमरता का इन दोनों में नितान्त अभाव है । कथन यह है कि-जैसे कि प्रधान अचेतन प्रकृति में सर्वज्ञत्व, नियंतृत्व सर्वात्मत्व आदि की अर्हता नहीं है वैसे ही चैतन्य जीव में भी नहीं है, ये विशेषतायें उसमें भी नहीं हैं । अमीषां गुणानां परमान्वयः, प्रत्यगात्मनिव्यतिरेकश्च सूत्रद्वयेन दर्शितः । उक्त विशेषताओं का परमात्मा में अन्वय तथा जीवात्मा में अभाव दो सूत्रों में दिखलाया गया है । उभयेऽपिहिभेदेनैनमभिधीयते ।१।२।२१॥ उभये माध्यन्दिनाः काण्वाश्च, अन्तर्यामिणोनियम्यत्वेन वागादिभिरचेतनैः समम् एनं, शारीरमपि विभज्याधीयते—“य आत्मनि तिष्ठन्नात्मनोऽन्तरोयमात्मा न वेद यस्यात्मा शरीरं य आत्मानमन्तरो यमयति स त आत्माऽन्तर्याम्यमृतः” इति माध्य- न्दिनाः; ‘यो विज्ञाने तिष्ठन्” इत्यादि काण्वाः परमात्मनियाम्य- तया तस्माद् विलक्षणत्वेनैनमभिधीयत इत्यर्थः । अतोऽन्तर्यामी ankurnagpal108@gmail.com

"अक्षरात्परतः परः"

  • इति च सर्वस्मात्

Line 22: विकारात् परभूतादक्षरादस्मात्परः क्षेत्रज्ञ समष्टि पुरुषः प्रति- Let's check:

  • विकारात्
  • परभूतादक्षरादस्मात्परः
  • क्षेत्रज्ञ समष्टि पुरुषः प्रति-

Line 23: पाद्यते ।

Line 24: आथर्वणिक शाखा में कहा गया कि—"अब पराविद्या का व्याख्यान Wait, look at line 24: आथर्वणिक or आथर्वाणिक? There is no aa-matra on थ. But on व: आथर्वणिक or आथर्वाणिक? Wait, there is a dot or aa-matra? Let's look: आ थ र्व णि क - no, wait, is there an aa-matra on थ or व? Wait, look at line 24: आ, थ, र्वा, णि, क - wait, look at 'र्वा': it has a vertical bar! So आथर्वाणिक! Wait, in line 4: माध्यन्दिन In line 9: माध्यन्दिन In line 24: आथर्वाणिक

( ४३२ ) अतिसूक्ष्म और अव्यय है, उस भूतयोनि का धीर लोग दर्शन करते हैं।” इसके बाद कहा गया कि-‘वह अक्षर से भी पर है।’ इस पर संशय होता है कि-अदृश्यत्व आदि गुण वाला पर अक्षर से परतत्त्व कौन है, प्रकृति पुरुष अथवा परमात्मा? कह सकते हैं कि प्रकृति पुरुष है, क्यों कि-“वह दीखते नहीं पर द्रष्टा है” इत्यादि में चेतन धर्म सापेक्ष है पर यहाँ तो चेनन धर्म सापेक्ष नहीं है अपितु- “पर अक्षर से भी पर है” इत्यादि में समस्त विकारों से परभूत अक्षर से श्रेष्ठ देहाधिपति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। एतदुक्तं भवति रूपादिमत्स्थूलरूपाचेतनपृथिव्यादिभूतीश्रय दृश्यत्वादिकं प्रतिषिध्यमानं पृथिव्यादि सजातीय सूक्ष्मरूपाचेतन- मेवस्थापयति, तच्च प्रधानमेव। तस्मात्परत्वं च समष्टि पुरुषस्यैव प्रसिद्धम्। तदधिष्ठितं च प्रधानं महदादि विशेषपर्यन्तं विकारजातं प्रसूत इति तत्र दृष्टान्ता उपन्यस्यते “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथापृथिव्यामोषधयः संभवंति, यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम्” इति । अ्रतोऽस्मिन्प्रकरणे प्रधान पुरुषानेव प्रतिपाद्येते इति । कथन यह है कि-रूपादिगुण विशिष्ठ स्थूल अचेतन पृथिव्यादि भूतविषयक दृश्यत्वादि धर्म का प्रतिषेध कर पृथिव्यादि के समान सूक्ष्म रूप जिस अचेतन का प्रतिपादन किया गया है, वह प्रधान (प्रकृति) का ही प्रतिपादन है। उस प्रधान से पर समष्टि पुरुष ही प्रसिद्ध है। प्रधान, उस पुरुष से अधिष्ठित होकर महत्तत्व से लेकर विशेष (स्थूल) तक समस्त विकारो का प्रसव करती है। इस विषय मे दृष्टान्त भी दिया गया है-‘जैसे ऊर्णनाभि (मकड़ी) स्वतः ही जाल की सृष्टि और सहार करती है, वैसे ही पृथ्विी में वृक्षादिको की स्वाभाविक सृष्टि होती है तथा जैसे पुरुष के शरीर में लोभ नख आदि स्वतः होते है, वैसे ही अक्षर से विश्व होता है।’ इस दृष्टान्त से ज्ञात है कि-इस प्रकरण में प्रकृति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। ankurnagpal108@gmail.com

( ४३३ ) एवं प्राप्ते ब्रूमः—अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः, अदृश्यत्वादि गुणकोऽक्षरात्परतः परश्च परमपुरुष एव, कुतः ? तद्धर्मोक्तेः । “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” इत्यादिना सर्वज्ञत्वादिकाः तस्यैव धर्मा उच्यन्ते तथा हि—“ययातदक्षरमधिगम्यते” इत्यादिना अदृश्यत्वादिगुणकम- क्षरमभिधाय ‘अक्षरात् संभवतीहविश्वम्’ इति तस्मात् विश्व- संभवं चाभिधाय “यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः, तस्मादेतद् ब्रह्मनाम रूपमन्नं च जायते” इति भूतयोनेरक्षरस्य सर्वज्ञत्वादिः प्रतिपाद्यते । पश्चात् “अक्षरात्परतः परः” इति च प्रकृति- मदृश्यत्वादिगुणक भूतयोन्यक्षरं सर्वज्ञमेव परत्वेन व्यपदिश्यते । अतः “अक्षरात् परतः परः” इत्यक्षर शब्दः पंचम्यन्तः प्रकृतमदृश्य- त्वादिगुणकमक्षरं नाभिधत्ते, तस्य सर्वज्ञस्य विश्वयोनेः सर्वस्मात् परत्वेन तस्मादन्यस्य परत्वासंभवात् । अतोऽन्नाक्षरशब्दो भूत सूक्ष्ममचेतनं ब्रूते । उक्त संशय पर वक्तव्य यह है कि—अदृश्यत्वादि गुण अक्षर से परतत्त्व, परमात्मा के ही धर्म कहे गये हैं । तथा “जो सर्वज्ञ सर्वविद्” इत्यादि से सर्वज्ञता आदि धर्म भी उन्ही के बतलाए गए हैं । वैसे ही— “जिससे अक्षर अधिगत होता है” इत्यादि से अदृश्यत्व गुणवाले अक्षर का वर्णन करके “अक्षर से सारा विश्व होता है” इत्यादि से उस अक्षर से विश्व की उत्पत्ति बतलाकर “जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, ज्ञानमयता ही जिसका तप है उससे ही ब्रह्म, नाम, अन्न (पृथ्वी) और रूप उत्पन्न होते हैं” इत्यादि में भूतयोनि अक्षर की सर्वज्ञता आदि का प्रतिपादन किया गया है । “वह पर अक्षर से भी, पर है” इस वाक्य में भूतयोनि अदृश्यता आदि गुणवाले सर्वज्ञ अक्षर को ही, पर रूप से प्रतिपादन किया गया है । “अक्षरात् परतः” में अक्षर शब्द पंचम्यन्त कहा गया है जिससे ज्ञात होता है कि-यह वाक्य अदृश्यत्व आदि गुण वाले अक्षर का बोधक नहीं है । पर शब्द उस सर्वज्ञ विश्वयोनि की ओर इंगन कर रहा है जो कि सब से श्रेष्ठ है उससे अधिक कोई और श्रेष्ठ नहीं हो सकता ।

( १३८ ) पंचम्यन्त अक्षर शब्द सूक्ष्म भूत अचेतन का ही वाचक है। (अर्थात् अक्षर, परमात्मा की वह सूक्ष्म भूत अचेतन अवस्था है जिससे, स्थूल अचेतन जगत रूप क्षर की, उत्पत्ति होती है। परमात्मा इस अक्षर से भी परे है) इतश्च न प्रधान पुरुषौ-प्रधान और पुरुष इसलिए भी अदृश्यता आदि गुण वाले नहीं हो सकते कि- विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यांच नेतरौ ।१।२।२३॥ विशिनष्टि हि प्रकरणं-प्रधानाच्च पुरुषाच्च भूतयोन्यक्षरं व्यावर्तयतीत्यर्थः, एकविज्ञानेन सर्वविज्ञान प्रतिज्ञोपपादनादिभिः । तथा ताभ्यामक्षरस्य भेदश्च व्यपदिश्यते "अक्षरात्परतः परः" इत्यादिना । तथाहि-"सब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह" इति सर्वविद्या प्रतिष्ठा भूता ब्रह्मविद्या प्रक्रांताः परविद्यैव च सर्वविद्या प्रतिष्ठा, तामिमां सर्वविद्या प्रतिष्ठां विद्यां चतुर्मुखाथर्वादिगुरू परम्परयाऽगिरसा प्राप्तां जिज्ञासुः "शौनको ह वै महाशालोऽगिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" इति ब्रह्मविद्यायाः सर्वविद्याऽश्रयत्वाद ब्रह्मविज्ञानेन सर्वं विज्ञातं भवतीतिकृत्वा ब्रह्मस्वरूपमनेन पृष्टम्- "तस्मै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये इति हस्म यद्ब्रह्मविदोवदंति पराचैवापरा च" इति । ब्रह्मप्रेप्सुना द्वे विद्ये वेदितव्ये-ब्रह्मविषये परोक्षापरोक्षरूपे द्वे विज्ञाने उपादेये इत्यर्थः, तत्र परोक्षं शास्त्र- जन्यं ज्ञानं, अपरोक्षम् योगजन्यम्, तयोः ब्रह्म प्राप्ति उपायभूतम् परोक्षं ज्ञानम्, तच्च भक्तिरूपापन्नम्, "यमेवैष वृणुतेतेन लभ्यः" इत्यत्रैव विशेष्यमाणत्वात् तदुपायश्चागमजन्यं विवेकादि साधनसप्त- कानुगृहीतं ज्ञानं "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन" इति श्रुतेः । ankurnagpal108@gmail.com

( ४३५ ) "एक विज्ञान से सर्वविज्ञान" इत्यादि नियम के प्रतिपादन के लिए प्रारब्ध यह प्रकरण भी विशेष रूप से प्रधान और पुरुष से, भूतयोनि अक्षर की पृथकता बतलाता है। इसी प्रकार "अक्षरात् परतः परः" वाक्य भी, प्रधान और पुरुष से अक्षर की पृथकता बतलाता है। प्रकरण में जैसे—"उन्होंने बड़े पुत्र अथर्व को समस्त विद्याओं की आश्रय भूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया" इसमें समस्त विद्याओं की आधार रूप ब्रह्मविद्या बतलाई गई है। परमात्म विषयक विद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है। ब्रह्म, अथर्व आदि गुरु परम्परा से प्राप्त इस समस्त विद्याओं की आधारभूत विद्या को अंगिरस से जिज्ञासु—"शौनक ने विधान पूर्वक जाकर जिज्ञासा की कि—हे भगवन् ! कौन ऐसा एक पदार्थ है जिसके ज्ञान से इस समस्त जगत का ज्ञान हो जाता है ?" ब्रह्मविद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है, इसलिए ब्रह्मविज्ञान से ही समस्त का ज्ञान हो सकता है, ऐसा विचार कर ही शौनक ने ब्रह्मस्वरूप की जिज्ञासा की थी, उस पर—"उन्होने, उनसे कहा कि—"दो विद्यायें ज्ञातव्य हैं, जिन्हें कि ब्रह्मवेत्ता परा अपरा नाम से स्मरण करते हैं।" इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म प्राप्ति की इच्छावालों को दो विद्याओं को जानना चाहिए। अर्थात् ब्रह्म विषय में परोक्ष और अपरोक्ष, दो विज्ञान उपादेय हैं। उनमें परोक्ष तो शास्त्र जन्य ज्ञान है तथा अपरोक्ष ज्ञान योगाभ्यास जन्य है। इन दोनों में अपरोक्ष ज्ञान ही ब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय है जो कि—भक्तिरूप से प्र प्त होता है। "यह जिसे वरण कर लेते हैं उसे ही प्राप्त होते हैं" इत्यादि में उक्त तथ्य का ही विवेचन किया गया है। इस भक्ति का उपाय रूप आगम जन्य ज्ञान, विवेक आदि सात साधनों से प्राप्त ज्ञान है। जैसा कि—"ब्राह्मण लोग वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप और विषयासक्ति त्याग द्वारा उस परमात्मा को जानते हैं" इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। आह च भगवान पराशरः—"तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने, आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधाज्ञानं तथोच्यते" इति । "तथा- परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः" इत्यादिना "धर्मशास्त्राणि इत्यन्तेन आग- मोत्थं ब्रह्मसाक्षात्कार हेतुभूतं परोक्षज्ञानमुक्तम् । सांगस्य सेतिहास पुराणस्यसधर्मशास्त्रस्य समीमांसस्य वेदस्य ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति हेतुत्वात्" ankurnagpal108@gmail.com

( ४३६ ) अथपरा ययातदक्षरमधिगम्यते “इत्युपासनाख्यं ब्रह्मसाक्षात्कार- लक्षणं भक्तिरूपापन्नं ज्ञानम्” यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम् इत्यादिना परोक्षा- परोक्षरूप ज्ञानद्वय विषयस्य परस्य ब्रह्मणः स्वरूपमुच्यते । और भगवान पाराशर भी ऐसा ही कहते है—“ज्ञान और कर्म दोनों ही उनके प्राप्ति के हेतु हैं शास्त्रोक्त और विवेक जन्य दो प्रकार के ज्ञान कहे गए हैं । “तथापराकॄग्वेदो यजुर्वेदः” से प्रारभ करके “धर्मशास्त्राणि” तक ब्रह्म साक्षात्कार के हेतुभूत शास्त्रोत्थ परोक्ष ज्ञान का विवेचन किया है। इतिहास, पुराण, मीमासा और व्याकरण, छंद ज्योतिष आदि अंगों सहित वेद ही ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति का मूलकारण है यही बतलाया गया “अब परा विद्या बतलाते हैं जिससे अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है इत्यादि में ब्रह्मानुभूति रूप भक्तिभावापन्न उपासना “नामक ज्ञान का विवेचन किया । “जो अदृश्य और अग्राह्य है” इत्यादि में परोक्ष अपरोक्ष इन दोनों ज्ञानों के विषयभूत परब्रह्म के स्वरूप का निर्देश किया गया है । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इत्यादिना यथोक्तस्वरूपात् परस्याद् ब्रह्मणोऽक्षरात् कृत्स्नस्य चेतना चेतनात्मक प्रपंचस्योत्पत्ति- रुक्ता, विश्वमिति वचनान्नाचेतनमात्रस्य “तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽ- न्नमभिजायते, अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोका. कर्मसुचामृतम्” इति ब्रह्मणो विश्वोत्पत्ति प्रकार उच्यते । तपसा-ज्ञानेन, “यस्य ज्ञान- मयंतपः” इति वक्ष्यमाणत्वात्, चीयते-उपचीयते; “बहुस्यां” इति संकल्परूपेण ज्ञानेन ब्रह्मो सृष्ट्युन्मुखं भवतीत्यर्थः । ततोऽन्नमभि जायते-अद्यत इत्यन्नम्, विश्वस्य भोक्तृवर्गस्य भोग्यभूतं भूत सूक्ष्ममव्याकृतं परस्माद् ब्रह्मणो जायत इत्यर्थः प्राणं मनः प्रभृति * स्वर्गापवर्गरूपफल साधनभूतं कर्मप्रर्य्यन्तं सर्वं विकारजातं तस्मा देव जायते । “ऊर्णनाभि जैसे सृष्टि और संहार करती है” इत्यादि मे, उपर्युक्त स्वरूप वाले परब्रह्म अक्षर ब्रह्म से, समस्त जड़ चेतनात्म प्रपंच व

उत्पत्ति बतलाई गई है, वाक्य में प्रयुक्त "विश्वम्" पद, समस्त अचेतन मात्र की उत्पत्ति का बोधक है । "ब्रह्म तपस्या द्वारा ही सृष्टि करते हैं, उनसे अन्न की सृष्टि होती है, अन्न से प्राण, मन, सत्य, समस्त लोक, कर्मफल और अमृत ( स्वर्ग ) आदि उत्पन्न हुए" ऐसा ब्रह्म का विश्वो- त्पत्ति का प्रकार बतलाया गया है । तपसा का अर्थ है ज्ञान से, "जिसकी ज्ञानमयता ही तप है" इस वाक्य से उक्त अर्थ की पुष्टि होती है । चीयते का तात्पर्य है उपचीयते अर्थात् "बहुस्यां" ऐसे संकल्प रूप ज्ञान से ब्रह्म सृष्टि के उन्मुख होता है । जिसे खाया जाय उसे अन्न कहते हैं; अतः अन्नमभिजायते का तात्पर्य हुआ कि-भोक्ता विश्व का भोग्यभूत अन्न, अतिसूक्ष्म अव्याकृत परब्रह्म से उत्पन्न हुआ प्राण, मन, स्वर्ग और मोक्ष रूप फल के साधनीभूत कर्म आदि सभी विकार उन्हीं से उत्पन्न होते हैं । "यः सर्वज्ञः सर्ववित्" इत्यादिना सृष्ट्युपकरणभूतं सार्वज्ञ- सत्यसंकल्पत्वादिकमुक्तम् । सर्वज्ञात् संकल्पात् परस्माद्ब्रह्मणोऽक्षरा- देतत् कार्याकारं ब्रह्म नामरूपविभक्तं भोक्तृभोग्यरूपं च जायते । "तदेतत्सत्यमिति" इति परस्यब्रह्मणो निरुपाधिकसत्यत्वमुच्यते ।" मंत्रेषुकर्माणिक वयो मान्येपश्यंस्तानित्रे तायां बहुधा संततानि, तान्याचरत नियतं सत्यकामाः "इति सार्वज्ञसत्य संकल्पत्वादि कल्याण गुणाकारमक्षरं पुरुषं स्वतः सत्यं कामयमानाः तत्प्राप्त्यर्थं फलान्तरेभ्यो विरक्त ऋग्यजुसामाथर्व सुकविभिदृष्टानि वर्णाश्रमो- चितानि त्रेताग्निषु बहुधा सन्ततानि कर्माण्याचरतेति ।" एष वः पन्थाः "इत्यारभ्य" एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः" इत्यन्तेन कर्मानुष्ठान प्रकारं, श्रुतिस्मृति चोदितेषु कर्मसु एकतरकर्मवैधुर्येऽ- पीतरेषामनुष्ठितानामपि निष्फलत्वम् श्रद्धयानुष्ठितस्य चाननुष्ठित समत्वम् अभिधाय "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषुकर्म, एतच्छ्रेयो येऽभिनंदंति मूढाजरामृत्यू ते पुनरेवापि यन्ति ।" इत्यादिना फलाभिसंधि पूर्वकत्वेन ज्ञानविधुरतया चावरं कर्माचरतां ankurnagpal108@gmail.com