श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 495, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४३५ ) "एक विज्ञान से सर्वविज्ञान" इत्यादि नियम के प्रतिपादन के लिए प्रारब्ध यह प्रकरण भी विशेष रूप से प्रधान और पुरुष से, भूतयोनि अक्षर की पृथकता बतलाता है। इसी प्रकार "अक्षरात् परतः परः" वाक्य भी, प्रधान और पुरुष से अक्षर की पृथकता बतलाता है। प्रकरण में जैसे—"उन्होंने बड़े पुत्र अथर्व को समस्त विद्याओं की आश्रय भूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया" इसमें समस्त विद्याओं की आधार रूप ब्रह्मविद्या बतलाई गई है। परमात्म विषयक विद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है। ब्रह्म, अथर्व आदि गुरु परम्परा से प्राप्त इस समस्त विद्याओं की आधारभूत विद्या को अंगिरस से जिज्ञासु—"शौनक ने विधान पूर्वक जाकर जिज्ञासा की कि—हे भगवन् ! कौन ऐसा एक पदार्थ है जिसके ज्ञान से इस समस्त जगत का ज्ञान हो जाता है ?" ब्रह्मविद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है, इसलिए ब्रह्मविज्ञान से ही समस्त का ज्ञान हो सकता है, ऐसा विचार कर ही शौनक ने ब्रह्मस्वरूप की जिज्ञासा की थी, उस पर—"उन्होने, उनसे कहा कि—"दो विद्यायें ज्ञातव्य हैं, जिन्हें कि ब्रह्मवेत्ता परा अपरा नाम से स्मरण करते हैं।" इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म प्राप्ति की इच्छावालों को दो विद्याओं को जानना चाहिए। अर्थात् ब्रह्म विषय में परोक्ष और अपरोक्ष, दो विज्ञान उपादेय हैं। उनमें परोक्ष तो शास्त्र जन्य ज्ञान है तथा अपरोक्ष ज्ञान योगाभ्यास जन्य है। इन दोनों में अपरोक्ष ज्ञान ही ब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय है जो कि—भक्तिरूप से प्र प्त होता है। "यह जिसे वरण कर लेते हैं उसे ही प्राप्त होते हैं" इत्यादि में उक्त तथ्य का ही विवेचन किया गया है। इस भक्ति का उपाय रूप आगम जन्य ज्ञान, विवेक आदि सात साधनों से प्राप्त ज्ञान है। जैसा कि—"ब्राह्मण लोग वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप और विषयासक्ति त्याग द्वारा उस परमात्मा को जानते हैं" इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। आह च भगवान पराशरः—"तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने, आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधाज्ञानं तथोच्यते" इति । "तथा- परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः" इत्यादिना "धर्मशास्त्राणि इत्यन्तेन आग- मोत्थं ब्रह्मसाक्षात्कार हेतुभूतं परोक्षज्ञानमुक्तम् । सांगस्य सेतिहास पुराणस्यसधर्मशास्त्रस्य समीमांसस्य वेदस्य ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति हेतुत्वात्" ankurnagpal108@gmail.com