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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४३६ ) अथपरा ययातदक्षरमधिगम्यते “इत्युपासनाख्यं ब्रह्मसाक्षात्कार- लक्षणं भक्तिरूपापन्नं ज्ञानम्” यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम् इत्यादिना परोक्षा- परोक्षरूप ज्ञानद्वय विषयस्य परस्य ब्रह्मणः स्वरूपमुच्यते । और भगवान पाराशर भी ऐसा ही कहते है—“ज्ञान और कर्म दोनों ही उनके प्राप्ति के हेतु हैं शास्त्रोक्त और विवेक जन्य दो प्रकार के ज्ञान कहे गए हैं । “तथापराकॄग्वेदो यजुर्वेदः” से प्रारभ करके “धर्मशास्त्राणि” तक ब्रह्म साक्षात्कार के हेतुभूत शास्त्रोत्थ परोक्ष ज्ञान का विवेचन किया है। इतिहास, पुराण, मीमासा और व्याकरण, छंद ज्योतिष आदि अंगों सहित वेद ही ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति का मूलकारण है यही बतलाया गया “अब परा विद्या बतलाते हैं जिससे अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है इत्यादि में ब्रह्मानुभूति रूप भक्तिभावापन्न उपासना “नामक ज्ञान का विवेचन किया । “जो अदृश्य और अग्राह्य है” इत्यादि में परोक्ष अपरोक्ष इन दोनों ज्ञानों के विषयभूत परब्रह्म के स्वरूप का निर्देश किया गया है । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इत्यादिना यथोक्तस्वरूपात् परस्याद् ब्रह्मणोऽक्षरात् कृत्स्नस्य चेतना चेतनात्मक प्रपंचस्योत्पत्ति- रुक्ता, विश्वमिति वचनान्नाचेतनमात्रस्य “तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽ- न्नमभिजायते, अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोका. कर्मसुचामृतम्” इति ब्रह्मणो विश्वोत्पत्ति प्रकार उच्यते । तपसा-ज्ञानेन, “यस्य ज्ञान- मयंतपः” इति वक्ष्यमाणत्वात्, चीयते-उपचीयते; “बहुस्यां” इति संकल्परूपेण ज्ञानेन ब्रह्मो सृष्ट्युन्मुखं भवतीत्यर्थः । ततोऽन्नमभि जायते-अद्यत इत्यन्नम्, विश्वस्य भोक्तृवर्गस्य भोग्यभूतं भूत सूक्ष्ममव्याकृतं परस्माद् ब्रह्मणो जायत इत्यर्थः प्राणं मनः प्रभृति * स्वर्गापवर्गरूपफल साधनभूतं कर्मप्रर्य्यन्तं सर्वं विकारजातं तस्मा देव जायते । “ऊर्णनाभि जैसे सृष्टि और संहार करती है” इत्यादि मे, उपर्युक्त स्वरूप वाले परब्रह्म अक्षर ब्रह्म से, समस्त जड़ चेतनात्म प्रपंच व

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