श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 492, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४३२ ) अतिसूक्ष्म और अव्यय है, उस भूतयोनि का धीर लोग दर्शन करते हैं।” इसके बाद कहा गया कि-‘वह अक्षर से भी पर है।’ इस पर संशय होता है कि-अदृश्यत्व आदि गुण वाला पर अक्षर से परतत्त्व कौन है, प्रकृति पुरुष अथवा परमात्मा? कह सकते हैं कि प्रकृति पुरुष है, क्यों कि-“वह दीखते नहीं पर द्रष्टा है” इत्यादि में चेतन धर्म सापेक्ष है पर यहाँ तो चेनन धर्म सापेक्ष नहीं है अपितु- “पर अक्षर से भी पर है” इत्यादि में समस्त विकारों से परभूत अक्षर से श्रेष्ठ देहाधिपति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। एतदुक्तं भवति रूपादिमत्स्थूलरूपाचेतनपृथिव्यादिभूतीश्रय दृश्यत्वादिकं प्रतिषिध्यमानं पृथिव्यादि सजातीय सूक्ष्मरूपाचेतन- मेवस्थापयति, तच्च प्रधानमेव। तस्मात्परत्वं च समष्टि पुरुषस्यैव प्रसिद्धम्। तदधिष्ठितं च प्रधानं महदादि विशेषपर्यन्तं विकारजातं प्रसूत इति तत्र दृष्टान्ता उपन्यस्यते “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथापृथिव्यामोषधयः संभवंति, यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम्” इति । अ्रतोऽस्मिन्प्रकरणे प्रधान पुरुषानेव प्रतिपाद्येते इति । कथन यह है कि-रूपादिगुण विशिष्ठ स्थूल अचेतन पृथिव्यादि भूतविषयक दृश्यत्वादि धर्म का प्रतिषेध कर पृथिव्यादि के समान सूक्ष्म रूप जिस अचेतन का प्रतिपादन किया गया है, वह प्रधान (प्रकृति) का ही प्रतिपादन है। उस प्रधान से पर समष्टि पुरुष ही प्रसिद्ध है। प्रधान, उस पुरुष से अधिष्ठित होकर महत्तत्व से लेकर विशेष (स्थूल) तक समस्त विकारो का प्रसव करती है। इस विषय मे दृष्टान्त भी दिया गया है-‘जैसे ऊर्णनाभि (मकड़ी) स्वतः ही जाल की सृष्टि और सहार करती है, वैसे ही पृथ्विी में वृक्षादिको की स्वाभाविक सृष्टि होती है तथा जैसे पुरुष के शरीर में लोभ नख आदि स्वतः होते है, वैसे ही अक्षर से विश्व होता है।’ इस दृष्टान्त से ज्ञात है कि-इस प्रकरण में प्रकृति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। ankurnagpal108@gmail.com