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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४३२ ) अतिसूक्ष्म और अव्यय है, उस भूतयोनि का धीर लोग दर्शन करते हैं।” इसके बाद कहा गया कि-‘वह अक्षर से भी पर है।’ इस पर संशय होता है कि-अदृश्यत्व आदि गुण वाला पर अक्षर से परतत्त्व कौन है, प्रकृति पुरुष अथवा परमात्मा? कह सकते हैं कि प्रकृति पुरुष है, क्यों कि-“वह दीखते नहीं पर द्रष्टा है” इत्यादि में चेतन धर्म सापेक्ष है पर यहाँ तो चेनन धर्म सापेक्ष नहीं है अपितु- “पर अक्षर से भी पर है” इत्यादि में समस्त विकारों से परभूत अक्षर से श्रेष्ठ देहाधिपति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। एतदुक्तं भवति रूपादिमत्स्थूलरूपाचेतनपृथिव्यादिभूतीश्रय दृश्यत्वादिकं प्रतिषिध्यमानं पृथिव्यादि सजातीय सूक्ष्मरूपाचेतन- मेवस्थापयति, तच्च प्रधानमेव। तस्मात्परत्वं च समष्टि पुरुषस्यैव प्रसिद्धम्। तदधिष्ठितं च प्रधानं महदादि विशेषपर्यन्तं विकारजातं प्रसूत इति तत्र दृष्टान्ता उपन्यस्यते “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्यते च यथापृथिव्यामोषधयः संभवंति, यथा सतः पुरुषात् केशलोमानि तथाऽक्षरात् संभवतीह विश्वम्” इति । अ्रतोऽस्मिन्प्रकरणे प्रधान पुरुषानेव प्रतिपाद्येते इति । कथन यह है कि-रूपादिगुण विशिष्ठ स्थूल अचेतन पृथिव्यादि भूतविषयक दृश्यत्वादि धर्म का प्रतिषेध कर पृथिव्यादि के समान सूक्ष्म रूप जिस अचेतन का प्रतिपादन किया गया है, वह प्रधान (प्रकृति) का ही प्रतिपादन है। उस प्रधान से पर समष्टि पुरुष ही प्रसिद्ध है। प्रधान, उस पुरुष से अधिष्ठित होकर महत्तत्व से लेकर विशेष (स्थूल) तक समस्त विकारो का प्रसव करती है। इस विषय मे दृष्टान्त भी दिया गया है-‘जैसे ऊर्णनाभि (मकड़ी) स्वतः ही जाल की सृष्टि और सहार करती है, वैसे ही पृथ्विी में वृक्षादिको की स्वाभाविक सृष्टि होती है तथा जैसे पुरुष के शरीर में लोभ नख आदि स्वतः होते है, वैसे ही अक्षर से विश्व होता है।’ इस दृष्टान्त से ज्ञात है कि-इस प्रकरण में प्रकृति पुरुष का ही प्रतिपादन किया गया है। ankurnagpal108@gmail.com

( ४३३ ) एवं प्राप्ते ब्रूमः—अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः, अदृश्यत्वादि गुणकोऽक्षरात्परतः परश्च परमपुरुष एव, कुतः ? तद्धर्मोक्तेः । “यः सर्वज्ञः सर्ववित्” इत्यादिना सर्वज्ञत्वादिकाः तस्यैव धर्मा उच्यन्ते तथा हि—“ययातदक्षरमधिगम्यते” इत्यादिना अदृश्यत्वादिगुणकम- क्षरमभिधाय ‘अक्षरात् संभवतीहविश्वम्’ इति तस्मात् विश्व- संभवं चाभिधाय “यः सर्वज्ञः सर्वविद्यस्य ज्ञानमयं तपः, तस्मादेतद् ब्रह्मनाम रूपमन्नं च जायते” इति भूतयोनेरक्षरस्य सर्वज्ञत्वादिः प्रतिपाद्यते । पश्चात् “अक्षरात्परतः परः” इति च प्रकृति- मदृश्यत्वादिगुणक भूतयोन्यक्षरं सर्वज्ञमेव परत्वेन व्यपदिश्यते । अतः “अक्षरात् परतः परः” इत्यक्षर शब्दः पंचम्यन्तः प्रकृतमदृश्य- त्वादिगुणकमक्षरं नाभिधत्ते, तस्य सर्वज्ञस्य विश्वयोनेः सर्वस्मात् परत्वेन तस्मादन्यस्य परत्वासंभवात् । अतोऽन्नाक्षरशब्दो भूत सूक्ष्ममचेतनं ब्रूते । उक्त संशय पर वक्तव्य यह है कि—अदृश्यत्वादि गुण अक्षर से परतत्त्व, परमात्मा के ही धर्म कहे गये हैं । तथा “जो सर्वज्ञ सर्वविद्” इत्यादि से सर्वज्ञता आदि धर्म भी उन्ही के बतलाए गए हैं । वैसे ही— “जिससे अक्षर अधिगत होता है” इत्यादि से अदृश्यत्व गुणवाले अक्षर का वर्णन करके “अक्षर से सारा विश्व होता है” इत्यादि से उस अक्षर से विश्व की उत्पत्ति बतलाकर “जो सर्वज्ञ और सर्वविद् है, ज्ञानमयता ही जिसका तप है उससे ही ब्रह्म, नाम, अन्न (पृथ्वी) और रूप उत्पन्न होते हैं” इत्यादि में भूतयोनि अक्षर की सर्वज्ञता आदि का प्रतिपादन किया गया है । “वह पर अक्षर से भी, पर है” इस वाक्य में भूतयोनि अदृश्यता आदि गुणवाले सर्वज्ञ अक्षर को ही, पर रूप से प्रतिपादन किया गया है । “अक्षरात् परतः” में अक्षर शब्द पंचम्यन्त कहा गया है जिससे ज्ञात होता है कि-यह वाक्य अदृश्यत्व आदि गुण वाले अक्षर का बोधक नहीं है । पर शब्द उस सर्वज्ञ विश्वयोनि की ओर इंगन कर रहा है जो कि सब से श्रेष्ठ है उससे अधिक कोई और श्रेष्ठ नहीं हो सकता ।

( १३८ ) पंचम्यन्त अक्षर शब्द सूक्ष्म भूत अचेतन का ही वाचक है। (अर्थात् अक्षर, परमात्मा की वह सूक्ष्म भूत अचेतन अवस्था है जिससे, स्थूल अचेतन जगत रूप क्षर की, उत्पत्ति होती है। परमात्मा इस अक्षर से भी परे है) इतश्च न प्रधान पुरुषौ-प्रधान और पुरुष इसलिए भी अदृश्यता आदि गुण वाले नहीं हो सकते कि- विशेषणभेदव्यपदेशाभ्यांच नेतरौ ।१।२।२३॥ विशिनष्टि हि प्रकरणं-प्रधानाच्च पुरुषाच्च भूतयोन्यक्षरं व्यावर्तयतीत्यर्थः, एकविज्ञानेन सर्वविज्ञान प्रतिज्ञोपपादनादिभिः । तथा ताभ्यामक्षरस्य भेदश्च व्यपदिश्यते "अक्षरात्परतः परः" इत्यादिना । तथाहि-"सब्रह्मविद्यां सर्वविद्याप्रतिष्ठामथर्वाय ज्येष्ठपुत्राय प्राह" इति सर्वविद्या प्रतिष्ठा भूता ब्रह्मविद्या प्रक्रांताः परविद्यैव च सर्वविद्या प्रतिष्ठा, तामिमां सर्वविद्या प्रतिष्ठां विद्यां चतुर्मुखाथर्वादिगुरू परम्परयाऽगिरसा प्राप्तां जिज्ञासुः "शौनको ह वै महाशालोऽगिरसं विधिवदुपसन्नः पप्रच्छ कस्मिन्नु भगवो विज्ञाते सर्वमिदं विज्ञातं भवति" इति ब्रह्मविद्यायाः सर्वविद्याऽश्रयत्वाद ब्रह्मविज्ञानेन सर्वं विज्ञातं भवतीतिकृत्वा ब्रह्मस्वरूपमनेन पृष्टम्- "तस्मै स होवाच द्वे विद्ये वेदितव्ये इति हस्म यद्ब्रह्मविदोवदंति पराचैवापरा च" इति । ब्रह्मप्रेप्सुना द्वे विद्ये वेदितव्ये-ब्रह्मविषये परोक्षापरोक्षरूपे द्वे विज्ञाने उपादेये इत्यर्थः, तत्र परोक्षं शास्त्र- जन्यं ज्ञानं, अपरोक्षम् योगजन्यम्, तयोः ब्रह्म प्राप्ति उपायभूतम् परोक्षं ज्ञानम्, तच्च भक्तिरूपापन्नम्, "यमेवैष वृणुतेतेन लभ्यः" इत्यत्रैव विशेष्यमाणत्वात् तदुपायश्चागमजन्यं विवेकादि साधनसप्त- कानुगृहीतं ज्ञानं "तमेतं वेदानुवचनेन ब्राह्मणा विविदिषन्ति यज्ञेन दानेन तपसाऽनाशकेन" इति श्रुतेः । ankurnagpal108@gmail.com

( ४३५ ) "एक विज्ञान से सर्वविज्ञान" इत्यादि नियम के प्रतिपादन के लिए प्रारब्ध यह प्रकरण भी विशेष रूप से प्रधान और पुरुष से, भूतयोनि अक्षर की पृथकता बतलाता है। इसी प्रकार "अक्षरात् परतः परः" वाक्य भी, प्रधान और पुरुष से अक्षर की पृथकता बतलाता है। प्रकरण में जैसे—"उन्होंने बड़े पुत्र अथर्व को समस्त विद्याओं की आश्रय भूत ब्रह्मविद्या का उपदेश दिया" इसमें समस्त विद्याओं की आधार रूप ब्रह्मविद्या बतलाई गई है। परमात्म विषयक विद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है। ब्रह्म, अथर्व आदि गुरु परम्परा से प्राप्त इस समस्त विद्याओं की आधारभूत विद्या को अंगिरस से जिज्ञासु—"शौनक ने विधान पूर्वक जाकर जिज्ञासा की कि—हे भगवन् ! कौन ऐसा एक पदार्थ है जिसके ज्ञान से इस समस्त जगत का ज्ञान हो जाता है ?" ब्रह्मविद्या ही समस्त विद्याओं की आधार शिला है, इसलिए ब्रह्मविज्ञान से ही समस्त का ज्ञान हो सकता है, ऐसा विचार कर ही शौनक ने ब्रह्मस्वरूप की जिज्ञासा की थी, उस पर—"उन्होने, उनसे कहा कि—"दो विद्यायें ज्ञातव्य हैं, जिन्हें कि ब्रह्मवेत्ता परा अपरा नाम से स्मरण करते हैं।" इससे ज्ञात होता है कि ब्रह्म प्राप्ति की इच्छावालों को दो विद्याओं को जानना चाहिए। अर्थात् ब्रह्म विषय में परोक्ष और अपरोक्ष, दो विज्ञान उपादेय हैं। उनमें परोक्ष तो शास्त्र जन्य ज्ञान है तथा अपरोक्ष ज्ञान योगाभ्यास जन्य है। इन दोनों में अपरोक्ष ज्ञान ही ब्रह्म प्राप्ति का श्रेष्ठ उपाय है जो कि—भक्तिरूप से प्र प्त होता है। "यह जिसे वरण कर लेते हैं उसे ही प्राप्त होते हैं" इत्यादि में उक्त तथ्य का ही विवेचन किया गया है। इस भक्ति का उपाय रूप आगम जन्य ज्ञान, विवेक आदि सात साधनों से प्राप्त ज्ञान है। जैसा कि—"ब्राह्मण लोग वेदपाठ, यज्ञ, दान, तप और विषयासक्ति त्याग द्वारा उस परमात्मा को जानते हैं" इत्यादि श्रुति से ज्ञात होता है। आह च भगवान पराशरः—"तत्प्राप्तिहेतुर्ज्ञानं च कर्म चोक्तं महामुने, आगमोत्थं विवेकाच्च द्विधाज्ञानं तथोच्यते" इति । "तथा- परा ऋग्वेदो यजुर्वेदः" इत्यादिना "धर्मशास्त्राणि इत्यन्तेन आग- मोत्थं ब्रह्मसाक्षात्कार हेतुभूतं परोक्षज्ञानमुक्तम् । सांगस्य सेतिहास पुराणस्यसधर्मशास्त्रस्य समीमांसस्य वेदस्य ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति हेतुत्वात्" ankurnagpal108@gmail.com

( ४३६ ) अथपरा ययातदक्षरमधिगम्यते “इत्युपासनाख्यं ब्रह्मसाक्षात्कार- लक्षणं भक्तिरूपापन्नं ज्ञानम्” यत्तदद्रेश्यमग्राह्यम् इत्यादिना परोक्षा- परोक्षरूप ज्ञानद्वय विषयस्य परस्य ब्रह्मणः स्वरूपमुच्यते । और भगवान पाराशर भी ऐसा ही कहते है—“ज्ञान और कर्म दोनों ही उनके प्राप्ति के हेतु हैं शास्त्रोक्त और विवेक जन्य दो प्रकार के ज्ञान कहे गए हैं । “तथापराकॄग्वेदो यजुर्वेदः” से प्रारभ करके “धर्मशास्त्राणि” तक ब्रह्म साक्षात्कार के हेतुभूत शास्त्रोत्थ परोक्ष ज्ञान का विवेचन किया है। इतिहास, पुराण, मीमासा और व्याकरण, छंद ज्योतिष आदि अंगों सहित वेद ही ब्रह्मज्ञानोत्पत्ति का मूलकारण है यही बतलाया गया “अब परा विद्या बतलाते हैं जिससे अक्षर ब्रह्म का ज्ञान होता है इत्यादि में ब्रह्मानुभूति रूप भक्तिभावापन्न उपासना “नामक ज्ञान का विवेचन किया । “जो अदृश्य और अग्राह्य है” इत्यादि में परोक्ष अपरोक्ष इन दोनों ज्ञानों के विषयभूत परब्रह्म के स्वरूप का निर्देश किया गया है । “यथोर्णनाभिः सृजते गृह्णते च” इत्यादिना यथोक्तस्वरूपात् परस्याद् ब्रह्मणोऽक्षरात् कृत्स्नस्य चेतना चेतनात्मक प्रपंचस्योत्पत्ति- रुक्ता, विश्वमिति वचनान्नाचेतनमात्रस्य “तपसा चीयते ब्रह्म ततोऽ- न्नमभिजायते, अन्नात्प्राणो मनः सत्यं लोका. कर्मसुचामृतम्” इति ब्रह्मणो विश्वोत्पत्ति प्रकार उच्यते । तपसा-ज्ञानेन, “यस्य ज्ञान- मयंतपः” इति वक्ष्यमाणत्वात्, चीयते-उपचीयते; “बहुस्यां” इति संकल्परूपेण ज्ञानेन ब्रह्मो सृष्ट्युन्मुखं भवतीत्यर्थः । ततोऽन्नमभि जायते-अद्यत इत्यन्नम्, विश्वस्य भोक्तृवर्गस्य भोग्यभूतं भूत सूक्ष्ममव्याकृतं परस्माद् ब्रह्मणो जायत इत्यर्थः प्राणं मनः प्रभृति * स्वर्गापवर्गरूपफल साधनभूतं कर्मप्रर्य्यन्तं सर्वं विकारजातं तस्मा देव जायते । “ऊर्णनाभि जैसे सृष्टि और संहार करती है” इत्यादि मे, उपर्युक्त स्वरूप वाले परब्रह्म अक्षर ब्रह्म से, समस्त जड़ चेतनात्म प्रपंच व

उत्पत्ति बतलाई गई है, वाक्य में प्रयुक्त "विश्वम्" पद, समस्त अचेतन मात्र की उत्पत्ति का बोधक है । "ब्रह्म तपस्या द्वारा ही सृष्टि करते हैं, उनसे अन्न की सृष्टि होती है, अन्न से प्राण, मन, सत्य, समस्त लोक, कर्मफल और अमृत ( स्वर्ग ) आदि उत्पन्न हुए" ऐसा ब्रह्म का विश्वो- त्पत्ति का प्रकार बतलाया गया है । तपसा का अर्थ है ज्ञान से, "जिसकी ज्ञानमयता ही तप है" इस वाक्य से उक्त अर्थ की पुष्टि होती है । चीयते का तात्पर्य है उपचीयते अर्थात् "बहुस्यां" ऐसे संकल्प रूप ज्ञान से ब्रह्म सृष्टि के उन्मुख होता है । जिसे खाया जाय उसे अन्न कहते हैं; अतः अन्नमभिजायते का तात्पर्य हुआ कि-भोक्ता विश्व का भोग्यभूत अन्न, अतिसूक्ष्म अव्याकृत परब्रह्म से उत्पन्न हुआ प्राण, मन, स्वर्ग और मोक्ष रूप फल के साधनीभूत कर्म आदि सभी विकार उन्हीं से उत्पन्न होते हैं । "यः सर्वज्ञः सर्ववित्" इत्यादिना सृष्ट्युपकरणभूतं सार्वज्ञ- सत्यसंकल्पत्वादिकमुक्तम् । सर्वज्ञात् संकल्पात् परस्माद्ब्रह्मणोऽक्षरा- देतत् कार्याकारं ब्रह्म नामरूपविभक्तं भोक्तृभोग्यरूपं च जायते । "तदेतत्सत्यमिति" इति परस्यब्रह्मणो निरुपाधिकसत्यत्वमुच्यते ।" मंत्रेषुकर्माणिक वयो मान्येपश्यंस्तानित्रे तायां बहुधा संततानि, तान्याचरत नियतं सत्यकामाः "इति सार्वज्ञसत्य संकल्पत्वादि कल्याण गुणाकारमक्षरं पुरुषं स्वतः सत्यं कामयमानाः तत्प्राप्त्यर्थं फलान्तरेभ्यो विरक्त ऋग्यजुसामाथर्व सुकविभिदृष्टानि वर्णाश्रमो- चितानि त्रेताग्निषु बहुधा सन्ततानि कर्माण्याचरतेति ।" एष वः पन्थाः "इत्यारभ्य" एष वः पुण्यः सुकृतो ब्रह्मलोकः" इत्यन्तेन कर्मानुष्ठान प्रकारं, श्रुतिस्मृति चोदितेषु कर्मसु एकतरकर्मवैधुर्येऽ- पीतरेषामनुष्ठितानामपि निष्फलत्वम् श्रद्धयानुष्ठितस्य चाननुष्ठित समत्वम् अभिधाय "प्लवा ह्येते अदृढा यज्ञरूपा अष्टादशोक्तमवरं येषुकर्म, एतच्छ्रेयो येऽभिनंदंति मूढाजरामृत्यू ते पुनरेवापि यन्ति ।" इत्यादिना फलाभिसंधि पूर्वकत्वेन ज्ञानविधुरतया चावरं कर्माचरतां ankurnagpal108@gmail.com

( ४३८ ) पुनरावृत्तिमुक्त्वा “तपश्श्रद्धे ये ह्युपवसंति” इत्यादिन पुनरपि- फलाभिसंधि रहितं ज्ञानिनानुष्ठितं कर्म ब्रह्म प्राप्तये भवतीति प्रशस्य “परीक्ष्य लोकान्” इत्यादिना केवल कर्मफलेषु विरक्तस्य यथोदित कर्मानुगृहीतं ब्रह्मप्राप्त्युपायभूतम् ज्ञानं जिज्ञासमानस्य च आचार्योपसदनं विधाय 'तदेतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् “इत्यादिना” सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सौम्य” इत्यंतेन पूर्वोक्तस्याक्षरस्य भूत- योनेः परस्य ब्रह्मणः परमपुरुषस्यानुक्तैः स्वरूपगुणैः सह सर्वभूतान्त- रात्मतया विश्वशरीरत्वेन विश्वरूपत्वम्, तस्माद् विश्व सृष्टिं च विस्पष्टमभिधाय “आविस्सन्निहितम्” इत्यादिना तस्यैवाक्षर स्याव्यक्तात्परतोऽपि पुरुषात् परभूतस्यपरस्य ब्रह्मणः परमव्योम्नि प्रतिष्ठितस्यानवधिकाति शयानंद स्वरूपस्य हृदयगुहायामुपासीन प्रकारं उपासनस्य च परभक्तिरूपत्वमुपासीनस्याविद्याविमोकपूर्वकं ब्रह्मसमं ब्रह्मानुभवफलं चोपदिश्योपसंहृतम् । श्रतएव विशेषणाद् भेदव्यपदेशाच्च नास्मिन् प्रकरणे प्रधानपुरुषौ प्रतिपाद्येते । “जो सर्वज्ञ सर्वविद्” इत्यादि वाक्य में उनके सृष्टि कार्योपयोगी, सर्वज्ञ, सत्य संकल्प आदि गुण कहे गए हैं । कार्यभावापन्न ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) नाम और रूप से भिन्न भोक्ता ( जीव ) तथा भोग्य ( जड जगत ) आदि सब, सर्वज्ञ सत्य संकल्प, अक्षर ब्रह्म से ही उत्पन्न होते हैं । “तदेतत् सत्यम्” इत्यादि में, परब्रह्म की, निरुपाधिक सत्यता बतलाई गई है ।” कवियों अर्थात् मनी षियो ने, मंत्रों से जिन समस्त कर्मों का ज्ञान प्राप्त किया, उनका त्रेता में विस्तार हुआ, हे सत्याभिलाषियों ! आप निरन्तर उनका आचरण करिए” इत्यादि वाक्य मे; सर्वज्ञ, सत्यसंकल्प, कल्याण गुणाकर स्वतः सत्य, अक्षर पुरुष की प्राप्ति के इच्छुक, तथा उनकी प्राप्ति के उद्देश्य से अन्यान्य फलासक्ति से विरक्त तुम लोग, ऋक् यजु साम अथर्व वेदों में ऋषियों द्वारा देखे गए त्रेता अग्नियो में निहित वर्णाश्रमोचित कर्मों का आचरण करो; ankurnagpal108@gmail.com

( ४३६ ) ऐसा आदेश दिया गया । “यही तुम्हारा मार्ग है” इत्यादि से प्रारंभ करके “यही तुम लोगों का पुण्यलब्ध ब्रह्मलोक है” इस अन्तिम वाक्य तक, कर्मानुष्ठान का प्रकार तथा श्रुति स्मृति उपदिष्ट कर्मों में किसी एक की भी हानि से संपूर्ण अनुष्ठान की हानि, तथा विधिलंघन पूर्वक किए गए अनुष्ठान की निरनुष्ठानता बतलाकर “अठारह सकाम ऋत्विर्गों द्वारा अनुष्ठित यज्ञ रूपी अदृढ़ जहाज की यदि कोई मूढ प्रशंसा करता है तो वह बार-बार जरा मृत्यु को प्राप्त करता है” इत्यादि वाक्य में, फलासक्ति पूर्वक अनुष्ठित तत्त्वज्ञान विहीन कर्म को अवर कहा गया तथा उस कर्मानुष्ठान से पुनः जन्म मरण का चक्र बतलाकर—“जो तपस्या और श्रद्धा से उपासना करता है” इत्यादि में, ज्ञानियों द्वारा फलानुसंधान रहित अनुष्ठित कर्म को ही ब्रह्म प्राप्ति का सहायक बतलाते हुए निष्काम कर्म की प्रशंसा की गई है। इसके बाद--“कर्म- लब्ध फल की परीक्षा करके अर्थात् फल की नित्यता अनित्यता का विचार करके” इत्यादि में, एक मात्र निष्काम कर्म करने वाले, ब्रह्म- प्राप्ति के उपायभूत ज्ञान के जिज्ञासुओं को आचार्य के निकट जाने का नियम बतलाकर “यही वह सत्य है” इत्यादि से प्रारंभ करके “हे सौम्य ! वह पुरुष ही अविद्या ग्रन्थि को छिन्न करते हैं” इत्यादि तक, पूर्वोक्त अक्षर भूतयोनि परब्रह्म की अब तक कहे गए गुणों के साथ सर्वान्तर्या- मिता, विश्व शरीर होने से विश्वरूपता तथा उन्हीं से विश्वसृष्टि का सुस्पष्ट प्रतिपादन करके ‘आविः सन्निहिता’ इत्यादि में—अव्याकृत प्रकृति से श्रेष्ठ पुरुष से भी, श्रेष्ठतर—परमव्योम में स्थित, निरवधि- निरतिशय आनंद स्वरूप अक्षर पदवाच्य परमपुरुष पर ब्रह्म की हृदय पुण्डरीक में उपासना प्रणाली, उपासना की पराभक्तिरूपता तथा उपासक की अविद्यानिवृत्ति पूर्वक ब्रह्म तुल्यता और ब्रह्मानुभवफल का उपदेश करके संहार किया गया है। इस प्रकार पूरे प्रकरण मे विशेष निर्देश और भेद निर्देश को देखने से, ज्ञात होता है कि इसमें प्रधान और पुरुष का प्रतिपादन नहीं है । भेदव्यपदेशोऽपिहि ताभ्यां परस्य ब्रह्मणोऽत्र विद्यते । दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्ष- रात परतः परः “इत्यादिभिः अक्षराद् अव्याकृतात् परतो यः ankurnagpal108@gmail.com

( ४४० ) समष्टि पुरुषः तस्मादपिपरभूतोऽदृश्यत्वादिगुणकोऽक्षर शब्दाभिहितः परमात्मेत्यर्थः अश्नुत इति वा, नक्षरतीति वाऽक्षरम् । तदव्याकृतेऽपि स्वविकारव्याप्त्या वा महदादिवन्नामान्तराभिलापयोग्यक्षरणाभा- वादवाऽक्षरत्वंकथंचिद् उपपद्यते । इस प्रकरण में प्रकृति और पुरुष का, परब्रह्म से स्पष्ट भेद दिख- लाया गया है। “वह, दिव्य, निराकार पुरुष, बाहर और भीतर स्थित, जन्म-प्राण और मनरहित, शुभ्र, श्रेष्ठ अक्षर से भी श्रेष्ठ हैं।” इत्यादि में अव्याकृत पदवाच्य अक्षर से श्रेष्ठ जो समष्टि पुरुष है, उससे भी श्रेष्ठ अदृश्यत्वादि गुणवाले अक्षर परमात्मा का उल्लेख है। अक्षर का तात्पर्य है कि जो व्यापक रूप से सर्वत्र विद्यमान रहे अथवा जो स्वरूप से कभी विच्युत न हो। अव्याकृत प्रकृति न कभी व्यापक होकर स्थित रहती है और न महत्तत्त्व आदि की तरह नामान्तर ग्रहण रूप क्षरण ही प्राप्त करती है; इसलिए उसकी अक्षरता कभी उपपादित नहीं हो सकती । रूपोपन्यासाच्च ।१।२।२४॥ “अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूता- न्तरात्मा।” इतीदृश रूपं सर्वभूतान्तरात्मनः परमात्मन् एव संभवति श्रतश्च परमात्मा । “अग्नि जिसका शिर, चन्द्र और सूर्य जिसकी आंखें, दिशायें जिसके कान, विवृत वेद जिसकी वाणी, वायु जिसके प्राण, विश्व जिसका हृदय, और पृथिवी जिसके चरण हैं, वही समस्त भूत समुदाय का अन्त- र्यामी है।” ऐसा रूप तो सर्वान्तर्यामी परमात्मा का ही हो सकता है। इसलिए परमात्मा ही अदृश्यत्वादि गुण वाला अक्षर है। ६ वैश्वानराधिकरणः— वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ।१।२।२५॥ इदमामनन्तिच्छंदोगाः “आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहि” इति प्रक्रम्य “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमान- ankurnagpal108@gmail.com

( ४४१ ) मात्मानं वैश्वानरमुपासते” इति । तत्र संदेहः किमयं वैश्वानर आत्मा, परमात्मेति शक्य निर्णयः, उत न इति । किं प्राप्तम् ? अशक्य निर्णय इति । कुतः ? वैश्वानर शब्दस्य चतुर्ष्वर्थेषु प्रयोग- दर्शनात् । जाठराग्नौतावत् “अयमग्नि वैश्वानरो येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति, यावदेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषं शृणोति” इति । महाभूत तृतीये च “विश्वस्मा अग्नि भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्” इति । देवतायां च “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवना- मभि श्रो.” इति । परमात्मनि च “तदात्मन्यैव हृदयोऽग्नौ वैश्वानरे प्रास्यत्” इति; “स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते” इति च । वाक्योपक्रमादिषूपलभ्यमाना-यपि लिंगानि सर्वानुगुणतया नेतुं शक्यानीति । छांदोग्योपनिषद् में- “इम समय तुम इस वैश्वानर आत्मा को जानो, वही हमारे बल हैं” ऐसा उपक्रम करते हुए “जो प्रादेश परिमित स्थान में अवस्थित इस व्यापक आत्मा की, वैश्वानर रूप से उपासना करता है ।” इत्यादि में वैश्वानर की उपासना का उपदेश दिया गया है । इस पर विचार होता है कि, वैश्वानर, जीवात्मा या परमात्मा ? निर्णय कुछ अशक्य सा है क्योंकि- वैश्वानर शब्द का चार अर्थों में प्रयोग देखा जाता है । जाठराग्नि के रूप में जैसे-- “यही वैश्वानर अग्नि है, जिससे भुक्त अन्त का परिपाक होता है, इसी से अन्तर्नाद होता है, जिसे कान बंध कर सुना जा सकता है, प्राणांत काल में व्यक्ति को यह नाद सुनाई नहीं पड़ता” इत्यादि । तृतीय महाभूत अग्निरूप में जैसे- “देवताओं ने समस्त जगत के उपकार के लिए वैश्वानर को दिवस का केतु (चिन्ह) बनाया है ।” इत्यादि । देवता के अर्थ में प्रयुक्त जैसे-- “हम लोग जिन वैश्वानर को सुदृष्टि से देखते हैं, वे ही समस्त जगत के सुख समृद्धि के संपादक हैं ।” इत्यादि परमात्मा अर्थ में जैसे- 'हृदयस्थ ankurnagpal108@gmail.com

( ४४२ ) आत्मस्वरूप वैश्वानर अग्नि को उसने प्रक्षिप्त किया" तथा "यही प्राण स्वरूप वैश्वानर अग्नि अनेक प्रकार से उद्‌गत होता है।" इत्यादि । वाक्य के प्रारंभ में विशेषार्थ ज्ञापक जो चिन्ह रहते हैं, उसी के आधार पर संपूर्ण वाक्य का अर्थ किया जा सकता है । एवं प्राप्तेऽभिधीयते—वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्- वैश्वानरः पर एव आत्मा कुतः ? साधारण शब्द विशेषात् । विशेष्यत इति विशेषः—साधारणस्य वैश्वानर शब्दस्य परमात्मा- साधारणैः धर्मविशेष्यमाणत्वादित्यर्थः । तथाहि—औपमन्यवादयः पंचेमे महर्षयः समेत्य—"को न आत्मा किं ब्रह्म ?" इति विचार्य "उद्दालको हि वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर- मध्येति तं हन्ताभ्यागच्छाम" इत्युद्दालकस्य वैश्वानरात्मविज्ञानभव- गम्य तमभ्याजग्मुः । स चोद्दालक एतान्वैश्वानरात्म जिज्ञासून- भिलक्ष्यात्मनश्च तत्राकृत्स्नवेदित्वं मत्वा" तान हो वाच अश्वपतिर्वै भगवतोऽय केकयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर मध्येति तं हन्ताभ्यागच्छाम" इति । ते चोद्दालकषष्ठाः तमश्वपतिमभ्या- जग्मुः । उक्त संशय पर सूत्रकार "वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्" सूत्र कहते हैं । अर्थात् वैश्वानर परमात्मा ही हैं, क्योंकि—साधारण शब्द की अपेक्षा, विशेष शब्द का प्रयोग किया गया है जिसके द्वारा विशेषित किया जाय उसे विशेष कहते है, अर्थात् वैश्वानर शब्द साधारण अर्थ को बोधक होते हुए भी, परमात्मा के असाधारण गुणों वाला होने से, उसी विशेषता का बोधक है । जैसा कि उल्लेख मिलता है कि—उपमन्यु आदि पांच ऋषि एकत्र होकर "हमारा आत्मा कौन है, ब्रह्म क्या है ?" ऐसा विचार कर रहे थे कुछ भी निर्णय करने में अपने को असमर्थ पाकर उन्होंने सोचा कि—"आरुणि उद्दालक ही इस समय वैश्वानर आत्मा के विशेषज्ञ हैं, चलें उन्हीं से इस विषय पर ज्ञान प्राप्त करें" अतः वे आरुणि को वैश्वानर का विशेषज्ञ मानकर

( ४४३ ) उनके निकट गए । उद्दालक ने इन वैश्वानर तत्त्व के जिज्ञासुओं को देखकर, अपने को वैश्वानर तत्त्व का विशेषज्ञ न मानते हुए “उनसे कहा—आजकल केकय देश के राजा अश्वपति ही वैश्वानर तत्त्व के विशेषज्ञ हैं, चलिए हम लोग उनके पास चले” इस प्रकार वे उद्दालक आदि छहों ऋषि अश्वपति के पास पहुँचे । स च तान्महर्षीन् यथार्हं पृथगमभ्यर्च्य “न मे स्तेनः” इत्यादिना “यक्ष्यमाणो ह वै भगवन्तोऽहमस्मि” इत्यंतेनात्मनो व्रतस्थतया प्रतिग्रहयोग्यतां ज्ञापयन्नेव ब्रह्मविद्भिरपि प्रतिषिद्ध परिहरणीयतां विहितकर्मकर्त्तव्यतां च प्रज्ञाप्य “यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसंतु भवन्तः” इत्यवोचत् । अश्वपति ने उन सबकी यथायोग्य अलग-अलग पूजा करके ‘मेरे राज्य मे चोर नहीं है” इत्यादि से लेकर “महापुरुषों मैं यज्ञ करना चाहता हूँ” इस वाक्य तक, अपने को व्रतस्थित प्रतिग्रह योग्य बतलाकर‘ ब्रह्मवेत्ताओं के लिए निषिद्ध कर्म की त्याज्यता तथा विहित कर्म की कर्त्तव्यता का उल्लेख करके ‘एक एक ऋत्विजों को जितना धन दूँगा, उतना ही आप लोगों को भी दूँगा आप लोग यहीं निवास करे” ऐसा अपना मंतव्य प्रकट किया । ते च मुमुक्षवो वैश्वानरमात्मानं जिज्ञास्यमानाः तमेवात्मान- मस्माकं ब्रूहीत्यवोचन् । तदेवं “को न आत्मा किं ब्रह्म ? इति जीवात्मनाऽमात्मभूतं ब्रह्म जिज्ञासमानैः तज्जन्मन्विच्छादिभिः वैश्वा-

( ४४४ ) उन ऋषियों वे, वैश्वानर आत्मा के जिज्ञासु होकर "हमें तो वैश्वानर आत्मा का ही रहस्य बतलावें" ऐसा कहा। इस प्रकार "हमारा आत्मा कौन है, ब्रह्म कौन है?" ऐसे जीवान्तर्यामी ब्रह्म तत्त्व को जानने के इच्छुक वे लोग, उस विषय में विशेषज्ञों को खोजते हुए जहाँ-जहाँ भी गए और वैश्वानर आत्मा के विषय में जिज्ञासा की, वहाँ उन्हें यही बतलाया गया कि, वैश्वानर परमात्मा ही हैं। आत्मा और ब्रह्म शब्द का उपक्रम करते हुए, अन्त में सभी जगह, आत्मा और वैश्वानर शब्द का व्यवहार किया गया, जिससे वे समझ गए कि-ब्रह्म शब्द के स्थान पर प्रयुक्त वैश्वानर शब्द, ब्रह्म का ही बोधक है। "वैश्वानर आत्मा का ज्ञाता पुरुष, समस्त लोकों, समस्त भूतों, और समस्त आत्माओं के अन्न को खाता है" तथा-- 'अग्नि में पतित ऋषीकतुला (शरतृण का समूह) जैसे भस्म हो जाता है, वैसे ही उनके पाप भी भस्म हो जाते हैं।" इत्यादि, वैश्वानर आत्मविज्ञान के वर्णन के परिणाम से ज्ञात होता है कि, वैश्वानर आत्मा, परब्रह्म है। इतश्च वैश्वानरः परमात्मा-इसलिए भी वैश्वानर परमात्मा है कि-- स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥१।२।२६॥ द्युप्रभृति पृथिव्यन्तमवयव विभागेन वैश्वानरस्य रूपमिहोपदि- श्यते । तच्च श्रुति स्मृतिषु परम पुरुषरूपतया प्रसिद्धम् तदिह तदेवे- दमिति स्मर्यमाणं-प्रतिभिज्ञायमानं वैश्वानरस्य परम पुरुषत्वे अनु- मानं लिगमित्यर्थः । इति शब्दः प्रकार वचनः इत्थंभूतरूपम् प्रत्य- भिज्जायमानं वैश्वानरस्य परमात्मत्वेऽनुमानं स्यात् श्रुतिस्मृतिषु हि परमपुरुषस्येत्थं रूपं प्रसिद्धम् । इस प्रकरण में, द्युलोक से लेकर पृथिवी तक सभी को एक-एक अवयव बतलाते हुए वैश्वानर आत्मा के संपूर्ण रूप का वर्णन किया गया है। श्रुति और स्मृतियों में परब्रह्म परमात्मा का जैसा रूप, प्रसिद्ध रूप से मिलता है वैसा ही रूप वैश्वानर को भी बतलाया गया, जिससे ज्ञात होता है कि-वैश्वानर, परमात्मा का ही नाम है। सूत्रस्थ "इति" ankurnagpal108@gmail.com

( ४४५ ) शब्द प्रकारवाची है । प्रत्यभिज्ञा का विषय ऐसे रूप वाला वैश्वानर शब्द, परमात्मा का ज्ञापक है । श्रुति स्मृति में ऐसा रूप परमात्मा का ही प्रसिद्ध है । यथा आथर्वणे—"अग्निर्मूर्धा, चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशःश्रोत्रे, वाग्विवृताश्च वेदाः; वायु प्राणो हृदयंविश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा" इति । अग्निरिह द्युलोकः "असौ वैलोकोऽग्निः" इति श्रुतेः । स्मरंति च मुनयः—"द्यांमूर्धानं यस्य विप्रावदंति खं वै नाभि चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे, दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौक्षिति च सोऽचिंत्यात्मा सर्वभूत प्रणेता "इति" यस्याग्निरास्यं द्यौ मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः सूर्यश्चक्षुः दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ।" इति च । जैसा कि आथर्वण संहिता में—"इस परमेश्वर का मस्तक अग्नि, नेत्र सूर्य और चंद्रमा, कान दिशायें, वाणी वेद, प्राण वायु, हृदय विश्व है, इसके दोनों पैरों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है, यही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है ।" इस वाक्य में अग्नि का अर्थ द्युलोक है जैसा कि— "यह द्युलोक अग्नि स्वरूप है" इस श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है । महामुनि वेदव्यास जी ने भी ऐसे ही रूप का स्मरण किया है— "विद्वद्गण द्युलोक को जिनका मस्तक, आकाश को नाभि, सूर्यचन्द्र को नेत्र, दिशाओं को कर्ण, एवं पृथ्वी को चरण बतलाते हैं, वे ही अचिन्त्य सर्वान्तर्यामी परमात्मा हैं।" तथा—"अग्नि जिनका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी चरण, सूर्य नेत्र, दिशायें कान हैं, उन लोकात्मा को प्रणाम है ।" इत्यादि । इह च द्युप्रभृतयो वैश्वानरस्य मूर्धाद्यवयवत्वेनोच्यन्ते । तथाहिं- तैरौपमन्यवप्रभृतिभिर्महर्षिभिः "आत्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्ये- षितमेव नो ब्रूहि' इति पृष्टः कैकेयस्तेभ्यो वैश्वानरात्मानमुपदि- दिक्षुः विशेषपृश्नान्यथानुपपत्या वैश्वानरात्मन्येतैः किंचिद् ज्ञातं ankurnagpal108@gmail.com

( ४४६ ) किंचिदज्ञातमिति इति विज्ञाय ज्ञाताज्ञातांश बुभुत्सया तानेकैकं प्रपच्छ । तत्र “औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्से” इति पृष्टे “दिवमेव भगवो राजन्” इति तेन चोक्ते दिवितस्य पूर्णं वैश्वा- नरात्म बुद्धिं निवर्तयन् वैश्वानरस्य द्यौर्मूर्धेति चोपदिशंस्तस्या वैश्वानरांशभूताया दिवः सुतेजा इति गुणनामधेयं प्राचिख्यपत् । उक्त स्मृतिवाक्य में भी द्युलोक आदि को वैश्वानर के अंगों के रूप में वर्णन किया गया है। उन उपमन्यु आदि महर्षियों द्वारा “आप वैश्वानर आत्मा के ज्ञाता हैं, उन्हीं का उपदेश करे” ऐसा पूछने पर कैकय राज विश्वपति ने, वैश्वानर तत्त्व के उपदेश की इच्छा से, बिना कुछ सामान्य ज्ञान हुए, विशेष तत्त्व का ज्ञान हो नहीं सकता ऐसा विचार कर, ये लोग आत्मतत्त्व को कितना जानते है कितना नहीं, इसको जानने के लिए, उन लोगों में से प्रत्येक से अलग-अलग प्रश्न किया। “उपमन

( ४४७ )

ही हैं, ऐसा अश्वपति ने उपदेश दिया। शरीर के मध्यभाग को संदेह कहते हैं। इस प्रकार जो द्युमूर्धादिविशिष्ट रूप परमात्मा का प्रसिद्ध है उसे ही वैश्वानर का बतलाया गया इससे स्पष्ट हो जाता है कि-वैश्वानर परमात्मा ही है। पुनरप्यनिर्णयमेवाशंक्य परिहरति— पुनः अनिर्णय की आशंका करके परिहार करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च नेतिचेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषमपि चैनमधीयते ।१।२।२७।। यदुक्तं वैश्वानरः परमात्मेति निश्चीयत इति, तन्न शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च, जाठरस्याप्यग्नेरिह प्रतीयमानत्वात् । शब्दस्तावद् वाजिनां वैश्वानर विद्याप्रकरणे “स एषोऽग्निर्वैश्वानरः” इति वैश्वानर समानाधिकरणतयाऽग्निरिति श्रूयते । अस्मिन् प्रकरणे च “हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यं पचन आस्यमाहवनीयः” इति वैश्वानरस्य हृदयादिस्थस्याग्नित्रय कल्पनं क्रियते । ‘तद् यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहा” इत्यादिना प्राणाहुत्याधारत्वं च वैश्वानरस्यावगम्यते । तथा वैश्वानरास्मिन् पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठानं वाजसनेयिनः समामनन्ति “स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद” इति। अतोऽग्नि शब्द सामानाधिकरण्यात् अग्नित्रेतापरिकल्पनात् प्राणाहुत्याधार भावात् अन्तः प्रतिष्ठानाच्च वैश्वानरस्य जाठरत्वमपि प्रतीयत इति नैकान्ततः परमात्मत्व- मिति चेत् । जो यह कहा कि-वैश्वानर परमात्मा ही है, सो यह समझ में नहीं आता, क्यों कि-शब्द आदि तथा आभ्यंतरस्थित होने से, जाठराग्नि की

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प्रतीति होती है। वाजसनेय प्रश्नोपनिषद् के वैश्वानर के प्रकरण में जैसे- वैश्वानर शब्द के साथ अग्नि शब्द का सामानाधिकरण्य अभेद रूप से कहा गया है। प्रस्तुत प्रकरण में भी - "हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है तथा मुख आहवनीय है" वैश्वानर की, हृदय आदि तीन स्थानों में तीनों अग्नियों के रूप में कल्पना की गई है । "जो अन्न पहिले आवे उसका हवन करना चाहिए उस समय वह भोक्ता जो प्रथम आहुति दे उसे" प्राणाय स्वाहा "कहकर दे" इत्यादि में भी प्राणाहुति के आधार रूप से वैश्वानर की ही प्रतीति होती है। तथा वाजसनेय सहिता में इस वैश्वानर आत्मा को जीव शरीर का अभ्यन्तर्वर्त्ती भी कहा गया है—"जो पुरुष के देहान्तर्वर्ती पुरुषाकृति वैश्वानर अग्नि को जानते हैं।" इस प्रकार अग्नि के साथ अभेद रूप से निर्देश, अग्नित्रय रूप से कल्पना, प्राणाहुति की अधिकरणता तथा शरीराभ्यंतर स्थिति आदि से वैश्वानर, जाठराग्नि ही प्रतीति होता है, एकमात्र परमात्मा ही वैश्वानर शब्दाभिधेय नहीं है। तत्र-तथा दृष्ट्युपदेशात्-पूर्वोक्तस्य त्रैलोक्य शरीरस्य परस्य ब्रह्मणो वैश्वानरस्य जाठराग्निशरीरतया तद्विशिष्टस्योपासनो- पदेशात् । अग्निशब्दादिभिर्हि न केवलो जाठरः प्रतिपाद्यते, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट. परमात्मा । कथमिदमवगम्यत इति चेत्-- असंभवात् जाठरस्य केवलस्य त्रैलोक्यशरीरत्वासंभवात् । त्रैलोक्य- शरीरतया प्रतिपन्नवैश्वानर समानाधिकरणो जाठर विषयतया प्रतीयमानोऽग्निशब्दो जाठरशरीरतया तद् विशिष्टं परमात्मानमे- वाभिद धतीत्यर्थः । यथोक्तं भगवता- "अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः, प्राणापान समायुक्त. पचाम्यन्नं चतुर्विधम् "इति जाठरानल शरीरो भूत्वेत्यर्थः । अतः तद्विशिष्टस्योपासनमत्रोप- दिश्यते । कि च-पुरुषमपिचैनमधीयते वाजसनेयिनः "स एषोऽग्नि- वैश्वानरो यत्पुरुषः" इति; नहि जाठरस्य केवलस्य पुरुषत्वम्,

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( ४४६ ) परमात्मन एव हि निरुपाधिकं पुरुषत्वं यथा-“सहस्रशीर्षापुरुषः” पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादौ । उक्त शंका असंगत है, जाठराग्नि का परमात्मा की दृष्टि से ही उपदेश किया गया है, अर्थात् त्रैलोक्य शरीरधारी के रूप से परब्रह्म को, वैश्वानर कहा गया है, जाठराग्नि उनका शरीर स्थानीय है, इसी दृष्टि से, जाठराग्नि विशिष्ट रूप का उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है। अग्नि आदि शब्द केवल जाठराग्नि बोधक ही नहीं हैं, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट रूप परमात्मा के भी बोधक है। यदि कहो कि, ऐसा कैसे समझें तो केवल जाठराग्नि में, त्रिलोकी शरीरत्व संभव नहीं है। त्रैलोक्य शरीर विशिष्ट रूप से प्रतिपन्न, वैश्वानर के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त, यदि कोई शब्द, जाठराग्नि अर्थ का बोधक हो तो भी, यही समझना चाहिए कि-जाठराग्नि परमात्मा का शरीर है और वह परमात्मा का ही बोधक है, जैसा कि भगवान ने स्वयं कहा है-“मैं वैश्वानर होकर प्राणियों के शरीर में आश्रित हूँ, प्राण अपान वायु से संयुक्त होकर चार प्रकार के खाद्यों का परिपाक करता हूँ” उक्त वाक्य में जाठराग्नि विशिष्ट ही उपास्य बतलाए गए हैं। वाजसनेय में इन्हें ही पुरुष रूप बतलाया गया है-“यह वैश्वानर अग्नि ही पुरुष हैं।” केवल जाठराग्नि मात्र, पुरुष नहीं हो सकता एकमात्र परमात्मा को ही पुरुष रूप से स्मरण किया गया है-” सहस्रशीर्षापुरुषः “पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादि । अतएव न देवता भूतञ्च।१।२।२८॥ उक्तेभ्य एव हेतुभ्यो देवतायाश्च ‘तृतीयस्य’ महाभूतस्यापि न वैश्वानरत्व प्रसंगः । उक्त कारणों से ही, वैश्वानर शब्द, देवता या तृतीय महाभूत अग्नि का भी, वाचक नहीं है। साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ।१।२।२९॥ वैश्वानरसमानाधिकरणस्याग्निशब्दस्य जाठराग्नि शरीरतया तद् विशिष्टस्य परमात्मनो वाचकत्वं, तथैव परमात्मन उपास्यत्व ankurnagpal108@gmail.com

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चोक्तम् । जैमिनिस्त्वाचार्यो वैश्वानर शब्दवदग्निशब्दस्यापि परमात्मन एव साक्षात् अव्यवधानेन वाचकत्वे न कश्चिद् विरोध इति मन्येत । अग्नि शब्द का वैश्वानर के साथ, अभेदभाव निर्दिष्ट होते हुए भी, जाठराग्नि शरीर होने से, तद्विशिष्ट परमात्मा का ही वाचक हो सकता है । वैसे ही परमात्मा के रूप को, उपास्य भी कहा गया है। जैमिनि आचार्य, वैश्वानर शब्द की तरह, अग्नि शब्द का भी, परमात्मा से, साक्षात् संबंध मानते हैं, और वाचकता में कोई विरोध नहीं समझते । एतदुक्तं भवति, यथा वैश्वानर शब्दः साधारणोऽपि परमा- त्माऽसाधारणधर्मविशेषितो विश्वेषां नराणां नेतृत्वादिना गुणेन परमात्मानमेवाभिदधातीति निश्चीयते, एवमग्निशब्दोऽप्यग्रनयना- दिना येनैवगुणेन योगाज्ज्वलने वर्तते, तस्यैव गुणस्य निरुपाधिकस्य काष्ठागतस्य परमात्मनि सम्भवादस्मिन् प्रकरणे परमात्माऽसाधा- रण विशेषितः परमात्मानमेवाभिधत्त इति । जैसे कि वैश्वानर शब्द, साधारण और अविशिष्ट होते हुए भी परमात्मा के असाधारण विशिष्ट धर्मों से, विशेषित होकर, समस्त जीव समुदाय के नेता परमात्मा, का वाचक है; उसी प्रकार “अग्नि” शब्द भी “आगे ले जाने वाला” व्युत्पत्ति के अनुसार नेतृत्व गुणवाला है । परमात्मा का यह स्वाभाविक गुण है; इस प्रकरण में परमात्मा के असाधारण गुणों से विशेषित होने से, वह अग्नि भी परमात्मा बोधक ही है । “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानं” इत्यपरिच्छिन्नस्य परस्य ब्रह्मणो द्युप्रभृतिपृथिव्यन्त प्रदेश संबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कथमुपपद्यते ?—तत्राह— शंका की जाती है कि— 'वह प्रादेश मात्र में ही परिमित नहीं है', इस श्रुति वाक्य में कहे गए अपरिच्छिन्न परब्रह्म की, द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त परिणाम परिच्छिन्नता कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं—

( ४५१ ) अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ।१।२।३०॥ उपासकाभिव्यक्त्यर्थं प्रादेशमात्रत्वं परमात्मन् इत्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते । “द्यौर्मूर्धा आदित्यश्चक्षुः, वायुः प्राणः, आकाशो मध्यकायः आपोबस्तिः, पृथिवी पादौ,” इति द्युप्रभृतिप्रदेशसंबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कृत्स्नमभिव्याप्तवता विगतमानस्य ह्यभिव्यक्ते- रेव हेतुर्भवति । उपासकों की अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए, परमात्मा का प्रादेश मात्र रूप, शास्त्रों में वर्णन किया गया है; ऐसा आश्मरथ्य आचार्य का मत है। “द्युलोक सिर, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, आकाश मध्य शरीर, जल बस्ति, पृथिवी चरण,” इत्यादि वाक्य में, द्युलोक आदि प्रदेशों से संबंधित प्रदेशगत परिमाण द्वारा, सर्वव्यापी परमात्मा की, जो परिच्छिन्नता बतलाई गई है, वह अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए ही है। मूर्ध प्रभृत्यवयवविशेषैः पुरुषविधत्वं परस्य ब्रह्मणः किमर्थ- मिति चेत्—तत्राह— सिर आदि अवयव विशेषों से युक्त पुरुष रूप का विधान परमात्मा के लिए क्यों किया गया है ? इस शंका का समाधान करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ।१।२।३१॥ तथोपासनार्थमिति बादरिराचार्यो मन्यते ।” यस्त्वेतमेवम-

  • भिविमानमात्मानमात्मानं - वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेषु आत्मसु अन्नंमत्ति” इति ब्रह्म प्राप्तये ह्युपासनमुपदिश्यते एतमेवमिति-उक्त प्रकारेण पुरुषाकारमित्यर्थः । सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेष्वात्मसु वर्त्तमानं यदन्नं भोग्यं तदत्ति-सर्वत्र वर्त्तमानं स्वत एवानवधिकातिशयानन्दं ब्रह्मानुभवति । यत्तु सर्वैः कर्मवश्यैरात्मभिः प्रत्येकमनन्यसाधारणमन्नंभुज्यते तन्मुमुक्षुभिस्त्या- ज्यत्वादह्रि न गृह्यते ।