श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
पृष्ठ 501, कुल 696 में से
संदर्भ में पढ़ें( ४४१ ) मात्मानं वैश्वानरमुपासते” इति । तत्र संदेहः किमयं वैश्वानर आत्मा, परमात्मेति शक्य निर्णयः, उत न इति । किं प्राप्तम् ? अशक्य निर्णय इति । कुतः ? वैश्वानर शब्दस्य चतुर्ष्वर्थेषु प्रयोग- दर्शनात् । जाठराग्नौतावत् “अयमग्नि वैश्वानरो येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति, यावदेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषं शृणोति” इति । महाभूत तृतीये च “विश्वस्मा अग्नि भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्” इति । देवतायां च “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवना- मभि श्रो.” इति । परमात्मनि च “तदात्मन्यैव हृदयोऽग्नौ वैश्वानरे प्रास्यत्” इति; “स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते” इति च । वाक्योपक्रमादिषूपलभ्यमाना-यपि लिंगानि सर्वानुगुणतया नेतुं शक्यानीति । छांदोग्योपनिषद् में- “इम समय तुम इस वैश्वानर आत्मा को जानो, वही हमारे बल हैं” ऐसा उपक्रम करते हुए “जो प्रादेश परिमित स्थान में अवस्थित इस व्यापक आत्मा की, वैश्वानर रूप से उपासना करता है ।” इत्यादि में वैश्वानर की उपासना का उपदेश दिया गया है । इस पर विचार होता है कि, वैश्वानर, जीवात्मा या परमात्मा ? निर्णय कुछ अशक्य सा है क्योंकि- वैश्वानर शब्द का चार अर्थों में प्रयोग देखा जाता है । जाठराग्नि के रूप में जैसे-- “यही वैश्वानर अग्नि है, जिससे भुक्त अन्त का परिपाक होता है, इसी से अन्तर्नाद होता है, जिसे कान बंध कर सुना जा सकता है, प्राणांत काल में व्यक्ति को यह नाद सुनाई नहीं पड़ता” इत्यादि । तृतीय महाभूत अग्निरूप में जैसे- “देवताओं ने समस्त जगत के उपकार के लिए वैश्वानर को दिवस का केतु (चिन्ह) बनाया है ।” इत्यादि । देवता के अर्थ में प्रयुक्त जैसे-- “हम लोग जिन वैश्वानर को सुदृष्टि से देखते हैं, वे ही समस्त जगत के सुख समृद्धि के संपादक हैं ।” इत्यादि परमात्मा अर्थ में जैसे- 'हृदयस्थ ankurnagpal108@gmail.com