श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४४० ) समष्टि पुरुषः तस्मादपिपरभूतोऽदृश्यत्वादिगुणकोऽक्षर शब्दाभिहितः परमात्मेत्यर्थः अश्नुत इति वा, नक्षरतीति वाऽक्षरम् । तदव्याकृतेऽपि स्वविकारव्याप्त्या वा महदादिवन्नामान्तराभिलापयोग्यक्षरणाभा- वादवाऽक्षरत्वंकथंचिद् उपपद्यते । इस प्रकरण में प्रकृति और पुरुष का, परब्रह्म से स्पष्ट भेद दिख- लाया गया है। “वह, दिव्य, निराकार पुरुष, बाहर और भीतर स्थित, जन्म-प्राण और मनरहित, शुभ्र, श्रेष्ठ अक्षर से भी श्रेष्ठ हैं।” इत्यादि में अव्याकृत पदवाच्य अक्षर से श्रेष्ठ जो समष्टि पुरुष है, उससे भी श्रेष्ठ अदृश्यत्वादि गुणवाले अक्षर परमात्मा का उल्लेख है। अक्षर का तात्पर्य है कि जो व्यापक रूप से सर्वत्र विद्यमान रहे अथवा जो स्वरूप से कभी विच्युत न हो। अव्याकृत प्रकृति न कभी व्यापक होकर स्थित रहती है और न महत्तत्त्व आदि की तरह नामान्तर ग्रहण रूप क्षरण ही प्राप्त करती है; इसलिए उसकी अक्षरता कभी उपपादित नहीं हो सकती । रूपोपन्यासाच्च ।१।२।२४॥ “अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूता- न्तरात्मा।” इतीदृश रूपं सर्वभूतान्तरात्मनः परमात्मन् एव संभवति श्रतश्च परमात्मा । “अग्नि जिसका शिर, चन्द्र और सूर्य जिसकी आंखें, दिशायें जिसके कान, विवृत वेद जिसकी वाणी, वायु जिसके प्राण, विश्व जिसका हृदय, और पृथिवी जिसके चरण हैं, वही समस्त भूत समुदाय का अन्त- र्यामी है।” ऐसा रूप तो सर्वान्तर्यामी परमात्मा का ही हो सकता है। इसलिए परमात्मा ही अदृश्यत्वादि गुण वाला अक्षर है। ६ वैश्वानराधिकरणः— वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ।१।२।२५॥ इदमामनन्तिच्छंदोगाः “आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहि” इति प्रक्रम्य “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमान- ankurnagpal108@gmail.com