श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
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संदर्भ में पढ़ें( ४३६ ) ऐसा आदेश दिया गया । “यही तुम्हारा मार्ग है” इत्यादि से प्रारंभ करके “यही तुम लोगों का पुण्यलब्ध ब्रह्मलोक है” इस अन्तिम वाक्य तक, कर्मानुष्ठान का प्रकार तथा श्रुति स्मृति उपदिष्ट कर्मों में किसी एक की भी हानि से संपूर्ण अनुष्ठान की हानि, तथा विधिलंघन पूर्वक किए गए अनुष्ठान की निरनुष्ठानता बतलाकर “अठारह सकाम ऋत्विर्गों द्वारा अनुष्ठित यज्ञ रूपी अदृढ़ जहाज की यदि कोई मूढ प्रशंसा करता है तो वह बार-बार जरा मृत्यु को प्राप्त करता है” इत्यादि वाक्य में, फलासक्ति पूर्वक अनुष्ठित तत्त्वज्ञान विहीन कर्म को अवर कहा गया तथा उस कर्मानुष्ठान से पुनः जन्म मरण का चक्र बतलाकर—“जो तपस्या और श्रद्धा से उपासना करता है” इत्यादि में, ज्ञानियों द्वारा फलानुसंधान रहित अनुष्ठित कर्म को ही ब्रह्म प्राप्ति का सहायक बतलाते हुए निष्काम कर्म की प्रशंसा की गई है। इसके बाद--“कर्म- लब्ध फल की परीक्षा करके अर्थात् फल की नित्यता अनित्यता का विचार करके” इत्यादि में, एक मात्र निष्काम कर्म करने वाले, ब्रह्म- प्राप्ति के उपायभूत ज्ञान के जिज्ञासुओं को आचार्य के निकट जाने का नियम बतलाकर “यही वह सत्य है” इत्यादि से प्रारंभ करके “हे सौम्य ! वह पुरुष ही अविद्या ग्रन्थि को छिन्न करते हैं” इत्यादि तक, पूर्वोक्त अक्षर भूतयोनि परब्रह्म की अब तक कहे गए गुणों के साथ सर्वान्तर्या- मिता, विश्व शरीर होने से विश्वरूपता तथा उन्हीं से विश्वसृष्टि का सुस्पष्ट प्रतिपादन करके ‘आविः सन्निहिता’ इत्यादि में—अव्याकृत प्रकृति से श्रेष्ठ पुरुष से भी, श्रेष्ठतर—परमव्योम में स्थित, निरवधि- निरतिशय आनंद स्वरूप अक्षर पदवाच्य परमपुरुष पर ब्रह्म की हृदय पुण्डरीक में उपासना प्रणाली, उपासना की पराभक्तिरूपता तथा उपासक की अविद्यानिवृत्ति पूर्वक ब्रह्म तुल्यता और ब्रह्मानुभवफल का उपदेश करके संहार किया गया है। इस प्रकार पूरे प्रकरण मे विशेष निर्देश और भेद निर्देश को देखने से, ज्ञात होता है कि इसमें प्रधान और पुरुष का प्रतिपादन नहीं है । भेदव्यपदेशोऽपिहि ताभ्यां परस्य ब्रह्मणोऽत्र विद्यते । दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्ष- रात परतः परः “इत्यादिभिः अक्षराद् अव्याकृतात् परतो यः ankurnagpal108@gmail.com