भारतकोश
श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

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( ४३८ ) पुनरावृत्तिमुक्त्वा “तपश्श्रद्धे ये ह्युपवसंति” इत्यादिन पुनरपि- फलाभिसंधि रहितं ज्ञानिनानुष्ठितं कर्म ब्रह्म प्राप्तये भवतीति प्रशस्य “परीक्ष्य लोकान्” इत्यादिना केवल कर्मफलेषु विरक्तस्य यथोदित कर्मानुगृहीतं ब्रह्मप्राप्त्युपायभूतम् ज्ञानं जिज्ञासमानस्य च आचार्योपसदनं विधाय 'तदेतत् सत्यं यथा सुदीप्तात् “इत्यादिना” सोऽविद्याग्रन्थि विकिरतीह सौम्य” इत्यंतेन पूर्वोक्तस्याक्षरस्य भूत- योनेः परस्य ब्रह्मणः परमपुरुषस्यानुक्तैः स्वरूपगुणैः सह सर्वभूतान्त- रात्मतया विश्वशरीरत्वेन विश्वरूपत्वम्, तस्माद् विश्व सृष्टिं च विस्पष्टमभिधाय “आविस्सन्निहितम्” इत्यादिना तस्यैवाक्षर स्याव्यक्तात्परतोऽपि पुरुषात् परभूतस्यपरस्य ब्रह्मणः परमव्योम्नि प्रतिष्ठितस्यानवधिकाति शयानंद स्वरूपस्य हृदयगुहायामुपासीन प्रकारं उपासनस्य च परभक्तिरूपत्वमुपासीनस्याविद्याविमोकपूर्वकं ब्रह्मसमं ब्रह्मानुभवफलं चोपदिश्योपसंहृतम् । श्रतएव विशेषणाद् भेदव्यपदेशाच्च नास्मिन् प्रकरणे प्रधानपुरुषौ प्रतिपाद्येते । “जो सर्वज्ञ सर्वविद्” इत्यादि वाक्य में उनके सृष्टि कार्योपयोगी, सर्वज्ञ, सत्य संकल्प आदि गुण कहे गए हैं । कार्यभावापन्न ब्रह्म ( हिरण्यगर्भ ) नाम और रूप से भिन्न भोक्ता ( जीव ) तथा भोग्य ( जड जगत ) आदि सब, सर्वज्ञ सत्य संकल्प, अक्षर ब्रह्म से ही उत्पन्न होते हैं । “तदेतत् सत्यम्” इत्यादि में, परब्रह्म की, निरुपाधिक सत्यता बतलाई गई है ।” कवियों अर्थात् मनी षियो ने, मंत्रों से जिन समस्त कर्मों का ज्ञान प्राप्त किया, उनका त्रेता में विस्तार हुआ, हे सत्याभिलाषियों ! आप निरन्तर उनका आचरण करिए” इत्यादि वाक्य मे; सर्वज्ञ, सत्यसंकल्प, कल्याण गुणाकर स्वतः सत्य, अक्षर पुरुष की प्राप्ति के इच्छुक, तथा उनकी प्राप्ति के उद्देश्य से अन्यान्य फलासक्ति से विरक्त तुम लोग, ऋक् यजु साम अथर्व वेदों में ऋषियों द्वारा देखे गए त्रेता अग्नियो में निहित वर्णाश्रमोचित कर्मों का आचरण करो; ankurnagpal108@gmail.com