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श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)

Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary

भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा

DevanagariHindipublished696 पृष्ठ

( ४३६ ) ऐसा आदेश दिया गया । “यही तुम्हारा मार्ग है” इत्यादि से प्रारंभ करके “यही तुम लोगों का पुण्यलब्ध ब्रह्मलोक है” इस अन्तिम वाक्य तक, कर्मानुष्ठान का प्रकार तथा श्रुति स्मृति उपदिष्ट कर्मों में किसी एक की भी हानि से संपूर्ण अनुष्ठान की हानि, तथा विधिलंघन पूर्वक किए गए अनुष्ठान की निरनुष्ठानता बतलाकर “अठारह सकाम ऋत्विर्गों द्वारा अनुष्ठित यज्ञ रूपी अदृढ़ जहाज की यदि कोई मूढ प्रशंसा करता है तो वह बार-बार जरा मृत्यु को प्राप्त करता है” इत्यादि वाक्य में, फलासक्ति पूर्वक अनुष्ठित तत्त्वज्ञान विहीन कर्म को अवर कहा गया तथा उस कर्मानुष्ठान से पुनः जन्म मरण का चक्र बतलाकर—“जो तपस्या और श्रद्धा से उपासना करता है” इत्यादि में, ज्ञानियों द्वारा फलानुसंधान रहित अनुष्ठित कर्म को ही ब्रह्म प्राप्ति का सहायक बतलाते हुए निष्काम कर्म की प्रशंसा की गई है। इसके बाद--“कर्म- लब्ध फल की परीक्षा करके अर्थात् फल की नित्यता अनित्यता का विचार करके” इत्यादि में, एक मात्र निष्काम कर्म करने वाले, ब्रह्म- प्राप्ति के उपायभूत ज्ञान के जिज्ञासुओं को आचार्य के निकट जाने का नियम बतलाकर “यही वह सत्य है” इत्यादि से प्रारंभ करके “हे सौम्य ! वह पुरुष ही अविद्या ग्रन्थि को छिन्न करते हैं” इत्यादि तक, पूर्वोक्त अक्षर भूतयोनि परब्रह्म की अब तक कहे गए गुणों के साथ सर्वान्तर्या- मिता, विश्व शरीर होने से विश्वरूपता तथा उन्हीं से विश्वसृष्टि का सुस्पष्ट प्रतिपादन करके ‘आविः सन्निहिता’ इत्यादि में—अव्याकृत प्रकृति से श्रेष्ठ पुरुष से भी, श्रेष्ठतर—परमव्योम में स्थित, निरवधि- निरतिशय आनंद स्वरूप अक्षर पदवाच्य परमपुरुष पर ब्रह्म की हृदय पुण्डरीक में उपासना प्रणाली, उपासना की पराभक्तिरूपता तथा उपासक की अविद्यानिवृत्ति पूर्वक ब्रह्म तुल्यता और ब्रह्मानुभवफल का उपदेश करके संहार किया गया है। इस प्रकार पूरे प्रकरण मे विशेष निर्देश और भेद निर्देश को देखने से, ज्ञात होता है कि इसमें प्रधान और पुरुष का प्रतिपादन नहीं है । भेदव्यपदेशोऽपिहि ताभ्यां परस्य ब्रह्मणोऽत्र विद्यते । दिव्यो ह्यमूर्त्तः पुरुषः स बाह्याभ्यन्तरो ह्यजः अप्राणो ह्यमनाः शुभ्रो ह्यक्ष- रात परतः परः “इत्यादिभिः अक्षराद् अव्याकृतात् परतो यः ankurnagpal108@gmail.com

( ४४० ) समष्टि पुरुषः तस्मादपिपरभूतोऽदृश्यत्वादिगुणकोऽक्षर शब्दाभिहितः परमात्मेत्यर्थः अश्नुत इति वा, नक्षरतीति वाऽक्षरम् । तदव्याकृतेऽपि स्वविकारव्याप्त्या वा महदादिवन्नामान्तराभिलापयोग्यक्षरणाभा- वादवाऽक्षरत्वंकथंचिद् उपपद्यते । इस प्रकरण में प्रकृति और पुरुष का, परब्रह्म से स्पष्ट भेद दिख- लाया गया है। “वह, दिव्य, निराकार पुरुष, बाहर और भीतर स्थित, जन्म-प्राण और मनरहित, शुभ्र, श्रेष्ठ अक्षर से भी श्रेष्ठ हैं।” इत्यादि में अव्याकृत पदवाच्य अक्षर से श्रेष्ठ जो समष्टि पुरुष है, उससे भी श्रेष्ठ अदृश्यत्वादि गुणवाले अक्षर परमात्मा का उल्लेख है। अक्षर का तात्पर्य है कि जो व्यापक रूप से सर्वत्र विद्यमान रहे अथवा जो स्वरूप से कभी विच्युत न हो। अव्याकृत प्रकृति न कभी व्यापक होकर स्थित रहती है और न महत्तत्त्व आदि की तरह नामान्तर ग्रहण रूप क्षरण ही प्राप्त करती है; इसलिए उसकी अक्षरता कभी उपपादित नहीं हो सकती । रूपोपन्यासाच्च ।१।२।२४॥ “अग्निर्मूर्धा चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशः श्रोत्रे वाग्विवृताश्च वेदाः वायुः प्राणो हृदयं विश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूता- न्तरात्मा।” इतीदृश रूपं सर्वभूतान्तरात्मनः परमात्मन् एव संभवति श्रतश्च परमात्मा । “अग्नि जिसका शिर, चन्द्र और सूर्य जिसकी आंखें, दिशायें जिसके कान, विवृत वेद जिसकी वाणी, वायु जिसके प्राण, विश्व जिसका हृदय, और पृथिवी जिसके चरण हैं, वही समस्त भूत समुदाय का अन्त- र्यामी है।” ऐसा रूप तो सर्वान्तर्यामी परमात्मा का ही हो सकता है। इसलिए परमात्मा ही अदृश्यत्वादि गुण वाला अक्षर है। ६ वैश्वानराधिकरणः— वैश्वानरः साधारणशब्दविशेषात् ।१।२।२५॥ इदमामनन्तिच्छंदोगाः “आत्मानमेवेमं वैश्वानरं संप्रत्यध्येषि तमेव नो ब्रूहि” इति प्रक्रम्य “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमान- ankurnagpal108@gmail.com

( ४४१ ) मात्मानं वैश्वानरमुपासते” इति । तत्र संदेहः किमयं वैश्वानर आत्मा, परमात्मेति शक्य निर्णयः, उत न इति । किं प्राप्तम् ? अशक्य निर्णय इति । कुतः ? वैश्वानर शब्दस्य चतुर्ष्वर्थेषु प्रयोग- दर्शनात् । जाठराग्नौतावत् “अयमग्नि वैश्वानरो येनेदमन्नं पच्यते यदिदमद्यते तस्यैष घोषो भवति, यावदेतत् कर्णावपिधाय शृणोति स यदोत्क्रमिष्यन्भवति नैनं घोषं शृणोति” इति । महाभूत तृतीये च “विश्वस्मा अग्नि भुवनाय देवा वैश्वानरं केतुमह्नामकृण्वन्” इति । देवतायां च “वैश्वानरस्य सुमतौ स्याम राजा हि कं भुवना- मभि श्रो.” इति । परमात्मनि च “तदात्मन्यैव हृदयोऽग्नौ वैश्वानरे प्रास्यत्” इति; “स एष वैश्वानरो विश्वरूपः प्राणोऽग्निरुदयते” इति च । वाक्योपक्रमादिषूपलभ्यमाना-यपि लिंगानि सर्वानुगुणतया नेतुं शक्यानीति । छांदोग्योपनिषद् में- “इम समय तुम इस वैश्वानर आत्मा को जानो, वही हमारे बल हैं” ऐसा उपक्रम करते हुए “जो प्रादेश परिमित स्थान में अवस्थित इस व्यापक आत्मा की, वैश्वानर रूप से उपासना करता है ।” इत्यादि में वैश्वानर की उपासना का उपदेश दिया गया है । इस पर विचार होता है कि, वैश्वानर, जीवात्मा या परमात्मा ? निर्णय कुछ अशक्य सा है क्योंकि- वैश्वानर शब्द का चार अर्थों में प्रयोग देखा जाता है । जाठराग्नि के रूप में जैसे-- “यही वैश्वानर अग्नि है, जिससे भुक्त अन्त का परिपाक होता है, इसी से अन्तर्नाद होता है, जिसे कान बंध कर सुना जा सकता है, प्राणांत काल में व्यक्ति को यह नाद सुनाई नहीं पड़ता” इत्यादि । तृतीय महाभूत अग्निरूप में जैसे- “देवताओं ने समस्त जगत के उपकार के लिए वैश्वानर को दिवस का केतु (चिन्ह) बनाया है ।” इत्यादि । देवता के अर्थ में प्रयुक्त जैसे-- “हम लोग जिन वैश्वानर को सुदृष्टि से देखते हैं, वे ही समस्त जगत के सुख समृद्धि के संपादक हैं ।” इत्यादि परमात्मा अर्थ में जैसे- 'हृदयस्थ ankurnagpal108@gmail.com

( ४४२ ) आत्मस्वरूप वैश्वानर अग्नि को उसने प्रक्षिप्त किया" तथा "यही प्राण स्वरूप वैश्वानर अग्नि अनेक प्रकार से उद्‌गत होता है।" इत्यादि । वाक्य के प्रारंभ में विशेषार्थ ज्ञापक जो चिन्ह रहते हैं, उसी के आधार पर संपूर्ण वाक्य का अर्थ किया जा सकता है । एवं प्राप्तेऽभिधीयते—वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्- वैश्वानरः पर एव आत्मा कुतः ? साधारण शब्द विशेषात् । विशेष्यत इति विशेषः—साधारणस्य वैश्वानर शब्दस्य परमात्मा- साधारणैः धर्मविशेष्यमाणत्वादित्यर्थः । तथाहि—औपमन्यवादयः पंचेमे महर्षयः समेत्य—"को न आत्मा किं ब्रह्म ?" इति विचार्य "उद्दालको हि वै भगवन्तोऽयमारुणिः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर- मध्येति तं हन्ताभ्यागच्छाम" इत्युद्दालकस्य वैश्वानरात्मविज्ञानभव- गम्य तमभ्याजग्मुः । स चोद्दालक एतान्वैश्वानरात्म जिज्ञासून- भिलक्ष्यात्मनश्च तत्राकृत्स्नवेदित्वं मत्वा" तान हो वाच अश्वपतिर्वै भगवतोऽय केकयः सम्प्रतीममात्मानं वैश्वानर मध्येति तं हन्ताभ्यागच्छाम" इति । ते चोद्दालकषष्ठाः तमश्वपतिमभ्या- जग्मुः । उक्त संशय पर सूत्रकार "वैश्वानरः साधारण शब्द विशेषात्" सूत्र कहते हैं । अर्थात् वैश्वानर परमात्मा ही हैं, क्योंकि—साधारण शब्द की अपेक्षा, विशेष शब्द का प्रयोग किया गया है जिसके द्वारा विशेषित किया जाय उसे विशेष कहते है, अर्थात् वैश्वानर शब्द साधारण अर्थ को बोधक होते हुए भी, परमात्मा के असाधारण गुणों वाला होने से, उसी विशेषता का बोधक है । जैसा कि उल्लेख मिलता है कि—उपमन्यु आदि पांच ऋषि एकत्र होकर "हमारा आत्मा कौन है, ब्रह्म क्या है ?" ऐसा विचार कर रहे थे कुछ भी निर्णय करने में अपने को असमर्थ पाकर उन्होंने सोचा कि—"आरुणि उद्दालक ही इस समय वैश्वानर आत्मा के विशेषज्ञ हैं, चलें उन्हीं से इस विषय पर ज्ञान प्राप्त करें" अतः वे आरुणि को वैश्वानर का विशेषज्ञ मानकर

( ४४३ ) उनके निकट गए । उद्दालक ने इन वैश्वानर तत्त्व के जिज्ञासुओं को देखकर, अपने को वैश्वानर तत्त्व का विशेषज्ञ न मानते हुए “उनसे कहा—आजकल केकय देश के राजा अश्वपति ही वैश्वानर तत्त्व के विशेषज्ञ हैं, चलिए हम लोग उनके पास चले” इस प्रकार वे उद्दालक आदि छहों ऋषि अश्वपति के पास पहुँचे । स च तान्महर्षीन् यथार्हं पृथगमभ्यर्च्य “न मे स्तेनः” इत्यादिना “यक्ष्यमाणो ह वै भगवन्तोऽहमस्मि” इत्यंतेनात्मनो व्रतस्थतया प्रतिग्रहयोग्यतां ज्ञापयन्नेव ब्रह्मविद्भिरपि प्रतिषिद्ध परिहरणीयतां विहितकर्मकर्त्तव्यतां च प्रज्ञाप्य “यावदेकैकस्मा ऋत्विजे धनं दास्यामि तावद् भगवद्भ्यो दास्यामि वसंतु भवन्तः” इत्यवोचत् । अश्वपति ने उन सबकी यथायोग्य अलग-अलग पूजा करके ‘मेरे राज्य मे चोर नहीं है” इत्यादि से लेकर “महापुरुषों मैं यज्ञ करना चाहता हूँ” इस वाक्य तक, अपने को व्रतस्थित प्रतिग्रह योग्य बतलाकर‘ ब्रह्मवेत्ताओं के लिए निषिद्ध कर्म की त्याज्यता तथा विहित कर्म की कर्त्तव्यता का उल्लेख करके ‘एक एक ऋत्विजों को जितना धन दूँगा, उतना ही आप लोगों को भी दूँगा आप लोग यहीं निवास करे” ऐसा अपना मंतव्य प्रकट किया । ते च मुमुक्षवो वैश्वानरमात्मानं जिज्ञास्यमानाः तमेवात्मान- मस्माकं ब्रूहीत्यवोचन् । तदेवं “को न आत्मा किं ब्रह्म ? इति जीवात्मनाऽमात्मभूतं ब्रह्म जिज्ञासमानैः तज्जन्मन्विच्छादिभिः वैश्वा-

( ४४४ ) उन ऋषियों वे, वैश्वानर आत्मा के जिज्ञासु होकर "हमें तो वैश्वानर आत्मा का ही रहस्य बतलावें" ऐसा कहा। इस प्रकार "हमारा आत्मा कौन है, ब्रह्म कौन है?" ऐसे जीवान्तर्यामी ब्रह्म तत्त्व को जानने के इच्छुक वे लोग, उस विषय में विशेषज्ञों को खोजते हुए जहाँ-जहाँ भी गए और वैश्वानर आत्मा के विषय में जिज्ञासा की, वहाँ उन्हें यही बतलाया गया कि, वैश्वानर परमात्मा ही हैं। आत्मा और ब्रह्म शब्द का उपक्रम करते हुए, अन्त में सभी जगह, आत्मा और वैश्वानर शब्द का व्यवहार किया गया, जिससे वे समझ गए कि-ब्रह्म शब्द के स्थान पर प्रयुक्त वैश्वानर शब्द, ब्रह्म का ही बोधक है। "वैश्वानर आत्मा का ज्ञाता पुरुष, समस्त लोकों, समस्त भूतों, और समस्त आत्माओं के अन्न को खाता है" तथा-- 'अग्नि में पतित ऋषीकतुला (शरतृण का समूह) जैसे भस्म हो जाता है, वैसे ही उनके पाप भी भस्म हो जाते हैं।" इत्यादि, वैश्वानर आत्मविज्ञान के वर्णन के परिणाम से ज्ञात होता है कि, वैश्वानर आत्मा, परब्रह्म है। इतश्च वैश्वानरः परमात्मा-इसलिए भी वैश्वानर परमात्मा है कि-- स्मर्यमाणमनुमानं स्यादिति ॥१।२।२६॥ द्युप्रभृति पृथिव्यन्तमवयव विभागेन वैश्वानरस्य रूपमिहोपदि- श्यते । तच्च श्रुति स्मृतिषु परम पुरुषरूपतया प्रसिद्धम् तदिह तदेवे- दमिति स्मर्यमाणं-प्रतिभिज्ञायमानं वैश्वानरस्य परम पुरुषत्वे अनु- मानं लिगमित्यर्थः । इति शब्दः प्रकार वचनः इत्थंभूतरूपम् प्रत्य- भिज्जायमानं वैश्वानरस्य परमात्मत्वेऽनुमानं स्यात् श्रुतिस्मृतिषु हि परमपुरुषस्येत्थं रूपं प्रसिद्धम् । इस प्रकरण में, द्युलोक से लेकर पृथिवी तक सभी को एक-एक अवयव बतलाते हुए वैश्वानर आत्मा के संपूर्ण रूप का वर्णन किया गया है। श्रुति और स्मृतियों में परब्रह्म परमात्मा का जैसा रूप, प्रसिद्ध रूप से मिलता है वैसा ही रूप वैश्वानर को भी बतलाया गया, जिससे ज्ञात होता है कि-वैश्वानर, परमात्मा का ही नाम है। सूत्रस्थ "इति" ankurnagpal108@gmail.com

( ४४५ ) शब्द प्रकारवाची है । प्रत्यभिज्ञा का विषय ऐसे रूप वाला वैश्वानर शब्द, परमात्मा का ज्ञापक है । श्रुति स्मृति में ऐसा रूप परमात्मा का ही प्रसिद्ध है । यथा आथर्वणे—"अग्निर्मूर्धा, चक्षुषी चन्द्रसूर्यौ दिशःश्रोत्रे, वाग्विवृताश्च वेदाः; वायु प्राणो हृदयंविश्वमस्य पद्भ्यां पृथिवी ह्येष सर्वभूतान्तरात्मा" इति । अग्निरिह द्युलोकः "असौ वैलोकोऽग्निः" इति श्रुतेः । स्मरंति च मुनयः—"द्यांमूर्धानं यस्य विप्रावदंति खं वै नाभि चन्द्रसूर्यौ च नेत्रे, दिशः श्रोत्रे विद्धि पादौक्षिति च सोऽचिंत्यात्मा सर्वभूत प्रणेता "इति" यस्याग्निरास्यं द्यौ मूर्धा खं नाभिश्चरणौ क्षितिः सूर्यश्चक्षुः दिशः श्रोत्रं तस्मै लोकात्मने नमः ।" इति च । जैसा कि आथर्वण संहिता में—"इस परमेश्वर का मस्तक अग्नि, नेत्र सूर्य और चंद्रमा, कान दिशायें, वाणी वेद, प्राण वायु, हृदय विश्व है, इसके दोनों पैरों से पृथ्वी उत्पन्न हुई है, यही समस्त प्राणियों का अन्तरात्मा है ।" इस वाक्य में अग्नि का अर्थ द्युलोक है जैसा कि— "यह द्युलोक अग्नि स्वरूप है" इस श्रुति वाक्य से ज्ञात होता है । महामुनि वेदव्यास जी ने भी ऐसे ही रूप का स्मरण किया है— "विद्वद्गण द्युलोक को जिनका मस्तक, आकाश को नाभि, सूर्यचन्द्र को नेत्र, दिशाओं को कर्ण, एवं पृथ्वी को चरण बतलाते हैं, वे ही अचिन्त्य सर्वान्तर्यामी परमात्मा हैं।" तथा—"अग्नि जिनका मुख, द्युलोक मस्तक, आकाश नाभि, पृथ्वी चरण, सूर्य नेत्र, दिशायें कान हैं, उन लोकात्मा को प्रणाम है ।" इत्यादि । इह च द्युप्रभृतयो वैश्वानरस्य मूर्धाद्यवयवत्वेनोच्यन्ते । तथाहिं- तैरौपमन्यवप्रभृतिभिर्महर्षिभिः "आत्मानमेवेमं वैश्वानरं सम्प्रत्यध्ये- षितमेव नो ब्रूहि' इति पृष्टः कैकेयस्तेभ्यो वैश्वानरात्मानमुपदि- दिक्षुः विशेषपृश्नान्यथानुपपत्या वैश्वानरात्मन्येतैः किंचिद् ज्ञातं ankurnagpal108@gmail.com

( ४४६ ) किंचिदज्ञातमिति इति विज्ञाय ज्ञाताज्ञातांश बुभुत्सया तानेकैकं प्रपच्छ । तत्र “औपमन्यव कं त्वमात्मानमुपास्से” इति पृष्टे “दिवमेव भगवो राजन्” इति तेन चोक्ते दिवितस्य पूर्णं वैश्वा- नरात्म बुद्धिं निवर्तयन् वैश्वानरस्य द्यौर्मूर्धेति चोपदिशंस्तस्या वैश्वानरांशभूताया दिवः सुतेजा इति गुणनामधेयं प्राचिख्यपत् । उक्त स्मृतिवाक्य में भी द्युलोक आदि को वैश्वानर के अंगों के रूप में वर्णन किया गया है। उन उपमन्यु आदि महर्षियों द्वारा “आप वैश्वानर आत्मा के ज्ञाता हैं, उन्हीं का उपदेश करे” ऐसा पूछने पर कैकय राज विश्वपति ने, वैश्वानर तत्त्व के उपदेश की इच्छा से, बिना कुछ सामान्य ज्ञान हुए, विशेष तत्त्व का ज्ञान हो नहीं सकता ऐसा विचार कर, ये लोग आत्मतत्त्व को कितना जानते है कितना नहीं, इसको जानने के लिए, उन लोगों में से प्रत्येक से अलग-अलग प्रश्न किया। “उपमन

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ही हैं, ऐसा अश्वपति ने उपदेश दिया। शरीर के मध्यभाग को संदेह कहते हैं। इस प्रकार जो द्युमूर्धादिविशिष्ट रूप परमात्मा का प्रसिद्ध है उसे ही वैश्वानर का बतलाया गया इससे स्पष्ट हो जाता है कि-वैश्वानर परमात्मा ही है। पुनरप्यनिर्णयमेवाशंक्य परिहरति— पुनः अनिर्णय की आशंका करके परिहार करते हैं— शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च नेतिचेन्न तथा दृष्ट्युपदेशादसम्भवात् पुरुषमपि चैनमधीयते ।१।२।२७।। यदुक्तं वैश्वानरः परमात्मेति निश्चीयत इति, तन्न शब्दादिभ्योऽन्तः प्रतिष्ठानाच्च, जाठरस्याप्यग्नेरिह प्रतीयमानत्वात् । शब्दस्तावद् वाजिनां वैश्वानर विद्याप्रकरणे “स एषोऽग्निर्वैश्वानरः” इति वैश्वानर समानाधिकरणतयाऽग्निरिति श्रूयते । अस्मिन् प्रकरणे च “हृदयं गार्हपत्यो मनोऽन्वाहार्यं पचन आस्यमाहवनीयः” इति वैश्वानरस्य हृदयादिस्थस्याग्नित्रय कल्पनं क्रियते । ‘तद् यद्भक्तं प्रथममागच्छेत्तद्धोमीयं स यां प्रथमामाहुतिं जुहुयात्तां जुहुयात्प्राणाय स्वाहा” इत्यादिना प्राणाहुत्याधारत्वं च वैश्वानरस्यावगम्यते । तथा वैश्वानरास्मिन् पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठानं वाजसनेयिनः समामनन्ति “स यो हैतमेवमग्नि वैश्वानरं पुरुषविधं पुरुषेऽन्तः प्रतिष्ठितं वेद” इति। अतोऽग्नि शब्द सामानाधिकरण्यात् अग्नित्रेतापरिकल्पनात् प्राणाहुत्याधार भावात् अन्तः प्रतिष्ठानाच्च वैश्वानरस्य जाठरत्वमपि प्रतीयत इति नैकान्ततः परमात्मत्व- मिति चेत् । जो यह कहा कि-वैश्वानर परमात्मा ही है, सो यह समझ में नहीं आता, क्यों कि-शब्द आदि तथा आभ्यंतरस्थित होने से, जाठराग्नि की

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प्रतीति होती है। वाजसनेय प्रश्नोपनिषद् के वैश्वानर के प्रकरण में जैसे- वैश्वानर शब्द के साथ अग्नि शब्द का सामानाधिकरण्य अभेद रूप से कहा गया है। प्रस्तुत प्रकरण में भी - "हृदय गार्हपत्याग्नि है, मन अन्वाहार्यपचन है तथा मुख आहवनीय है" वैश्वानर की, हृदय आदि तीन स्थानों में तीनों अग्नियों के रूप में कल्पना की गई है । "जो अन्न पहिले आवे उसका हवन करना चाहिए उस समय वह भोक्ता जो प्रथम आहुति दे उसे" प्राणाय स्वाहा "कहकर दे" इत्यादि में भी प्राणाहुति के आधार रूप से वैश्वानर की ही प्रतीति होती है। तथा वाजसनेय सहिता में इस वैश्वानर आत्मा को जीव शरीर का अभ्यन्तर्वर्त्ती भी कहा गया है—"जो पुरुष के देहान्तर्वर्ती पुरुषाकृति वैश्वानर अग्नि को जानते हैं।" इस प्रकार अग्नि के साथ अभेद रूप से निर्देश, अग्नित्रय रूप से कल्पना, प्राणाहुति की अधिकरणता तथा शरीराभ्यंतर स्थिति आदि से वैश्वानर, जाठराग्नि ही प्रतीति होता है, एकमात्र परमात्मा ही वैश्वानर शब्दाभिधेय नहीं है। तत्र-तथा दृष्ट्युपदेशात्-पूर्वोक्तस्य त्रैलोक्य शरीरस्य परस्य ब्रह्मणो वैश्वानरस्य जाठराग्निशरीरतया तद्विशिष्टस्योपासनो- पदेशात् । अग्निशब्दादिभिर्हि न केवलो जाठरः प्रतिपाद्यते, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट. परमात्मा । कथमिदमवगम्यत इति चेत्-- असंभवात् जाठरस्य केवलस्य त्रैलोक्यशरीरत्वासंभवात् । त्रैलोक्य- शरीरतया प्रतिपन्नवैश्वानर समानाधिकरणो जाठर विषयतया प्रतीयमानोऽग्निशब्दो जाठरशरीरतया तद् विशिष्टं परमात्मानमे- वाभिद धतीत्यर्थः । यथोक्तं भगवता- "अहं वैश्वानरोभूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः, प्राणापान समायुक्त. पचाम्यन्नं चतुर्विधम् "इति जाठरानल शरीरो भूत्वेत्यर्थः । अतः तद्विशिष्टस्योपासनमत्रोप- दिश्यते । कि च-पुरुषमपिचैनमधीयते वाजसनेयिनः "स एषोऽग्नि- वैश्वानरो यत्पुरुषः" इति; नहि जाठरस्य केवलस्य पुरुषत्वम्,

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( ४४६ ) परमात्मन एव हि निरुपाधिकं पुरुषत्वं यथा-“सहस्रशीर्षापुरुषः” पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादौ । उक्त शंका असंगत है, जाठराग्नि का परमात्मा की दृष्टि से ही उपदेश किया गया है, अर्थात् त्रैलोक्य शरीरधारी के रूप से परब्रह्म को, वैश्वानर कहा गया है, जाठराग्नि उनका शरीर स्थानीय है, इसी दृष्टि से, जाठराग्नि विशिष्ट रूप का उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है। अग्नि आदि शब्द केवल जाठराग्नि बोधक ही नहीं हैं, अपितु जाठराग्नि विशिष्ट रूप परमात्मा के भी बोधक है। यदि कहो कि, ऐसा कैसे समझें तो केवल जाठराग्नि में, त्रिलोकी शरीरत्व संभव नहीं है। त्रैलोक्य शरीर विशिष्ट रूप से प्रतिपन्न, वैश्वानर के साथ, सामानाधिकरण्य रूप से प्रयुक्त, यदि कोई शब्द, जाठराग्नि अर्थ का बोधक हो तो भी, यही समझना चाहिए कि-जाठराग्नि परमात्मा का शरीर है और वह परमात्मा का ही बोधक है, जैसा कि भगवान ने स्वयं कहा है-“मैं वैश्वानर होकर प्राणियों के शरीर में आश्रित हूँ, प्राण अपान वायु से संयुक्त होकर चार प्रकार के खाद्यों का परिपाक करता हूँ” उक्त वाक्य में जाठराग्नि विशिष्ट ही उपास्य बतलाए गए हैं। वाजसनेय में इन्हें ही पुरुष रूप बतलाया गया है-“यह वैश्वानर अग्नि ही पुरुष हैं।” केवल जाठराग्नि मात्र, पुरुष नहीं हो सकता एकमात्र परमात्मा को ही पुरुष रूप से स्मरण किया गया है-” सहस्रशीर्षापुरुषः “पुरुष एवेदं सर्वम्” इत्यादि । अतएव न देवता भूतञ्च।१।२।२८॥ उक्तेभ्य एव हेतुभ्यो देवतायाश्च ‘तृतीयस्य’ महाभूतस्यापि न वैश्वानरत्व प्रसंगः । उक्त कारणों से ही, वैश्वानर शब्द, देवता या तृतीय महाभूत अग्नि का भी, वाचक नहीं है। साक्षादप्यविरोधं जैमिनिः ।१।२।२९॥ वैश्वानरसमानाधिकरणस्याग्निशब्दस्य जाठराग्नि शरीरतया तद् विशिष्टस्य परमात्मनो वाचकत्वं, तथैव परमात्मन उपास्यत्व ankurnagpal108@gmail.com

( ४५० )

चोक्तम् । जैमिनिस्त्वाचार्यो वैश्वानर शब्दवदग्निशब्दस्यापि परमात्मन एव साक्षात् अव्यवधानेन वाचकत्वे न कश्चिद् विरोध इति मन्येत । अग्नि शब्द का वैश्वानर के साथ, अभेदभाव निर्दिष्ट होते हुए भी, जाठराग्नि शरीर होने से, तद्विशिष्ट परमात्मा का ही वाचक हो सकता है । वैसे ही परमात्मा के रूप को, उपास्य भी कहा गया है। जैमिनि आचार्य, वैश्वानर शब्द की तरह, अग्नि शब्द का भी, परमात्मा से, साक्षात् संबंध मानते हैं, और वाचकता में कोई विरोध नहीं समझते । एतदुक्तं भवति, यथा वैश्वानर शब्दः साधारणोऽपि परमा- त्माऽसाधारणधर्मविशेषितो विश्वेषां नराणां नेतृत्वादिना गुणेन परमात्मानमेवाभिदधातीति निश्चीयते, एवमग्निशब्दोऽप्यग्रनयना- दिना येनैवगुणेन योगाज्ज्वलने वर्तते, तस्यैव गुणस्य निरुपाधिकस्य काष्ठागतस्य परमात्मनि सम्भवादस्मिन् प्रकरणे परमात्माऽसाधा- रण विशेषितः परमात्मानमेवाभिधत्त इति । जैसे कि वैश्वानर शब्द, साधारण और अविशिष्ट होते हुए भी परमात्मा के असाधारण विशिष्ट धर्मों से, विशेषित होकर, समस्त जीव समुदाय के नेता परमात्मा, का वाचक है; उसी प्रकार “अग्नि” शब्द भी “आगे ले जाने वाला” व्युत्पत्ति के अनुसार नेतृत्व गुणवाला है । परमात्मा का यह स्वाभाविक गुण है; इस प्रकरण में परमात्मा के असाधारण गुणों से विशेषित होने से, वह अग्नि भी परमात्मा बोधक ही है । “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रमभिविमानं” इत्यपरिच्छिन्नस्य परस्य ब्रह्मणो द्युप्रभृतिपृथिव्यन्त प्रदेश संबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कथमुपपद्यते ?—तत्राह— शंका की जाती है कि— 'वह प्रादेश मात्र में ही परिमित नहीं है', इस श्रुति वाक्य में कहे गए अपरिच्छिन्न परब्रह्म की, द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त परिणाम परिच्छिन्नता कैसे हो सकती है ? इसका उत्तर देते हैं—

( ४५१ ) अभिव्यक्तेरित्याश्मरथ्यः ।१।२।३०॥ उपासकाभिव्यक्त्यर्थं प्रादेशमात्रत्वं परमात्मन् इत्याश्मरथ्य आचार्यो मन्यते । “द्यौर्मूर्धा आदित्यश्चक्षुः, वायुः प्राणः, आकाशो मध्यकायः आपोबस्तिः, पृथिवी पादौ,” इति द्युप्रभृतिप्रदेशसंबन्धिन्या मात्रया परिच्छिन्नत्वं कृत्स्नमभिव्याप्तवता विगतमानस्य ह्यभिव्यक्ते- रेव हेतुर्भवति । उपासकों की अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए, परमात्मा का प्रादेश मात्र रूप, शास्त्रों में वर्णन किया गया है; ऐसा आश्मरथ्य आचार्य का मत है। “द्युलोक सिर, सूर्य नेत्र, वायु प्राण, आकाश मध्य शरीर, जल बस्ति, पृथिवी चरण,” इत्यादि वाक्य में, द्युलोक आदि प्रदेशों से संबंधित प्रदेशगत परिमाण द्वारा, सर्वव्यापी परमात्मा की, जो परिच्छिन्नता बतलाई गई है, वह अभिव्यक्ति सामर्थ्य के लिए ही है। मूर्ध प्रभृत्यवयवविशेषैः पुरुषविधत्वं परस्य ब्रह्मणः किमर्थ- मिति चेत्—तत्राह— सिर आदि अवयव विशेषों से युक्त पुरुष रूप का विधान परमात्मा के लिए क्यों किया गया है ? इस शंका का समाधान करते हैं— अनुस्मृतेर्बादरिः ।१।२।३१॥ तथोपासनार्थमिति बादरिराचार्यो मन्यते ।” यस्त्वेतमेवम-

  • भिविमानमात्मानमात्मानं - वैश्वानरमुपास्ते स सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेषु आत्मसु अन्नंमत्ति” इति ब्रह्म प्राप्तये ह्युपासनमुपदिश्यते एतमेवमिति-उक्त प्रकारेण पुरुषाकारमित्यर्थः । सर्वेषु लोकेषु, सर्वेषु भूतेषु, सर्वेष्वात्मसु वर्त्तमानं यदन्नं भोग्यं तदत्ति-सर्वत्र वर्त्तमानं स्वत एवानवधिकातिशयानन्दं ब्रह्मानुभवति । यत्तु सर्वैः कर्मवश्यैरात्मभिः प्रत्येकमनन्यसाधारणमन्नंभुज्यते तन्मुमुक्षुभिस्त्या- ज्यत्वादह्रि न गृह्यते ।

( ४५२ ) परब्रह्म का पुरुष रूप से वर्णन उपासना के लिए किया गया है, ऐसा बादरि आचार्य का मत है। "जो सर्वतो भाव से अपरिमित इस वैश्वानर आत्मा की पुरुषाकार रूप से उपासना करता है, वह व्यक्ति समस्त लोकों में समस्त भूतों में, समस्त आत्माओं में वर्त्तमान जो भोग्य अन्न है, उनको भोगता है" इत्यादि में उपासना को ही ब्रह्म प्राप्ति का उपाय बतलाया गया है। "एतमेवम्" का तात्पर्य है ऐसे पुरुषाकार। सब लोक समस्त भूत और समस्त आत्माओ के वर्त्तमान अन्न के भोग का तात्पर्य है कि-सर्वत्र अवस्थित निरतिशय असीम आनंद स्वरूप ब्रह्म की अनुभूति करता है। यदि अर्थ करें कि-कर्माधीन आत्माओं से मुक्त साधारण भोगों को भोगता है, तो समीचीन न होगा; मुमुक्षुओं के लिए ये भोग त्याज्य हैं। यदि परमात्मा वैश्वानरः, कथंतर्हि उरः प्रभृतीनां वेद्यादित्वो- पदेशः ? यावताजाठराग्नि परिग्रह एवैतदुपपद्यत ? इत्यत्राह- यदि परमात्मा ही वैश्वानर है, तो उर इत्यादि का वेदी इत्यादि के रूप में उपदेश क्यों किया गया है ? वेदी इत्यादि के वर्णन से तो यही ज्ञात होता है कि-जाठराग्नि का ही वर्णन है इस संशय का उत्तर देते हैं- सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ॥१।२।३२॥ अस्य परमात्मन एव वैश्वानरस्य द्युप्रभृतिपृथिव्यंत शरीरस्य समाराधनभूतायाः उपासकैरहरहः क्रियमाणायाः प्राणाहुतेरग्नि होत्रत्वसंपादनायायमुरः प्रभृतीनां वेदित्वाद्युपदेश, इति जैमिनिरा- चार्यो मन्यते । द्युलोक से पृथ्वी पर्यन्त जिसका शरीर है, उस वैश्वानर परमात्मा की ही, उपासक, नित्य प्राणाहुति रूप से, उपासना करते हैं। उसी प्राणाहुति अग्निहोत्र को साधारण रूप से बतलाने के लिए उर आदि को बेदी आदि रूप से वर्णन किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है। तथाहि-परमात्मोपासनोचितमेव फलं प्राणाहुत्या अग्निहोत्र- सम्पत्ति च दर्शयतीयं श्रुतिः । "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति, ankurnagpal108@gmail.com

  • र्धै or र्धा? 'र्धा' (vertical line with aa-matra).
  • दि (da with i-matra). Now look at the next letter: Is it 'या' or 'पा'? Wait! Look at the bottom: it is rounded like 'प'. Wait, why did I think 'या'? Let's look at the left part of this letter: Does it have the curly front of 'य'? Wait, look at 'या' in 'नामधेयानुपासक': In 'नामधेया': the 'य' bulges to the left, goes in, then goes down. In this letter in मूर्धादि...: It starts from the top line, goes straight down, curves at the bottom to the right, and goes up to the vertical line! Wait! It's a 'प'! Wait, why does it look slightly like 'य'? Because the ink on the left side of the 'प' has a tiny irregularity or slight slant, but it is definitely 'पा'! Wait, look at the next letter: 'दां' (da with aa-matra and anusvara). Then 'ते' (ta with e-matra). Then 'षु' (shha with u-matra). "मूर्धादिपादांतेषु" - of course! Head to feet: "मूर्धादि-पादान्तेषु"! That makes 100% sense both visually

( ४५२ ) परब्रह्म का पुरुष रूप से वर्णन उपासना के लिए किया गया है, ऐसा बादरि आचार्य का मत है। "जो सर्वतो भाव से अपरिमित इस वैश्वानर आत्मा की पुरुषाकार रूप से उपासना करता है, वह व्यक्ति समस्त लोकों में समस्त भूतों में, समस्त आत्माओं में वर्त्तमान जो भोग्य अन्न है, उनको भोगता है" इत्यादि मे उपासना को ही ब्रह्म प्राप्ति का उपाय बतलाया गया है। "एतमेवम्" का तात्पर्य है ऐसे पुरुषाकार। सब लोक समस्त भूत और समस्त आत्माओ के वर्त्तमान अन्न के भोग का तात्पर्य है कि-सर्वत्र अवस्थित निरतिशय असीम आनंद स्वरूप ब्रह्म की अनुभूति करता है। यदि अर्थ करें कि-कर्माधीन आत्माओं से मुक्त साधारण भोगों को भोगता है, तो समीचीन न होगा; मुमुक्षुओं के लिए ये भोग त्याज्य है। यदि परमात्मा वैश्वानरः, कथंतर्हि उरः प्रभृतीनां वेद्यादित्वो- पदेशः ? यावताजाठराग्नि परिग्रह एवैतदुपपद्यत ? इत्यत्राह- यदि परमात्मा ही वैश्वानर है, तो उर इत्यादि का वेदी इत्यादि के रूप में उपदेश क्यों किया गया है ? वेदी इत्यादि के वर्णन से तो यही ज्ञात होता है कि-जाठराग्नि का ही वर्णन है इस संशय का उत्तर देते हैं- सम्पत्तेरिति जैमिनिस्तथा हि दर्शयति ।१।२।३२॥ अस्य परमात्मन एव वैश्वानरस्य द्युप्रभृतिपृथिव्यंत शरीरस्य समाराधनभूतायाः उपासकैरहरहः क्रियमाणायाः प्राणाहुतेरग्नि होत्रत्वसंपादनायायमुरः प्रभृतीनां वेदित्वाद्युपदेश, इति जैमिनिरा- चार्यो मन्यते । द्युलोक से पृथिवी पर्यन्त जिसका शरीर है, उस वैश्वानर परमात्मा की ही, उपासक, नित्य प्राणाहुति रूप से, उपासना करते है । उसी प्राणाहुति अग्निहोत्र को साधारण रूप से बतलाने के लिए उर आदि को बेदी आदि रूप से वर्णन किया गया है, ऐसा जैमिनि आचार्य का मत है । तथाहि-परमात्मोपासनोचितमेव फलं प्राणाहुत्या अग्निहोत्र- सम्पत्ति च दर्शयतीयं श्रुतिः । "स य इदमविद्वानग्निहोत्रं जुहोति, ankurnagpal108@gmail.com

( ४५३ )

यथाङ्गारानपोह्य भस्मनि जुहुयात्तादृक् तत् स्यात्, अथ य एतदेवं विद्वानग्निहोत्रं जुहोति तस्य सर्वेषु लोकेषु सर्वेषु भूतेषु सर्वेष्वा- त्मसु हुतं भवति, तद्यथेषीक तूलमग्नौ प्रोतं प्रदूयेतैवं हास्य सर्वे पाप्मानः प्रदूयन्ते” इति । परमात्मोपासना के उचित फल तथा प्राणाहुति रूप अग्निहोत्र सम्पादन के प्रदर्शन करने वाली श्रुति इस प्रकार है-“जो इस वैश्वानर विद्या को न जाकर आहुति देता है, उसकी आहुति अंगारा रहित भस्म में दी गई आहुति के समान है, जो इसके रहस्य को जानकर अग्निहोत्र करता है, उसकी समस्त लोक, समस्त भूत और समस्त आत्माओं में आहुति हो जाती है। जैसे कि—सींक अगला हिस्सा अग्नि में घुसा देने पर तत्काल जल जाता है वैसे ही, रहस्य को जानकर अग्निहोत्र करने वाले के पाप भस्म हो जाते हैं।” आमनन्ति चैनमस्मिन् ।१।२।३३॥ एनं परं पुरुषं द्युमूर्धत्वादिविशिष्टं वैश्वानरं, अस्मिन् उपासक शरीरे प्राणाहुत्याधारत्वाय आमनन्ति च-“तस्य हवा एतस्यात्मनो वैश्वानरस्य मूर्धैव सुतेजाः” इत्यादिना । अयमर्थः “यस्त्वेतमेवं प्रादेशमात्रममिविमानमात्मानं वैश्वानरमुपास्ते” इति त्रैलोक्य- शरीरस्य परमात्मनो वैश्वानरस्योपासनं विधाय “सर्वेषु लोकेषु” इत्यादिनाब्रह्मप्राप्ति च फलमुपदिश्य, अस्यैवोपासनस्यांगभूतम् प्राणाग्निहोत्रं “तस्य ह वा एतस्य” इत्यादिनापदिशति, यः पूर्वमुपा- स्यतयोपदिष्टो वैश्वानरस्तस्यावयवभूत अद्न्यादित्यादीन् सुतेजो- विश्वरूपादिनामधेयानुपासक शरीरे मूर्धादियादांतेषु संपादयति । मूर्धैव सुतेजाः-उपासकस्य मूर्धैव परमात्ममूर्धभूता द्यौरित्यर्थः । चक्षुर्विश्वरूप आदित्य इत्यर्थः प्राण पृथग्वर्त्मा वायुरित्यर्थः । संदेहो बहुलः-उपासकस्य मध्यकाय एव परमात्ममध्यकायभूत आकाश इत्यर्थः । पृथिव्येव पादौ-अस्य पादावेवतत्पादभूता पृथिवी इत्यर्थः । ankurnagpal108@gmail.com

( ४५४ ) "इस वैश्वानर आत्मा का मस्तक ही सुतेजा (द्युलोक) है" इत्यादि श्रुति में भी, द्युलोक आदि रूप मस्तक आदि विशेषणों से विशेषित उस परम पुरुष वैश्वानर को उपासक के शरीर मे, प्राणाहुति के आधार रूप से बतलाया गया है । इसका तात्पर्य है कि- "जो लोग सर्वव्यापी वैश्वानर आत्मा की प्रादेशमात्र में परिमित उपासना करते है" इस श्रुति मे त्रैलोक्य शरीरधारी वैश्वानर परमात्मा की उपासना का उपदेश देकर "सर्वेषु लोकेषु" इत्यादि में-ब्रह्म प्राप्ति रूप, उपासना के फल का उल्लेख करके, "तस्य ह वा एतस्य" इत्यादि में, उपासना के अंगभूत अग्निहोत्र का उपदेश दिया गया है । इसी प्रकार, पहिले जो वैश्वानर का, उपास्य रूप से उपदेश दिया गया है, उनमें भी वैश्वानर के अवयव स्थानीय, सुतेज और विश्वरूपादि नामक आदित्य आदि की, उपासक के शरीर में, मस्तक से पैर तक, अवयवों के रूप में कल्पना की गई है । "मूर्धैव सुतेजः" यह ही परमात्मा का मस्तक स्थानीय द्युलोक है। "चक्षुः विश्वरूपः" अर्थात् उपासक के नेत्र ही, परमात्मा के नेत्र स्थानीय आदित्य है । "प्राण पृथग् वर्त्मा" अर्थात् प्राणवायु ही प्राण है । "संदेहो बहुलः" अर्थात् उपासक का मध्य काय ही परमात्मा का मध्य कायस्थ आकाश है । "पृथिव्येव पादौ" अर्थात् उपासक के पैर ही, परमात्मा की पादरूप पृथिवी है । एवमुपासकः स्वशरीरे परमात्मानं त्रैलोक्यशरीरं वैश्वानरं सन्निहितमनुसंधाय स्वकीयान्युरोलोमहृदयमनआस्यानि प्राणाहुत्या- धारस्य परमात्मनो वैश्वानरस्य वेदिर्बहिगार्हपत्यान्वाहार्यपचाहव- नीयानग्निहोत्रोपकरणभूतान् परिकल्प्य प्राणाहुतेश्चाग्निहोत्रत्वं परिकल्प्यैवं विधानेन प्राणाग्निहोत्रेण परमात्मानं वैश्वानरमाराधये- दिति "उर एव वेदिर्लोमानि बर्हिर्हृदयं गार्हपत्यः" इत्यादिनाेप- दिश्यते । अतः परमात्मा पुरुषोत्तम एव वैश्वानर इति सिद्धम् । इस प्रकार उपासक, त्रैलोक्य शरीर वैश्वानर परमात्मा को अपने ही शरीर में संलग्न मानकर, अनुसंधान करते हुए, अपने वक्ष-लोम-

( ४१५ ) हृदय-मन आदि को, प्राणाहुति के अधिकरण स्थानीय वैश्वानर परमात्मा की, वेदि-बर्हि-गार्हपत्य-आहवनीय- अन्वाहार्यपचन आदि की, अग्निहोत्र यज्ञीय उपकरण रूप से तथा प्राणाहुति की अग्निहोत्र रूप से परिकल्पना करके, उक्त प्रकार की प्राणाहुति द्वारा, वैश्वानर परमात्मा की आराधना करे, यही उपदेश “वक्ष ही वेदी, लोम ही बर्हि (कुश) हृदय ही गार्हपत्य है” इत्यादि श्रुति में दिया गया है। इससे सिद्ध होता है कि पुरुषोत्तम परमात्मा ही वैश्वानर है । ॥ द्वितीय पाद समाप्त ॥

[ प्रथम अध्याय ] [ तृतीय पाद ] १ द्युभ्वाद्यधिकरणः— द्युभ्वाद्यायतनं स्वशब्दात् ॥१।३।१॥ आथर्वणिका अधीयते "यस्मिन् द्यौः पृथिवी चान्तरिक्षमोतंम- नस्सह प्राणैश्च सर्वैः, तमेवैकं जानथात्मानमन्या वाचो विमुंचथ अमृतस्यैष सेतुः" इति । तत्र संशयः किमयं द्युपृथिव्यादीनामायतनत्वेन श्रूयमाणो जीवः, उत परमात्मा ? इति किं युक्तम् ? जीव इति कुतः ? "अरा इव रथनाभौ संहता यत्र नाड्यस्स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः" इति परस्मिन् श्लोके पूर्ववाक्य प्रस्तुतं द्युपृथिव्याद्यायतनं “यत्र” इति पुनरपि सप्तम्यन्तेन परामृश्य तस्य नाड्याधारत्वमुक्त्वा, पुनरपि “स एषोऽन्तश्चरेत बहुधा जायमानः” इति तस्य बहुधा जायमानत्वं चोच्यते । नाडी संबंधो देवादिरूपेण बहुधा जायमानत्वं च जीवस्यैव धर्मः । अस्मिन्नपि श्लोके “ओतं मनस्सह प्राणैश्च सर्वैः” इति प्राणपंचकस्य मनश्चाश्रयत्वमुच्यमानं जीवधर्मएव एवं जीवत्वे निश्चिते सति द्युपृथिव्याद्यायतनत्वादिकं यथा कथंचित् संगमयितव्यम्-इति । आथर्वणिक मुंडकोपनिषद में प्रसंग आता है कि—“जिसमें स्वर्ग, पृथ्वी और अंतरिक्ष तथा प्राणों सहित मन गुंथा हुआ है, उसी एक सबके आत्मस्वरूप को जानो, दूसरी बातों को सर्वथा छोड़ दो, वही अमृत सेतु हैं ।” ankurnagpal108@gmail.com