श्रीभाष्य (भगवद् रामानुजाचार्य - विशिष्टाद्वैत वेदान्त ब्रह्मसूत्र महाभाष्य सटीक)
Sri Bhashya of Bhagavad Ramanujacharya with Commentary
भगवद् रामानुजाचार्य (सम्पादक: स्वामी वासुदेवाचार्य) द्वारा
इस पर संशय होता है कि-द्युभू आदि का आयतन, जीवात्मा है अथवा परमात्मा ? कह सकते हैं कि-जीवात्मा है-क्यों कि-'रथकी नाभि में जुड़े हुए अरों की भांति, जिसमें समस्त देहव्यापिनी नाड़ियाँ एकत्र स्थित है, वह बहुत प्रकार से उत्पन्न होने वाला, मध्य भाग में रहता है" इस बाद के श्लोक में, पूर्व श्लोक में प्रस्तुत द्युपृथिवी आदि के आयतन को ही "यत्र" शब्द से पुनः नाड़ियों का आधारभूत बतलाकर पुनः"स एषोऽन्तश्चरते बहुधा जायमानः" से उसी का अनेक रूपों में उत्पन्न होना बतलाया गया है। नाड़ियों से संबंधित, देहादि रूप से प्रायः जन्म लेना, जीव का ही धर्म है । पूर्व श्लोक में "मनस्सह प्राणैश्च सर्वैः" इत्यादि में, पंचप्राण समन्वित मनको जिसका आश्रय कहा गया है वह भी जीव ही प्रतीत होता है, क्योंकि, यह भी जीव का ही धर्म है । इस प्रकार जीवत्व के निश्चित हो जाने पर, द्युपृथिवी आदि का आयतन, जीव को ही मानना संगत होगा । सिद्धान्तः—एवं प्राप्ते प्रचक्ष्महे—द्युभ्वाद्यायतनंस्वशब्दात्- द्युपृथिव्यादीनामायतनं परं ब्रह्म, कुतः ? स्व शब्दात्—परब्रह्मासा- धारण शब्दात् । “अमृतस्यैष सेतुः" इति परस्य ब्रह्मणोऽसाधारण शब्दः । “तमेवं विद्वान् अमृत इह भवति, नान्यः पन्था अयनाय विद्यते" इति सर्वत्रोपनिषत्सु स एवामृतत्वप्राप्ति हेतुः श्रूयते । सिनोतेश्च बधनार्थत्वात् सेतुः, अमृत्य प्रापक इत्यर्थः. सेतुरिव वा सेतुः-नद्यादिषु सेतुर्हि कूलस्य प्रतिलम्भकः, संसाराणर्वपारभूतस्यामृ- त्येष प्रतिलम्भक इत्यर्थः । द्युभू आदि के आयतन परमात्मा ही हैं, क्यों कि-उक्त प्रसंग में परब्रह्म के द्योतक असाधारण विशेषणों का प्रयोग किया गया है । “अमृत का सेतु" शब्द परब्रह्म की असाधारण विशेषता का द्योतक है । "उनके इस रूप को जानकर इस लोक में ही अमृत हो जाते हैं, इसके अतिरिक्त जीवनयात्रा का कोई दूसरा मार्ग नहीं है" इत्यादि उपदेश प्रायः सभी उपनिषदों में दिया गया है, जिसमें परमात्मा को ही अमृतत्व प्राप्ति का हेतु बतलाया गया है । 'सिञ्.' धातु का बंधन अर्थ होने से सेतु शब्द का
'. Wait! 'शि' has the matra 'ि' on the left. Then 'श' has a vertical bar on the right. Then... wait, what is to the right of 'शि'? There is a letter! Wait, look at the top: There is:
- Matra of 'ि'
- 'श'
- Another letter? Wait, let's look at: “तस्याशिश-” Wait! In the image: “ त स्या शि Then there is ANOTHER 'श' or 'ख'??? Wait! Let's look at the image provided by user: Line 9: “सन्ततं सिराभिस्तु लम्बत्या कोशसंन्निमम्” इत्यारभ्य “तस्याशिश- Wait! Look at the original text in the image: Look at: “तस्या Then: शि Then: श- Wait, why does it look like 'श'? Wait, could it be: 'शि' followed by 'ख'? Wait, look at the top: Is there a 'ख'? Let's look at the shape: It has a loop at top left. A curve down. A loop up. And a vertical bar. Wait, that is 'ख'! Wait, does it have an 'ा' (aa matra)? No, it does NOT have an 'ा' matra! Wait, but line 10: Does line
श्रुति में—देवादि जीवों के अनायास आश्रय के लिए, परंपुरुष परमेश्वर स्वकीय विशेषताओं सहित, स्वेच्छा से विभिन्न जातीय रूप-आकृत-गुण और कर्मों से समन्वित होकर अनेक जन्म धारण करते हैं। ऐसा स्पष्ट उल्लेख है। स्मृति में भी जैसे—“अजन्मा और अव्यय समस्त भूतों का स्वामी मैं अपनी प्रकृति के साहाय्य से अपनी माया के प्रभाव से अनेक रूपों में प्रकट हो जाता हूँ'' इस प्रकार जीव के भोगोपकरण मन आदि की आश्रयता और सर्वाधारकता, परब्रह्म की ही बतलाई गई है। इतश्च परमपुरुषः—इसलिए भी परंपुरुष आयतन हैं कि— मुक्तोपसृप्यव्यपदेशाच्च ।१।३।२॥ अयं द्युपृथिव्याद्यायतनभूतः पुरुषः संसारबंधान्मुक्तै रपि प्राप्यतया व्यपदिश्यते “यदा पश्यः पश्यते रुक्मवर्णं कर्त्तारमीशं पुरुषं ब्रह्मयो- निम्, तदा विद्वान् पुण्यपापे विधूय निरंजनः परमं साम्यमुपैति” “यथानद्यः स्यदमानाः समुद्रे अस्तं गच्छंति नामरूपे विहाय, तथा विद्वान् नामरूपादविमुक्तः परात्परं पुरुषमुपैति दिव्यम्” इति । संसारबंधनाद् विमुक्ता एव हि विधूतपुण्यपापा निरंजना नाम- रूपाभ्यां विनिर्मुक्ताश्च । पुण्यपापनिबंधनाचित् संसर्ग प्रयुक्तनामरूप- भाक्त्वमेव हि संसारः । अतो विधूतपुण्यपापैः निरंजनै प्रकृतिसंसर्ग रहितैः परेण ब्रह्मणा परमं साम्यमापन्नैः प्राप्यतया निर्दिष्ट द्यु पृथिव्याद्यानभूतः, परंब्रह्मैव । सांसारिक बंधनों से मुक्त जीवों के लिए भी, स्वर्ग पृथ्वी आदि के आयतन परंपुरुष ही प्राप्य कहे गए हैं—“जब यह द्रष्टा (जीवात्मा) सब के शासक ब्रह्मा के भी आदि कारण, संपूर्ण जगत के रचयिता, दिव्य प्रकाश स्वरूप परं पुरुष का प्रत्यक्ष कर लेता है, उस समय पुण्यपाप दोनों से मुक्त, निर्मल वह ज्ञानी महात्मा, सर्वोत्तम समता प्राप्त कर लेता है”—जैसे कि बहती हुई नदियाँ, नाम रूप छोड़कर समुद्र में विलीन हो जाती हैं, वैसे ही ज्ञानी महात्मा, नामरूप रहित होकर, उत्तमोत्तम दिव्य पुरुष परमात्मा को प्राप्त हो जाता है । “अर्थात् जो सांसारिक
( ४६० ) बंधनों से मुक्त होते हैं वे ही पुण्य पापों से मुक्त निरंजन, तथा नाम रूप से विमुक्त हैं। पुण्यपाप निबंधक अचित् (जड) संसर्ग से होने वाली नामरूप की अस्मिता (अर्थात् यह मेरा नाम, यह मेरा रूप है) ही संसार है। पुण्यपाप रहित निरंजन-प्रकृति संसर्ग शून्य, परब्रह्म के साथ अत्यंत साम्यता को प्राप्त पुरुष के लिए, प्राप्य रूप से जिनका निर्देश किया गया है, वह, स्वर्ग पृथ्वी आदि आयतन परं पुरुष परमात्मा ही हैं। परब्रह्मासाधारणशब्दादिभिः परमेव ब्रह्मेति प्रसाध्य, प्रत्यगा- त्मा साधारणशब्दाभावाच्चायं पर एव-इत्याह- जो परमात्म बोधक असाधारण शब्दों का उल्लेख, द्युभू आदि प्रकरण में है, वह परब्रह्म का ही है, इस सिद्धान्त का निर्णय करके-अब सिद्धान्त भी पुष्टि करेंगे कि—इस प्रकरण में किसी भी ऐसे साधारण शब्द का प्रयोग नहीं है कि जिससे जीवात्मा को आयतन माना जा सके; यह परमात्मा ही आयतन है इत्यादि— नानुमानमतच्छब्दात् प्राणभृच्च ।१।३।३॥ यथाऽस्मिन् प्रकरणे प्रतिपादक शब्दाभावात् प्रधानं न प्रति- पाद्यम्, एवं प्राणभृदपीत्यर्थः । अनुमीयत इति अनुमानं परोक्तं प्रधानमुच्यते, अनुमानप्रमितत्वादानुमानमिति वा, अतच्छब्दात् तद् वाचिशब्दाभावा दित्यर्थः । “अर्थाभावे यदव्ययम्” इत्यव्ययीभावः । जैसे कि—इस प्रकरण में एक भी ऐसा शब्द नहीं मिलता, जिससे कि—प्रधान प्रकृति का आयतन रूप से प्रतिपादन हो सके, वैसे ही जीवात्मा बोधक शब्दों का भी अभाव है। सांख्यशास्त्र में प्रधान को आनुमानिक कहा गया है, क्योंकि यह अनुमान से ही प्रतिपादित है [अर्थात्-जीवात्मा ने, जिस अप्रत्यक्ष शक्ति द्वारा अपने को अभिभूत परवश माना उसे ही संसार बंधन का “प्रधान” कारण माना, स्वभावगत होने से उसे “प्रकृति” कहा तथा जीवात्मा पर शासन करने वाली “माया” समझा, ये सब कुछ अनुमान ही मात्र है अतत् शब्दात् का तात्पर्य है, उस प्रधान संबंधी शब्दों का अभाव । पाणिनीय व्याकरण के ankurnagpal108@gmail.com
( ४६१ ) नियम “अर्थाभावे यदव्ययम्” के अनुसार “अतच्छब्दात्” पद में अव्ययी- भाव समास है । इतश्चायं न प्रत्यगात्मा—इसलिए भी यह जीवात्मा आयतन नहीं है कि-- भेदव्यपदेशात् ।१।३।४॥ “समानेवृक्षे पुरुषो निमग्नोऽनीशया शोचति मुह्यमानः जुष्टं यदा पश्यत्यन्यमीशमस्य महिमानमिति वीतशोकः” इत्यादिभिर्जीवाद् विलक्षणत्वेनायं व्यपदिश्यते । अनीशया भोग्यभूतया प्रकृत्या मुह्य- मानः शोचति जीवः अयं यदा स्वस्मादन्यं सर्वस्येशं प्रीयमाणम्, अस्य ईश्वरस्य महिमानं च निखिलजगन्नियमनरूपं पश्यति, तदावीतशोकोभवति । “शरीर रूपी एक ही वृक्ष पर रहने वाला जीवात्मा, गहरी आसक्ति में डूबा हुआ है असमर्थ होने से वह मोहित हुआ शोक करता है । जब यह भक्तों द्वारा नित्य सेवित, अपने से भिन्न प्रभु को और उसकी महिमा को जान लेता है, तब सर्वथा शोक रहित हो जाता है” इत्यादि में परमात्मा को जीव से विलक्षण बतलाया गया है । उस वाक्य का तात्पर्य है कि-अनीश भोग्यरूप प्रकृति से मोहित जीवात्मा शोक करता है जब यह, अपने से भिन्न सर्वेश्वर की दयालुता महिमा और सर्वजगतनियामकता को देखता है तब शोक रहित हो जाता है । प्रकरणात् १।३।५॥ प्रकरणंचेदं परस्य ब्रह्मण इति “अदृश्यत्वादिगुणको धर्मोक्तेः” इत्यत्रैव प्रदर्शितम् । नाडी संबंधबहुधाजायमानत्वमनः प्राणधार- णैश्च प्रकरणविच्छेदाशंकामात्रमत्र पर्यहाष्मं । यह प्रकरण परब्रह्म के वर्णन का ही है, जैसा कि-‘अदृश्यत्वादि” सूत्र १।२।२१। में दिखलाया गया है । यहाँ केवल नाडी संबंध, बहुधा- जन्म, मनप्राण आदि धारकता इत्यादि कुछ विशेषताओं को जीवात्मा संबंधी मानने की शंका की गई, और उसी का परिहार किया गया । ankurnagpal108@gmail.com
( ४६२ ) स्थित्यदनाभ्याञ्च ।१।३।६।। “द्वा सुपर्णा सप्रजा सखाया समानं वृक्षं परिषस्वजाते, तयोर- न्यः पिप्पलं स्वाद्वत्यनश्नन्नन्यो अभिचाकशीति” इत्येकस्य कर्म- फलादनम्, अन्यस्य च कर्मफलमनश्नत एव दीप्यमानतया शरीरान्त- स्थितिमात्रं प्रतिपाद्यते । तत्र कर्मफलम् अनश्नन् दीप्यमान एव सर्वज्ञोऽमृतसेतुः सर्वात्मा द्युम्वाद्यायतनं भवितुमर्हति, न पुनः कर्म- फलमदन् शोचन् प्रत्यगात्मा, अतोद्यु॒भ्वाद्यायतनं परमात्मेति सिद्धम् । “सदा साथ रहने वाले, परस्पर सख्य भाव रखने वाले, दो पक्षी, एक ही वृक्ष पर रहते है, उन दोनों मे एक वृक्ष के फलों को स्वाद से खाता है, दूसरा-उनका उपभोग न करके, केवल देखता मात्र है।” इत्यादि में एक का कर्मफल भक्षण और दूसरे का भक्षण न करके, एक- मात्र प्रकाशरूप से, स्थित होना बतलाया गया है । इसमें कर्मफल न भोगने वाला प्रकाश स्वरूप ही सर्वज्ञ, अमृत सेतु, सर्वात्मा द्यु पृथ्वी आदि का आयतन हो सकता है; कर्मफल को भोगने वाला दुःखी जीवात्मा उक्त गुणों वाला नहीं हो सकता । इससे सिद्ध होता है कि--द्युपृथ्वी आदि का आयतन परमात्मा ही है । २ भूमाधिकरणः— भूमा सम्प्रसादादध्युपशात् ।१।३।७।। इदमामनन्ति छन्दोगाः “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा, अथ यत्रान्यत्पश्यति अन्यच्छृणोति अन्य- द्विजानाति तदल्पम्” इति । अत्रायंभूमशब्दो भावप्रत्यान्तो व्युत्पा- द्यते । तथा हि पृथिव्यादिषु बहु शब्दः पठ्यते, ततः “पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा” इति इमनिज प्रत्यये कृते “बहोर्लोपोभू च बहोः” इति प्रकृति प्रत्ययोर्विकारे भूमेति भवति । भूमा बहुत्वमित्यर्थः । अत्र ankurnagpall08@gmail.com
( ४६३ ) चायं बहुशब्दो वैपुल्यवाची न संख्यावाची । "यत्रान्यत्पश्यति— तदल्पम्" इत्यल्पप्रतियोगित्व श्रवणात् । अल्पशब्द निर्दिष्ट धर्मि- प्रतियोगि प्रतिपादन परत्वादेव धर्मिपरश्च निश्चीयते न धर्ममात्र- परः । तदेवं भूमेति विपुल इत्यर्थः । वैपुल्यविशेष्यश्चेहात्मेत्यवगतः "तरति शोकमात्मवित्" इति प्रक्रम्य भूमविज्ञानमुपदिश्य "आत्मैवेदं सर्वम्" इति तस्यैवो पसंहारात् । छान्दोग्योपनिषद में कहा गया है कि—"जहाँ कुछ और नहीं देखता, कुछ और नहीं सुनता, कुछ और नहीं जानता, वह भूमा है, किन्तु जहाँ कुछ और देखता, और सुनता, और जानता है, वह अल्प है।" इस वाक्य का प्रयुक्त भूमा शब्द, भावात्मक तद्धित प्रत्यय से बना है । "बहु" शब्द का पाठ पृथिव्यादि शब्द के साथ किया गया है।"पृथ्वादिभ्य इमनिज्वा" इस पाणिनि सूत्र से इमनिज् प्रत्यय करने पर "बहोर्लोपो भूच बहोः" इस पाणिनीय सूत्र से प्रकृति प्रत्यय में, विकार करने पर "भूमा" शब्द निष्पन्न होता है। भूमा शब्द बहुत अर्थ वाला है। बहु शब्द यहाँ पर विपुलतावाची है, संख्यावाची नहीं है । "यत्रान्यत् पश्यति तदल्पम्" इसमें प्रतियोगी रूप से अल्पत्व का उल्लेख किया गया है, इससे सिद्ध होता है कि बहु शब्द विपुलतावाची है जैसे कि—अल्प शब्द, धर्मी अर्थात् अल्पता वाले विशिष्ट पदार्थ का बोधक है, वैसे ही यह भूमा शब्द भी उसके विपरीत अर्थ का प्रतिपादन करता है, इससे ज्ञात होता है कि— भूमा शब्द भी विपुलता वाले विशिष्टपदार्थ धर्मी का प्रतिपादन करता है, यह केवल धर्म (विशेषता) मात्र का प्रतिपादक नहीं है । इस प्रकार भूमा का अर्थ होता है विपुल । विपुलता धर्म से विशेष्य आत्मा ही यहाँ अभिधेय है "आत्मज्ञ पुरुष शोक को पार करता है" इत्यादि से भूमा विज्ञान का उपदेश देकर "यह सारा जगत् आत्म स्वरूप ही है" इत्यादि से उसी भूमा तत्त्व का उपसंहार किया गया है । अत्र संशय्यते—किमयं भूमागुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा उत पर- मात्मा इति । किं युक्तम् ? प्रत्यगात्मेति । कुतः ? "श्रुतं ह्येव में भगवद्दृशेभ्यस्तरति शोकमात्मवित्" इत्यात्मजिज्ञासयोपसेदुषे नार-
( ४६४ ) दाय नामादिप्राण पर्यन्तेषु उपास्यतयोपदिष्टेषु “अस्ति भगवो नाम्नोभूयः” “अस्ति भगवो वाचो भूयः” इत्यादयः प्रश्नाः “वाग्वाव नाम्नोभूयसी” “मनो वाव वाचो भूय.” इत्यादीनि च प्रतिवचनानि, प्राणात् प्राचीनेषु दृश्यन्ते, प्राणे तु न पश्यामः । अतः प्राणपर्यन्त एवायमात्मोपदेश इति प्रतीयते, तेनेह प्राणशब्द निर्दिष्टः प्राण ग्रहचारी प्रत्यगात्मैव न वायु विशेष मात्रम् । “प्राणो ह पिता प्राणो ह माता” इत्यादयश्च प्राणस्य चेतनतामवगमन्ति। “पितृहा मातृहा” इत्यादिना सप्राणेषु पितृप्रभृतिषूपमर्दकारिणि हिंसकत्वनि मित्तो- पक्रोशवचनात्सेष्वविगतप्राणेष्वत्यंतोपमर्दकारिण्यप्युपक्रोशाभाववच्च- नाच्च हिंसायोग्यश्चेतन एव प्राण शब्द निर्दिष्टः । अप्राणेषु स्थाव- रेष्वपि चेतनेषूपमर्दभावाभावयो र्हिंसातदभावदर्शनादयं हिंसा योग्य- तया निर्दिष्टः प्राणः प्रत्यगात्मैव निश्चीयते । उक्त विषय में संशय होता है कि—भूमा गुण विशिष्ट जीवात्मा है या परमात्मा ? कह सकते हैं कि जीवात्मा क्योंकि--“मैंने आप जैसों से सुना है कि-आत्मवेत्ता शोक से पार हो जाता है” आत्मज्ञान के उद्देश्य से आए हुए नारद द्वारा ऐसा प्रश्न करने पर, सनकादि कुमारों ने उन्हें उपास्य रूप से उपदिष्ट नाम से लेकर प्राणतक सभी के विषय में “भगवन् ! नाम से बड़ा कुछ है क्या ?” भगवन् ! वाक्य से बड़ा कुछ है क्या ?” इत्यादि प्रश्नों तथा “नाम से वाक्य बड़ा है— “वाक्य से मन बड़ा है” इत्यादि उत्तरों में जो उपदेश दिया उसमे प्राण के पूर्ववर्त्ती, शब्द, वाक्य आदि का ही उल्लेख किया, प्राण का नही किया, जिससे ज्ञात होता है कि-प्राणतक ही आत्मोपदेश दिया गया [अर्थात् प्राण, नाम आदि सभी से, श्रेष्ठ है, उससे बड़ा कोई नही है] इससे यह भी ज्ञात होता है कि-प्राण का तात्पर्य, केवल वायुमात्र नही है अपितु प्राण शब्द अपने अपने सहचारी जीवात्मा का ही बोधक है। “प्राण ही पिता है, प्राण ही माता है” इत्यादि से प्राण की चेतनता ज्ञात होती है । “पितृहा मातृहा” इत्यादि मे, प्राणवान माता-पिता की मारने वाले की ही. ankurnagpal108@gmail.com
( ४६५ )
हिंसा निमित्तक निन्दा की गई है। उन्हीं माता पिता के प्राणरहित हो
जाने पर, उनकी कपाल क्रिया आदि निर्दयतापूर्ण क्रियाओं की हिंसात्मक
रूप से निंदा नहीं की जाती, हिंसा चेतन की ही होती है, उस चेतन को
ही प्राण शब्द से निर्दिष्ट किया गया है। प्राणवायु रहित निश्चेष्ट
स्थावर पर्वत वृक्षादिकों में भी, चेतनता और अचेतना मान कर हिंसा
और अहिंसा मानी गई है; जिससे निश्चित होता है कि चेतन जीव ही,
प्राणवाची है ।
अतएव च अरनाभि दृष्टान्ताद्युपन्यासेन प्राण शब्द निर्दिष्टः
पर इति न भ्रमितव्यम्, परस्य हिंसाप्रसंगाभावात्, जीवादितरस्य
तद्भोग्यभोगोपकरण भूतस्य कृत्स्नस्याचिद् वस्तुनो जीवायत्तस्थिति-
त्वेन प्रत्यगात्मन्येवारनाभि दृष्टान्तोपपत्तेश्च अयमेव च प्राणशब्द
निर्दिष्टो भूमा “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इति प्रतिवचनस्य
`चाभा
( ४६६ )
तदारंभाय च प्राप्यभूत प्राण शब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्मस्वरूपस्य सुखरूपताज्ञानमुपदिश्य तस्य च सुखस्य विपुलता “भूमात्वेव विजि- ज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्यते तदेवं प्रत्यगात्मन एवाविद्यावियुक्तं रूपं विपुलसुखमित्युपदिष्टमिति “तरतिशोकमात्मवित्” इत्युपक्रमा- विरोधश्च अतोभूमगुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा, यत एवं भूमगुण विशिष्टः प्रत्यगात्मा अतएवाहमर्थेप्रत्यगात्मनि “अहमेवाधस्तादह मुपरिष्टात्” इत्यारभ्य “अहमेवेदं सर्वम्” इति प्रत्यगात्मनो वैभव- मुपदिशति । एवं प्रत्यगात्मत्वे निश्चिते सति तदनुगुणतया वाक्यशेषो नेतव्य इति । प्रसंगतः प्राणविद को अतिवादी बतलाकर “जो सत्यवादी है वही अतिवादी है” इत्यादि में अतिवादी का ही सत्यवादी रूप से पुनरुल्लेख किया गया है। सत्यवादिता का, प्राणोपासना के अंगरूप से उपदेश दिया गया है। “जो इसे विशेष रूप से जान लेता है, तभी सत्य बोलता है” इत्यादि में अवलंबनीय, सत्यवादिता के अंगी प्राण के, यथार्थ तत्त्व विज्ञान का उपदेश दिया गया है। तथा सत्यवादिता के साधन स्वरूप मन, श्रद्धा, निष्ठा एवं प्रयत्न का उपदेश दिया गया है। उक्त तथ्य का ही उपक्रम करते हुए, प्राप्यभूत प्राणशब्द निर्दिष्ट जीवात्मा के स्वरूप की सुख- रूपता ज्ञान का उपदेश देकर उसकी सुख विपुलता “भूमा ही ज्ञातव्य है” इत्यादि में भूमा रूप से ज्ञातव्य बतलाई गई। इससे ज्ञात होता है कि—अविद्या रहित-शुद्ध जीवात्मा के स्वरूप को ही विपुल सुख रूप से उपदेश दिया गया है। “आत्मवेत्ता शोक से छूट जाता है” इत्यादि से उक्त उपक्रम का अविरोध ज्ञात होता है। इससे निश्चित होता है कि भूमागुण विशिष्ट जीवात्मा ही है। ऐसे भूमागुण विशिष्ट जीवात्मा के अहमर्थ का भी “मैं ही ऊपर मैं ही नीचे” से लेकर “मैं ही सब कुछ हूं” तक भूमात्व बतलाया गया है। इस प्रकार जीवात्मा का भूमात्व निश्चित हो जाने पर, वाक्य शेष का भी तदनुरूप ही अर्थ करना चाहिए। सिद्धान्तः—एवं प्राप्तेऽभिधीयते—भूमासंप्रसादादध्युपदेशात्— भूमगुण विशिष्टो न प्रत्यगात्मा, अपितु परमात्मा, कुतः ? संप्रसा-
( ४६७ ) दादभ्युपदेशात् संप्रसादः-प्रत्यगात्मा "एष संप्रसादोऽस्माच्छरीरा- त्समुत्थाय परं ज्योति रूपसंपद्य स्वे रूपेणाभिनिष्पद्यते" इत्युपनिषद प्रसिद्धेः । संप्रसादात् प्रत्यगात्मनोऽधिकतया भूमविशिष्टस्य सत्य- शब्दाभिधेयस्योपदेशादित्यर्थः । सत्यशब्दाभिधेयं च परं ब्रह्म । उक्त संशय पर सूत्रकार "भूमासंप्रसादादध्युपेशात्" सूत्र बनाते हैं। अर्थात् भूमागुण विशिष्ट जीवात्मा नहीं है अपितु परमात्मा है। उक्त प्रसंग में, संप्रसाद से अधिक श्रेष्ठ भूमा का वर्णन किया गया है। संप्रसाद, जीवात्मा के लिए प्रयुक्त है जैसा कि--"यह संप्रसाद इस शरीर से उठकर, परंरूप को प्राप्त कर, स्वकीय तेजोमय रूप से संपन्न हो जाता है" इस उपनिषद् में प्रसिद्ध है। संप्रसाद जीवात्मा से अधिक सत्य शब्दाभिधेय भूमागुण विशिष्ट का उपदेश दिया गया है; सत्य शब्द से अभिधेय, एक मात्र परब्रह्म ही है। एतदुक्तं भवति-यथा नामादिषु प्राणपर्यन्तेषु पूर्वपूर्वाधिकतयो- त्तरोत्तराभिधानात् पूर्वेभ्य उत्तरेषामर्थान्तरत्वम्, एवं प्राण शब्द निर्दिष्टात् प्रत्यगात्मनोऽधिकतया निर्दिष्टः सत्य शब्दाभिधेयः तस्मादर्थान्तर भूत एव, सत्य शब्द निर्दिष्ट एव भूमेति सत्याख्यं परंब्रह्मैव भूमेत्युपदिश्यते इति । तदाह वृत्तिकारः- "भूमात्वेति- भूमा ब्रह्म नामादिपरम्परया आत्मन ऊर्ध्वमस्योपदेशात्" इति । कथन यह है कि--नाम से लेकर प्राण तक जिसका उल्लेख किया गया है, उसमें पूर्व वस्तु से पर वस्तु को, उत्कृष्ट कहा गया है। जिससे कि पूर्व पदार्थ से पर पदार्थ की पृथकता सिद्ध हो जाती है। उसी प्रकार प्राण शब्द निर्दिष्ट जीवात्मा से अधिक, सत्य शब्दाभिधेय तत्त्व, विशिष्ट स्वतंत्र तत्त्व है। सत्य शब्द से निर्दिष्ट भूमा ही है जो कि सत्य शब्दा- भिधेय परब्रह्म, के पर्याय रूप से वर्णन किया गया है। जैसा कि-- वृत्तिकार कहते हैं--"भूमा को जानो--इत्यादि में जिस भूमा को जानने की बात कही गई है वह, नाम आदि की परम्परा से उत्तरोत्तरो श्रेष्ठ, जीवात्मा से ऊपर की श्रेणी का, बतलाया गया है।" ankurnagpal108@gmail.com
( ४६८ ) प्राणशब्दनिर्दिष्टादधिकतया सत्यस्योपदेशः कथमवगम्यत इति चेत्-“स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति” इति सत्यवेदित्वेनाति वादिनं तु शब्देन पूर्वस्मादतिवादिनो व्यावर्तयति अतएव “एष तु वा अतिवदति” इत्यत्र प्राणादिवादिनो न प्रत्यभिज्ञा । अतोऽस्याति वादित्वनिमित्तं सत्यं पूर्वातिवादित्व- निमित्तात् प्राणादधिकमिति विज्ञायते । यदि पूछो कि—यह कैसे जाना कि—प्राण शब्द से निर्दिष्ट वस्तु से अधिक, सत्य शब्दाभिधेय वस्तु का उपदेश किया गया है ? तो सुनो— “उस पुरुष को ऐसे देखते, मनन करते, जानते हुए, उपासक अतिवादी ( अर्थात् सत्य स्वरूप परमात्मा को बतलाने वाला ) हो जाता है” इस प्रकार प्राणवेत्ता को अतिवादी बतलाकर “यह अतिवादी ही सत्यवादी है” इत्यादि में अतिवादी को सत्यवादी बतलाया गया है। वाक्यगत तु शब्द, पूर्वोक्त अतिवादी शब्द की पुनरावृत्ति का बोधक है। इसीलिए “एष तु वा अतिवदति” इत्यादि मे, प्राणातिवादी शब्द की, अन्यथा अर्थ प्रतीति, नहीं होती। इसी विश्लेषण से ज्ञात होता है कि—पूर्व अतिवादि निमित्तक “प्राण” से, पर अतिवादि निमित्तक “सत्य” वस्तु अधिक है। ननु च प्राणवेदिन एव सत्यवदनमंगत्वेनोपदिष्टम्, अतः प्राण प्रकरणाविच्छेद इत्युक्तम् । नैतद्युक्तम्-तु शब्देन ह्यतिवाद्येवान्यः प्रतीयते, न तु तस्यैवातिवादिनः सत्यवदनांगविशिष्टतामात्रम् । “एष तु वा अग्निहोत्री यः सत्यं वदति” इत्यादिश्वग्निहोत्र्यंतरा प्रतीतेः प्रतीतस्यैवाग्नि होत्रिणः सत्यवदनांगविधानमिति क्लिष्टा गतिराश्रीयते अत्रत्वतिवाद्यन्तरत्वनिमित्तं सत्य शब्दाभिधेयं परं ब्रह्म प्रतीयते । सत्यवादी, प्राणवेदी का ही अङ्ग है, इसीलिए प्राण प्रकरण के साथ इसका वर्णन किया गया है, यह कथन युक्तियुक्त नहीं है। सूत्रस्थ “तु” ankurnagpal108@gmail.com
( ४६६ ) शब्द के प्रयोग से ज्ञात होता है कि—अतिवादी से भिन्न कोई दूसरी वस्तु अवश्य है, ऐसा नहीं है कि-सत्यवादिता, अतिवादी का, एक अङ्ग विशेष मात्र ही है। “वही यथार्थ अग्निहोत्री है जो कि सत्यवादी है” अग्निहोत्र विधायक, प्राण प्रकरण के इस वाक्य से ज्ञात होता है कि-- सत्य वस्तु भिन्न ही है। सत्यवादिता, के अंगरूप से, अग्निहोत्र की कल्पना, क्लिष्ट है। उक्त प्रकरण में, अतिवादी से भिन्नता बतलाने वाली, सत्य शब्द से अभिधेय परब्रह्म की, सुस्पष्ट प्रतीति होती है। सत्य शब्दश्च “सत्यंज्ञानमनंतं ब्रह्म” इत्यादिषु परस्मिन् ब्रह्मणि प्रयुक्तः, अतस्तन्निष्ठस्यातिवादिनः पूर्वस्मादाधिकत्वं सम्भवतीति वाक्यस्वरस सिद्धमन्यत्वं न बाधितव्यम्। सत्य शब्द “सत्यं ज्ञानमनंतं ब्रह्म” इत्यादि में परब्रह्म के लिए ही प्रयोग किया गया है, इसलिए सत्यनिष्ठ अतिवादी, पूर्वोक्त (प्राणविद्) अतिवादी से श्रेष्ठ हो सकता है; वाक्यार्थ से ही स्पष्ट, जो दो अतिवादी की प्रतीति हो रही है, उसमें बाधा देना ठीक नहीं है। अतिवादित्वं हि वस्त्वंतरात् पुरुषार्थतयाऽतिक्रान्तस्वोपास्य वस्तु वादित्वम्। नामाद्याशापर्यन्तोपास्यवस्त्वतिक्रान्तस्वोपास्य प्राणशब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्म वादित्वात् प्राणविदो ऽतिवादित्वम्। तस्यापि सातिशय पुरुषार्थत्वात् निरतिशय पुरुषार्थतयोपास्य परब्रह्मवादिन एव साक्षादतिवादित्वम् “एष तु वा अतिवदति यः सत्येनातिवदति” इत्युक्तम्। सत्येनेतीत्थम्भूतलक्षणे तृतीया, सत्येनपरेणब्रह्मणोपास्येनो- पलक्षितो योऽतिवदतीत्यर्थः। अतएवैवंशिष्यः प्रार्थयते “सोऽहं भगवः सत्येनातिवदानि” इति। आचार्यश्च “सत्यंत्वेव विजिज्ञासितव्यम्” इत्याह। “आत्मनः प्राणः” इति च प्राणशब्दनिर्दिष्टस्य आत्मन उत्पत्तिरुच्यते। अतः “तरतिशोकमात्मवित्” इति प्रक्रान्त आत्मा प्राण शब्द निर्दिष्टादन्य इति गम्यते। ankurnagpal108@gmail.com
( ४७० )
अन्यान्य वस्तुओं की अपेक्षा अपनी उपास्य वस्तु का समधिक उत्कर्ष बतलाना ही अतिवादिता है। पहिले “नाम” से लेकर “दिक्” तक अन्य जो समस्त पदार्थ, उपास्य बतलाए गए हैं, उनमें अन्यों से, प्राण शब्दवाची जीवात्मा उत्कृष्ट उपास्य है, इसीलिए प्राणविद् अति- वादी कहा गया है। प्राण विद् की अतिवादिता, धर्म आदि पुरुषार्थ से श्रेष्ठ पुरुषार्थ है, परंतु निरतिशय पुरुषार्थ रूप से जो परब्रह्म की उपासना करते हैं, वह उस से श्रेष्ठ हैं; यही अतिवादिता है। यही बात “जो सत्यवादी हैं वह अतिवादी हैं” इत्यादि वाक्य से निश्चित होती है। उक्त वाक्यस्थ “सत्येन” पद में जो तृतीया विभक्ति है, वो “इत्थंभूत” अर्थ ज्ञापन करती है, जिसका तात्पर्य है कि—सत्य रूप से उपासनीय, परब्रह्मोपलक्षित, अतिवादी होता है। शिष्य ऐसी ही प्रार्थना करता है— “हे भगवन ! मैं भी वह सत्योपलक्षित अतिवादी हो सकता हूँ ?” उत्तर में आचार्य कहते हैं—“सत्य ही विशेष रूप से जिज्ञास्य है”। “आत्मनः प्राणः” इत्यादि वाक्य में भी, प्राण शब्द निर्दिष्ट आत्मा की उत्पत्ति बतलाई गई है इससे निश्चित होता है कि—आत्मविद् पुरुष शोक से पार हो जाता है” इत्यादि वाक्य का प्रस्तावित आत्मा, प्राण से, पृथक् है। यदुक्तम्— “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इति प्रश्नस्य “अदो वाव प्राणाद्भूयः” इति प्रतिवचनस्य चादर्शनात्प्रक्रांत आत्मोपदेशः प्राणोपदेश पर्यवसानो गम्यत इति, तदयुक्तम्; नहि प्रश्न प्रतिवच- नाभ्यामेवार्थतत्त्वं गम्यते, प्रमाणान्तरेणापि तत्संभवात् । उक्तं च प्रमाणान्तरम् । “अस्ति भगवः प्राणाद्भूयः” इत्यपृच्छतोऽयमभिप्रायः; नामादिष्वाशापर्यन्तेष्वचेतनेषु पुरुषार्थभूयस्तया, पूर्वपूर्वमतिक्रान्तेषु अप्युत्तरोत्तरेषूपदिष्टेषु तत्तद्वेदिनाचार्येणातिवादित्वं नोक्तम् । प्राणशब्द निर्दिष्ट प्रत्यगात्मयाथात्म्यवेदिनस्तु पुरुषार्थभूयस्त्वातिशयं मन्वानेन “स वा एष एवं पश्यन्नेवं मन्वान एवं विजानन्नतिवादी भवति” इति अतिक्रान्तवस्तुवादित्वमुक्तम् । अतोऽत्रैवात्मोपदेशः समाप्त इति मत्वा शिष्योभूयो न पप्रच्छ आचार्यस्त्वेतदपि साति- शयं मत्वा, निरतिश पुरुषार्थभूतं सत्य शब्दाभिधेयं परं ब्रह्म “एष तु
वा अतिवदति यस्सत्येनातिवदति” इति स्वयमेवोपचिक्षेप । शिष्योऽपि परंपुरुषार्थरूपे परस्मिन्ब्रह्मण्युपक्षेप्ते तत्स्वरूपतदुपासन याथात्म्य- बुभुत्सया “ सोऽहम्भगवः सत्येनातिवदानि” इति प्राथंयामास । ततो ब्रह्मसाक्षात्कारनिमित्तातिवादित्वसिद्धये, ब्रह्मसाक्षात्कारोपायभूतं ब्रह्मोपासनं ‘सत्यं त्वेव विजिज्ञासितव्यम्' इत्युपदिश्य तदुपायभूतं ब्रह्ममननम् “मतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्य, श्रवण प्रतिष्ठा- र्थत्वान्मननस्य मननोपदेशेन श्रवणंमर्थसिद्धं मत्वा श्रवणोपायभूतां ब्रह्मणि श्रद्धां “श्रद्धात्वेव विजिज्ञासितव्या” इत्युपदिश्य, तदुपायभूतां च तन्निष्ठाम् “निष्ठा त्वेव विजिज्ञासितव्या इत्युपदिश्य, तदुपाय भूतां च तदुद्योगप्रयत्नरूपां कृतिमपि “कृतिस्त्वेव विजिज्ञासितव्या” इत्युपदिश्य, श्रवणाद्युपक्रमरूपकृति सिद्धये प्राप्यभूतस्य, सत्यशब्दा- भिहितस्य, ब्रह्मणः सुखरूपता ज्ञातव्येति “सुखं त्वेवविजिज्ञासितव्यम्” इत्युपदिश्य, निरतिशयविपुलमेव सुखं परम् पुरुषार्थरूपं भवतीति, तस्यैव ब्रह्मणः सुखरूपस्य निरतिशय विपुलता ज्ञातव्येति “भूमात्वेव विजिज्ञासितव्यः” इत्युपदिश्य, निरतिशय विपुल सुखरूपस्य ब्रह्मणो लक्षणमिदमुच्यते “यत्रनान्यत्पश्यति नान्यच्छृणोति नान्यद्विजानाति स भूमा” इति । अयमर्थः, अनवधिकातिशय सुखरूपे ब्रह्मएयनुभूय- माने ततोऽन्यत्किमपि न पश्यत्यनुभविता, ब्रह्मस्वरूपतद्विभूत्यन्तर- गतत्वाच्च कृत्स्नस्य, वस्तु जातस्य अत ऐश्वर्यपरपर्याय विभूति गुणविशिष्टं निरतिशयसुखरूपं ब्रह्मानुभवन् तद्व्यतिरिक्तस्य वस्तुनोऽ- भावादेव किमप्यन्यन्न पश्यति अनुभाव्यस्य सर्वस्य सुखरूपत्वादेव दुःखं च न पश्यति, तदेव हि सुखम्, तदनुभूयमानं पुरुषानुकूलं भवति । जो यह कहते हो कि—“भगवन् ! प्राण की अपेक्षा भी कुछ वृहद् है क्या ? “इस प्रश्न के” यही प्राण से वृहद है “इस उत्तर से अदृष्ट प्रस्तावित आत्मा का ही उत्तर दिया गया है, जिससे ज्ञात होता है कि-
( ४७२ ) प्राणोपदेश में ही तत्त्व का पर्यवसान है। तुम्हारा यह कथन भी ठीक नहीं है। केवल इन प्रश्नोत्तरों से ही तथ्य का निर्णय नहीं होता, अन्य प्रमाणों से भी निर्णय किया जा सकता है। पहिले हम अन्य प्रमाण दे भी चुके हैं। “भगवन् ! प्राण की अपेक्षा कुछ अधिक है क्या ?” इस प्रश्न का तात्पर्य है कि-नाम से दिक् तक जिन अचेतन तत्त्वों का उपदेश दिया गया है, उनमें एक के बाद एक श्रेष्ठ बतलाए गए हैं, उन सबके ज्ञाताओं को आचार्य ने अतिवादी नहीं कहा। प्राणशब्द निर्दिष्ट जीवात्मा का यथार्थ वेत्ता, उसको ही पुरुषार्थ मानने वाला “वह प्राण- विद् व्यक्ति, ऐसे दर्शन, ऐसे मनन और ऐसे ज्ञान से अतिवादी होता है” इत्यादि में पहिले मन आदि तत्त्वों को अतिक्रमण करने वाले को ही अतिवादी कहा गया है। यहीं पर आत्मोपदेश की समाप्ति समझ कर शिष्य ने पुनः प्रश्न नहीं किया। किन्तु आचार्य ने इसे भी न्यून बताते हुए अधिक पुरुषार्थ भूत सत्य शब्दाभिधेय परब्रह्म को “को सत्य वादी है वही यथार्थ अतिवादी है” इत्यादि में स्वयं ही बतलाया ऐसा बतलाने पर शिष्य ने, परंपुरुषार्थ रूप परब्रह्म के स्वरूप और उनकी उपासना के यथार्थ रूप को जानने के लिए, पुनः “भगवन् ! मैं सत्यवादी होने की इच्छा करता हूँ” ऐसी अभिलाषा की। आचार्य ने, ब्रह्म साक्षात्कार की मूल कारण अतिवादिता की सिद्धि के लिए, ब्रह्म साक्षात्कार की उपाय उपासना को “सत्य ही ज्ञेय है” इत्यादि में बतलाकर, उसके उपाय रूप ब्रह्म मनन को “मति ही विशेष रूप से ज्ञातव्य है” इस प्रकार बतला कर यह प्रस्तुत किया कि-श्रुत पदार्थ की दृढ़ता के लिए मनन आवश्यक है मनन से ही श्रवणार्थ की सिद्धि होती है। इस श्रवण की उपाय रूप ब्रह्म श्रद्धा को श्रद्धा जिज्ञास्य है” ऐसा बतलाकर, श्रद्धा की उपाय रूप ब्रह्म निष्ठा को “निष्ठा ही विशेष रूप से ज्ञातव्य है” ऐसा बतला कर, उसकी उपायभूत उद्योग प्रयत्न रूपा कृति को “कृति ज्ञातव्य है” ऐसा बतला कर, श्रवण आदि में प्रवृत्ति हो इस लिए, सत्य शब्द से अभिधेय प्राप्तव्य ब्रह्म की सुखरूपता को “सुख ज्ञातव्य है” इत्यादि में ज्ञातव्य बतलाया। निस्सीम विपुल सुख ही परम पुरुषार्थ है, उस ब्रह्म की निरतिशय विपुल सुख- रूपता को “भूमा जिज्ञास्य है” ऐसा बतलाकर उस विपुल सुखरूप ब्रह्म के लक्षण को बतलाते हुए कहते हैं कि-मुमुक्षु जिसके अतिरिक्त कुछ नहीं देखता, कुछ नहीं सुनता, कुछ नहीं जानता, वही भूमा है।” इसका ankurnagpal108@gmail.com
( ४७३ ) तात्पर्य हुआ कि- निस्सीम निरतिशय रूप में ब्रह्मानुभूति हो जाने पर, अनुभव करने वाला उनके अतिरिक्त कुछ भी नहीं देखता, क्यों कि- समस्त वस्तुए, ब्रह्म और उनकी विभूति के ही अन्तर्गत हैं । इसलिए वह एकमात्र, ऐश्वर्य स्वरूप विभूति विशिष्ट निरतिशय सुखस्वरूप ब्रह्म की ही अनुभूति करता है उसे अनुभव गोचर सारे ही पदार्थ सुख रूप ज्ञात होते हैं, वह कहीं भी दुःख नहीं देखता, अनुभूयमान सुख ही उसे प्रिय लगता है । ननु चेदमेव जगद्ब्रह्मणोऽन्यतयाऽनुभूयमानं दुःखरूपं परिमित सुखरूपं च भवत्कथमिव ब्रह्मविभूतित्वेन तदात्मकतयाऽनुभूयमानं सुखरूपमेव भवेत् ? उच्यते-कर्मवश्यानां क्षेत्रज्ञानां ब्रह्मणोऽन्यत्वेना- नुभूयमानं कृत्स्नं जगत् तत्तत्कर्मानुरूपं दुःखं च परमित सुखं च भवति । अतोब्रह्मणोऽन्यतया परिमित सुखत्वेन दुःखत्वेन च जगद- नुभवस्य कर्मनिमित्तत्वात् कर्मरूपाविद्याविमुक्तस्य तदेव जगद्विभूति- गुणविशिष्ट ब्रह्मानुभवान्तर्गतं सुखमेव भवति । यथा पित्तोपहतेन पीयमानं पयः पित्ततारतम्येनाल्पसुखं विपरीतं च भवति तदेवपयः पित्तानुपहतस्य सुखायैव भवति । यथैव राजपुत्रस्य पितुर्लीलोपक- रणमतथात्वेनानुसंधीयमानं प्रियत्वमनुपगतं तथात्वानुसंधाने प्रियतमं भवति । तथा निरतिशयानंद स्वरूपस्य ब्रह्मणोनवधिकातिशयासंख्ये- यकल्याणगुणाकरस्य लीलोपकरणं तदात्मकं चानुसंधीयमानं जगन्निरतिशय प्रीतये भवत्येव, अतो जगदैश्वर्यविशिष्टमनवधिका- तिशय सुखरूपं ब्रह्मानुभवंस्ततोऽन्यत् किमपि न पश्यति, दुःखं च न पश्यति । (प्रश्न)जब यह जगत् परिमित सुखवाला, दुःखरूप और ब्रह्म से भिन्न बतलाया गया है तो उसे सुखरूप ब्रह्मात्मक, कैसे अनुभव किया जा सकता है ? (उत्तर) कर्माधीन जीवों के लिए ही, दृशमान सारा जगत्, ब्रह्म से भिन्न है तथा वे ही निजकर्मों के अनुसार, जगत् को दुःखरूप और परिमित
४. तृतीयाध्याय व चतुर्थाध्याय: विद्या, उपासना, प्रपत्ति, कैवल्य व मुक्ति फल उपसंहार
( ४७४ )
सुखवाला अनुभव करते हैं। ब्रह्म से भिन्न, दुःखरूप और परिमित सुखरूप जगत् की अनुभूति, कर्म निमित्तक ही है; जिसकी कर्मरूपा अविद्या छूट गई है, उसे, सारा जगत्, विभूतिगुणविशिष्ट, ब्रह्मानुभवरूप सुखमय प्रतीत होता है। जैसे कि-पित्तविकार ग्रस्त जीव को दूध पीना, रोग के अनुसार कम सुखकर अथवा दुखकर ही लगता है, वही दूध पित्तविकार रहित व्यक्ति को अति सुखकर प्रतीत होता है। जैसे कि-राजपुत्र को बाल्यावस्था मे पिता के वैभव विलास का यथार्थ ज्ञान नही होता, पर जैसे-जैसे वह बड़ा होता जाता है उसे वैभव सुख की उत्तरोत्तर अनुभूति होती जाती है; वैसे ही जब जीव को, निस्सीम आनन्दस्वरूप ब्रह्म की असंख्येय अतिशय अगणित कल्याणमय गुणों वाली लीला के उपकरण स्वरूप जगत की, ब्रह्मात्मकता का आभास होने लगता है, तो उसे, जगत् मे ही, निस्सीम आनंद की अनुभूति होने लगती है। इस प्रकार वह, जगत् में, ऐश्वर्यविशिष्ट निस्सीम अतिशय सुखरूप ब्रह्म की अनुभूति मे निमग्न होकर, सुखरूपब्रह्म के अतिरिक्त, कुछ दूसरा नही देखता, और न दुःख ही देखता है। एतदेवोपपादयति वाक्यशेषः "स वा एष एवं पश्यन् एवं मन्वान एवं विजानन्नात्मरतिरात्मक्रीड आत्ममिथुन आत्मानंद. स स्वराड्भवति, तस्य सर्वेषु लोकेषु कामचारो भवति, अथ येऽन्य- थाऽतो विदुरन्यराजानस्तेक्षय्यलोका भवंति तेषां सर्वेषु लोकेष्व प्रकामचारो भवति" इति । स्वराट्-अकर्मवश्यः अन्यराजानः- कर्मवश्याः । तथा--"न पश्यो मृत्युं पश्यति न रोगं नोत दुःखताम्, सर्वं हि पश्यः पश्यति सर्वमाप्नोति सर्वशः" इति च । निरतिशय सुखस्वरूपत्वं च ब्रह्मणः "आनन्दमयोऽभ्यासात्" इत्यत्र प्रपंचितम् । अतः प्राणशब्दनिर्दिष्टात् प्रत्यगात्मनोऽर्थान्तर- भूतस्य सत्यशब्दाभिधेयस्य ब्रह्मणो भूमेत्युपदेशात् भूमा परं ब्रह्म । उक्त तथ्य की ही पुष्टि प्रकरण का अंतिम वाक्य इस प्रकार करता है-"वह (उपासक) इस पुरुष का इस रूप से दर्शन करके, इस रूप से
( ४७५ ) मनन करके, इस प्रकार से जानकर, आत्मविद्-आत्मक्रीड-आत्ममिथुन आत्मानंद एवं स्वच्छन्द हो जाता है, उसकी सभी लोकों में स्वेच्छगति हो जाती है। इसके विपरीत जो जगत् को देखता है वह परतंत्र-लोकच्युत और लोकों में बंधकर रह जाता है।" वाक्यस्थ स्वराड् का तात्पर्य है, कर्मबंधन रहित स्वच्छन्द तथा अन्यराजानः का तात्पर्य है, कर्मों के वशीभूत, कर्मानुसार फल भोगने के लिए बाध्य। जैसा कि-"यथोक्त तत्त्वदर्शी मृत्यु को नहीं देखता, रोग तथा दुःखों का भी भोग नहीं करता, वह सर्वदर्शी, सभी सुखों को प्राप्त करने वाला हो जाता है।" इत्यादि से भी ज्ञात होता है। ब्रह्म की निरतिशय सुखरूपता की व्याख्या "आनंदमयोभ्यासात्" सूत्र में की गई है। इससे स्पष्ट है कि-प्राण शब्द वाची जीवात्मा से भिन्न सत्य शब्दाभिधेय परमात्मा को ही भूमा शब्द से बतलाया गया है। धर्मोपपत्तेश्च १।३।८॥ अस्य भूम्नो ये धर्माश्राम्नायंते, तेऽपि परस्मिन्नेवोपपद्यंते । "एत मृतम्" इति स्वाभाविक अमृतत्वम् "स्वेमहिम्नि" इत्यन्या- धारत्वं "स एवाधस्ताद्" "इत्यादि" स एवेदं सर्वम्" इति सर्वा- त्मकत्वम् "आत्मतःप्राणः" इत्यादि प्राण प्रभृति सर्वस्योत्पादकत्व- मित्यादयोहि धर्माः परमात्मन एव । भूमा संबंधी जो विशेषतायें श्रुतियों में बतलाई गई हैं, वह पर- मात्मा में ही हो सकती हैं। "एतदमृतम्" से स्वाभाविक अमरता, "स्वे महिम्नि" से अनन्यधारकता, "स एवाधस्तात्" इत्यादि तथा "स एवेदं सर्वम्" से सर्वात्मकता, "आत्मतः प्राणः" इत्यादि से प्राण आदि सभी की उत्पादकता; इत्यादि जो विशेषतायें बतलाई गई हैं वह पर- मात्मा में ही संभव हो सकती हैं। यत्तु "अहमेवाधस्तात्" इत्यादिना सर्वात्मकत्वमुपदिष्टं, तद्- भूमविशिष्टस्य ब्रह्मणोऽहंग्रहोपासनपमुद्दिश्यते "अथातोऽहंकारा- देशः" इत्यहग्रहोपदेशोपक्रमात् । अहमर्थस्य प्रत्यगात्मनोऽपि ह्यात्मा ankurnagpal108@gmail.com
( ४७६ ) परमात्मेत्यन्तर्यामिब्राह्मणादिषूक्तम् । अतः प्रत्यगर्थस्य परमात्मपर्यव- सानाद् अहंशब्दोऽपि परमात्मपर्यव सायीति प्रत्यगात्मशरीरकत्वेन परमात्मानुसंधानार्थोऽयं अहंग्रहोपदेशः परमात्मनः सर्वशरीरतया सर्वात्मत्वात् प्रत्यगानोऽप्यात्मा परमात्मा । तदेव “अथात आत्मो- पदेशः” इत्यादिना” आत्मैवेदंसर्वम्” इत्यन्तेनोच्यते । “अहमेवाधस्तात्” इत्यादि मे जो सर्वात्मकता बतलाई गई है— वह भूमाविशिष्ट ब्रह्म की अन्तर्यामी रूप अहं की उपासना की, द्योतिका है । “अथातोऽहंकारादेशः” इत्यादि श्रुति मे, उक्त अहं क्या है ? इत्यादि उपदेश का उपक्रम किया गया है । अन्तर्यामी (बृहदारण्यकोपनिषद के प्रथम) ब्राह्मण मे, परमात्मा को, जीवान्तर्यामी कहा गया है, इसलिए, जीवात्मा का पर्यवसान, परमात्मा मे होने से, अहं शब्द भी परमात्मा मे ही, पर्यवसित होता है । जीवात्मा परमात्मा का शरीर है, इसलिए शरीरी परमात्मा के अनुसंधान के लिए, अहं शब्द का प्रयोग किया गया है । सारा जगत् परमात्मा का ही शरीर है, परमात्मा ही सबके आत्मा हैं इस प्रकार जीवात्मा के आत्मा भी, परमात्मा ही हैं, ऐसा—“अथात आत्मोपदेशः” से लेकर “आत्मैवेदं सर्वम्” तक बतलाया गया है । एतदेवोपपादयितुं प्रत्यगात्मनोऽप्यात्मभूतात् परमात्मनः सर्व- स्योत्पत्तिरुच्यते “तस्य ह वा एतस्यैवं पश्यत् एवं मन्वानस्यैवं विजानत आत्मतः प्राण आत्मत आकाशः” इत्यादिना । उपासक- स्यान्तर्यामितया अवास्थितात् परमात्मनः सर्वस्योत्पत्तिरित्यर्थः । अतः परमात्मनः प्रत्यगात्म शरीरत्वज्ञानप्रतिष्ठार्थमहंग्रहोपासनं कर्त्तव्यम् । तस्माद् भूमविशिष्टः परमात्मेति सिद्धम् । उक्त तत्त्व के समर्थन के प्रसंग में-जीवात्मा के भी, आत्मरूप परमात्मा से, समस्त की उत्पत्ति इस प्रकार बतलाई गई है-“इस प्रकार दर्शन-श्रवण-मनन और विज्ञान संपन्न आत्मा से प्राण एवं आकाश हुए” इत्यादि । अर्थात् उपासक के अन्तर्यामी रूप से स्थित परमात्मा से, ankurnagpal108@gmail.com